Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
पिछले दो-तीन दिनों से पुलिस और जनता के मध्य के संबंधों की जैसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही हैं, उनसे हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था के चेहरे पर ग्रहण लग रहा है।
किसी सभ्य तथा विकासोन्मुखी व्यवस्था में पुलिस और जनता के मध्य परस्पर विश्वास का सम्बंध होता है। दोनों एक-दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो समाज के दो पैरों की भूमिका निबाहते प्रतीत होते हैं।
एक पैर जब दूसरे पैर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा होता है तब वह दरअस्ल दूसरे पैर के आगे आने का रास्ता बना रहा होता है। इसी समन्वय पर समाज ‘चलता’ है।
किन्तु ये दोनों पैर यदि आपस में उलझना प्रारंभ कर दें तो समाज को लड़खड़ाने से कोई नहीं बचा सकता।
ये दोनों ही पैर एक दूसरे के इतने समीप रहते हैं कि चलने की प्रक्रिया में इनमें परस्पर घर्षण की घटनाएँ स्वाभाविक हैं।
ट्रैफिक पुलिस के जवानों के साथ होनेवाली झड़पें, पैट्रोलिंग करते जवानों के साथ होनेवाली कहासुनी, किसी पुलिसकर्मी के भ्रष्टाचार की वीडियो और ऐसी ही अन्य जो दुर्घटनाएं सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं, वे इसी घर्षण का प्रमाण हैं।
विपरीत परिस्थितियों में अधिकारियों की डाँट, पारिवारिक चुनौतियों, नकारात्मक परिवेश और प्रोटोकॉल के दायित्व निबाहते हुए पब्लिक के बीच ड्यूटी करते पुलिसवालों की मनोदशा में चिड़चिड़ापन शुमार होना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर अपनी किसी तात्कालिक समस्या से त्रस्त नागरिक का बिलखते हुए, भन्नाए हुए, अकड़ते हुए या चिल्लाते हुए थाने आना भी स्वाभाविक है।
यहाँ तक नागरिकों और पुलिस के मध्य के संबंधों में कुछ नया नहीं है। लेकिन 19 जुलाई 2026 के बाद से दिल्ली में छात्र-आंदोलनस्थल से दोनों ओर की जो तस्वीरें दिखाई जा रही हैं वे स्वाभाविक नहीं हैं।
सोशल मीडिया, पुलिस को क्रूर सिद्ध करने पर उतारू है और मेन स्ट्रीम मीडिया, आंदोलनकारियों को गुंडा बताने पर तुला है।
हिंसा कहीं से भी शुरू हो, वह समाज के लिए कभी भी हितकारी नहीं हो सकती। पुलिसकर्मियों की लाठी से पिटकर बिलखते-चिल्लाते युवा भी समाज के भविष्य के लिए प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं और आंदोलनकारियों की भीड़ में फंसकर हांफता हुआ पुलिसकर्मी भी सामाजिक सौहार्द की सबसे कमज़ोर गाँठ को स्पर्श कर चुका है।
आंदोलन को लेकर सरकार की अपनी कुछ रणनीति हो सकती है। आंदोलन को लेकर विपक्ष की भी अपनी सोच हो सकती है। विधायिका और राजनीति को सड़कों पर उतरे इस जनसमूह को राजद्रोही घोषित करना है या जागरूक नागरिक -यह सियासत का विषय है लेकिन इस सियासी शतरंज में यदि समाज हार गया तो दो बादशाहों को जिताने के लिए बाइस मोहरे कुर्बान हो जाएंगे।
आंदोलन लोकतंत्र का फ्यूल पंप है। यहाँ से पाथेय लेकर लोकतंत्र जनहित की राह पर तेज़ी से दौड़ता है। आंदोलन के फ्यूल की माइलेज हर बार गाड़ी की क्वालिटी के अनुरूप बदल सकती है।
लेकिन ईंधन भरवाते समय पेट्रोल टैंक का फटना ख़तरनाक है। इसलिए पुलिस और जनता दोनों को ही स्मरण रखना होगा कि अराजकता की राह पर बढ़ा एक भी कदम समाज को गहरे अंधकार में धकेल देगा।
आंदोलनकारियों को षड्यंत्रकारी, राष्ट्रद्रोही, धर्मविरोधी, ग़द्दार और आतंकवादी कहना सरकारों की प्रवृत्ति रही है। आपातकाल के दौरान सत्ता के आलोचकों पर ‘राजद्रोह’ के चार्ज लगे। विपक्ष तो विपक्ष, विपक्ष की विचारधारा तक को समर्थन देनेवाले जेलों में भर दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने अधिकारों की मांग करनेवाले ‘दंगाई’, ‘उपद्रवी’ और ‘अपराधी’ घोषित किए गए। अन्ना आंदोलन और बाबा रामदेव के धरने के प्रति सत्ता का नज़रिया अभी स्मृतियों से ग़ायब नहीं हुआ है। किसान आंदोलन, खिलाड़ियों के धरने और मजदूरों के आंदोलन के प्रति सरकारी नीतियों के ज़ख़्म तो अभी तक हरे हैं।
इसलिए किसी भी जन आंदोलन का समर्थन करो या विरोध… यह ध्यान रहे कि आपका निर्णय किसी लामबंद मीडिया, किसी राजनैतिक दल अथवा किसी विचारधारा के influence से प्रभावित न हो।
और आंदोलनस्थल पर खड़े हर आंदोलनकारी को और हर सुरक्षाकर्मी को यह याद रखना चाहिए कि सरकार पराई हो सकती है; षड्यंत्र विदेशी हो सकते हैं; लेकिन देश आपका अपना है।
✍️ चिराग़ जैन
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20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र की मनोदशा का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है। जून 2026 में आरंभ हुए कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को जनता का कितना समर्थन मिला, कितना नहीं मिला -यह सही-सही कह पाना तो मेरे लिए संभव नहीं है। किन्तु सोनम वांगचुक को धरनास्थल से उठाए जाने की घटना ने जनता को कितना उद्वेलित किया, यह पूरी दुनिया ने साफ-साफ देखा।
जिस युवापीढ़ी में लोकप्रिय होने की होड़, पूरी दुनिया की राजनीति का प्रमुख लक्ष्य बन चुका है, उसी युवापीढ़ी की आवाज़ को अनसुना करने की भूल राजनीति को नहीं करनी चाहिए थी। स्कूल-कॉलेजों में पढ़नेवाली जिन ऊर्जारश्मियों के बूते देश की आंखों में भविष्य के स्वप्न झिलमिलाते हैं, उन्हीं पर आंसूगैस के गोले छोड़ते समय प्रशासन की कोरें भीग जानी चाहिए थीं।
जिन सुकोमल पीढ़ियों को पोषित करके देश को अपने बुढ़ापे की लाठी तैयार करनी थी, उन्हीं पर लाठीचार्ज करते हुए प्रशासन की टांगें कांप जानी चाहिए थीं।
सोशल मीडिया के वीडियो गवाह हैं कि जब नीली वर्दीधारी पांच-छह सशस्त्र जवान अभद्रभाषा बोलते हुए एक अकेले नौजवान पर बलप्रयोग कर रहे थे, तब उस नौजवान ने प्रतिहिंसा नहीं की। उल्टे उसने गांधी की राह पकड़ी और सचमुच दूसरा गाल आगे करके उन लाठी बरसानेवालों को शर्मिंदा कर दिया। यह दृश्य गवाह है कि गांधी इस देश की शिराओं में आज भी ज़िन्दा हैं।
20 जुलाई 2026 के तमाम दृश्यों को आप ध्यान से देखेंगे तो आपको पुलिस की आंखों में आंखें डालकर चुनौती देते हुए ‘भगतसिंह’ दिखाई देंगे। 20 जुलाई 2026 के वीडियो दोबारा खंगालेंगे तो आपको वह भारत फिर से दिखाई देगा, जो किसी भी तरह के अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना अपना नैतिक कर्तव्य समझता है।
20 जुलाई 2026 को क्नॉट प्लेस की सड़कों ने लाला लाजपतराय को भी याद किया और बटुकेश्वर दत्त को भी। चीत्कार के स्वर में पुलिसवालों को लताड़ती लक्ष्मीबाई भी दिखीं। ‘हम क्या आपके बच्चे नहीं हैं’ -बिलखकर ऐसे मासूम प्रश्नों से पुलिस की वर्दी में खड़ी महिलाओं को नज़रें छुपाने पर विवश करती बेटियां भी दिखीं।
दुनिया ने चाहे जो कुछ देखा हो, लेकिन बर्बर प्रशासनिक आदेशों का पालन करने पर विवश पुलिसकर्मियों के चेहरे पर अनेक बार मुझे मनुष्यता के पदचिन्ह दिखे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन देश के लिए इन अर्थों में भी विशेष था कि इसमें आनेवाले किसी भी ‘स्टार’को कल अपने-आपको अपनी ख़ुद की नज़रों में स्टार बनाए रखने के लिए उन हज़ारों-लाखों ‘ट्विंकल लिटिल स्टारों’ की ज़रूरत थी, जो जंतर-मंतर पर पुलिस की लाठियां और झिड़कियां खा रहे थे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन मेरे लिए इसलिए पूर्ण सफल है कि युवा पीढ़ी का नाम आते ही अराजकता की आशंका जतानेवाले प्रशासन के पास कल इस पीढ़ी को अराजक सिद्ध करने का कोई उपाय न मिल सका। न कोई नेता, न कोई संगठन, न कोई स्पांसर, न कोई व्यवस्था… केवल एक जुनून। केवल एक जज़्बा। केवल एक अपनत्व। केवल एक देश।
जब-जब सत्ता ने विरोध के स्वर को दुश्मन मानने की भूल की है, तब-तब जनता को सड़क की राह पकड़नी पड़ी है। मैं इस देश का एक नागरिक होने के नाते अपनी विधायिका से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि यह जनता आपको प्यार करती है, इसीलिए अपने भविष्य का नियामन आपके हाथों में सौंपकर निश्चिंत होना चाहती है। सब जानते हैं कि ये देश बहुत बड़ा है। सब जानते हैं कि डेढ़ सौ करोड़ लोगों के भविष्य की नीतियां बनाने में आपसे कुछ चूक हो सकती है।
इस चूक की ओर ध्यान आकृष्ट करने के जनप्रयासों को कान देकर सुनने की ज़रूरत है। विरोध के स्वर कर्कश ज़रूर होते हैं लेकिन उनके अंत से सौहार्द और समर्थन का महानाद खोज लेनेवाला ही महानायक होता है।
✍️ चिराग़ जैन
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“जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं है, जिसका कोई पौराणिक सन्दर्भ न हो।” -इस धारणा पर चिंतन करते हुए मुझे आन्दोलनों तथा विरोध-प्रणालियों का विचार आया।
अपने सीमित ज्ञान की हार्डडिस्क को स्कैन करने पर मुझे आश्वस्ति हुई कि आज के समय में जितने प्रकार के आंदोलन और विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं, उनमें से बहुत सी प्रणालियों का उदाहरण हमारे पुराणों में मिल जाता है।
अपनी बात मनवाने के लिए किसी अधिकृत व्यक्ति पर दबाव बनाने का उपाय आंदोलन कहलाता है। यह प्रयास एकल भी हो सकता है और सामूहिक भी।
राजनैतिक, सामाजिक अथवा व्यवस्था संबंधी किसी परिवर्तन हेतु किया गया यह प्रयास आधिकारिक रूप से एक शक्तिसंपन्न व्यक्ति के कानों तक अपेक्षाकृत सामान्य व्यक्तियों की आवाज़ पहुँचाने हेतु किया जाता है।
सामन्यतः आंदोलन करनेवाला व्यक्ति व्यवस्था से निराश नहीं होता, अपितु वह व्यवस्था में थोड़ा परिवर्तन करके उसे और अधिक जनहितैषी बनाने का समर्थक होता है।
श्रीकृष्ण के आह्वान पर जब गोकुलवासियों ने कंस के सैनिकों को करस्वरूप मक्खन देने से स्पष्ट मना किया था तो सम्भवतः ‘हड़ताल’ या ‘तालाबंदी’ का प्रथम उदाहरण घटित हुआ। इसी प्रकार इंद्र की पूजा बंद करके, गोवर्द्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय एक स्थापित सत्ता का ‘बहिष्कार’ करते हुए ‘तख्ता पलट’ करने का उदाहरण हो सकता है।
रामकथा में अशोक वाटिका में बैठी माँ सीता, जब अन्न-जल त्यागकर अपनी काया को कृश कर लेती हैं तो यह ‘अनशन’ का प्रमाण है।
माता कैकेयी द्वारा अपने पुत्र को राजा बनाने के प्रयासों का भरत ने ‘इस्तीफा देकर विरोध’ दर्ज किया।
हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद ने पिता को भगवान मानने से इंकार करते हुए ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ खड़ा कर दिया था।
सावित्री ने सत्यवान का जीवन लौटाने के लिए ‘सत्याग्रह’ का प्रयोग करके यमराज के निर्णय को बदल दिया था।
सागर मंथन ‘मानव शृंखला’ का उदाहरण है, तो समुद्र मंथन के समय हलाहल के निदान हेतु श्रीशिव को दिये गये ज्ञापन की प्रवृत्ति, ‘जनहितयाचिका’ जैसी मानी जा सकती है।
कठोपनिषद के नचिकेता ने अपने पिता के क्रोध के विरोध में तीन दिन तक यमराज के द्वार पर ‘धरना’ दिया।
द्रौपदी ने केश खोलकर पाण्डवों के सम्मुख ठीक वैसा ही विरोध प्रदर्शन किया था जैसे आजकल ‘काले झंडे’ अथवा ‘काली पट्टी’ बाँधकर किसी को शर्मिंदा किया जाता है।
गांधारी की आँखों पर पट्टी बांधने का प्रकरण ‘प्रतीकात्मक विरोध’ जैसा प्रतीत होता है और कर्ण के रथ को हाँकनेवाले मद्रराज शल्य ने ‘असहयोग आंदोलन’ का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
यहाँ तक कि माता दाक्षायिनी ने अपने पिता की हठधर्मिता के विरुद्ध योगाग्नि का आह्वान किया और स्वयं को भस्म कर लिया। यह घटना ‘आत्मदाह’ के ‘चरम विरोध’ का उदाहरण बन गई। श्री शिव का तांडव नृत्य तो स्पष्ट रूप से ‘उग्र विरोध प्रदर्शन’ है ही।
इसके अतिरिक्त भी लंकादहन, अशोक वाटिका ध्वंस, भीष्म प्रतिज्ञा, गंगावतरण और वामनावतार सरीखे अनगिनत पौराणिक प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि व्यवस्था को जनकल्याणकारी बनाए रखने के लिए सत्ता की नीतियों का विरोध करना दरअस्ल सत्ता का विरोध नहीं होता।
घेराव, ज्ञापन, याचिका, धरना और रैलियों का उद्देश्य सत्ता को परेशान करने की बजाय समस्या पर ध्यान केंद्रित करना भी हो सकता है।
यदि शासन ने जनता के साथ अपनत्व का संबंध बिसार नहीं दिया हो तो उसे हर आंदोलनकारी एक तपस्वी प्रतीत होता है। और यदि शासन ने सत्तामद में जनता को तुच्छ समझना सीख लिया हो तो वह हर तपस्या को राजद्रोह घोषित करने का अभ्यस्त हो जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
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आज जंतर-मंतर पर जो भीड़ जुटी है, वह कल क्या कर पाएगी, इस प्रश्न का उत्तर तो भविष्य की कुक्षि में छिपा है, लेकिन उसने आज-आज में भारतीय समाचार चैनल्स की चेहरे को जितना नंगा कर दिया है, वह पिछले दस-बारह वर्ष में कभी इतनी साफ़गोई से नहीं हो सका था।
आज के दिन की रिपोर्टिंग को देखकर यह साफ़ कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया सरकार की पीआर एजेंसी के रूप में कार्य करती है। और तथ्यों को न केवल छिपाती है बल्कि पीत पत्रकारिता करके, झूठ बोलकर सरकार के पक्ष में माहौल बनाने का हर संभव प्रयास करती है।
सरकार की पब्लिक इमेज को बनाए रखने के लिए समाचार चैनल्स को झूठ की जितनी घिनौनी तस्वीर पेश करनी पड़े, वह करेगी।
आज की रिपोर्टिंग के तीन स्तर हैं। प्रथम, दीपके की चरित्र हत्या। द्वितीय, समर्थकों को इस-उस दल का कार्यकर्ता सिद्ध करना। तृतीय, भीड़ के चित्रों से बचते हुए सौ-पचास लोगों की उपस्थिति रिपोर्ट करके यह सिद्ध करना कि आंदोलन फुस्स हो गया है।
मैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आंदोलन से नहीं जुड़ा हूं। किन्तु मैंने अपने जीवन के पांच साल तक पत्रकारिता तथा जनसंचार की पढ़ाई की है। मैंने भारतीय पत्रकारिता का जितना समृद्ध और प्रभावी इतिहास पढ़ा है, उसके झरोखे से जब मैं आज की पत्रकारिता को देखता हूं तो मुझे यह तस्वीर और भी अधिक कुत्सित नज़र आती है।
दिन को दिन और रात को रात कहने का दायित्वनिर्वहन करती हुई पत्रकारिता ने अपने इस कर्तव्य से मुंह मोड़ लिया है। यदि यह मान ही लिया जाए कि शासन के दबाव तथा व्यावसायिक घरानों के राजनैतिक हितों की मजबूरी में कई बार शाम को रात कहने वाली पत्रकारिता दरअस्ल विवश है। किन्तु भरी दोपहर को रात कहने में तो थोड़ी सी लज्जा चेहरे पर उतर ही आनी चाहिए थी।
जिन न्यूज़ प्रेज़ेंटर्स ने दस-पन्द्रह से सौ-पचास और चार-पांच सौ तक की संख्या बताकर देश के युवाओं के इस प्रयास का उपहास किया है। अगर यह ख़बर पढ़ते हुए उनकी नज़रें भी नीची हुई होतीं तो मैं उनकी विवशता को क्षम्य मान सकता था।
लेकिन जिस ढिठाई से आन्दोलन को विवश बताया गया। मेन स्ट्रीम रिपोर्टिंग से आंदोलन को नदारद किया गया, वह भारतीय पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास के मुख पर कालिख पोतने जैसा कृत्य है।
सुना है, कभी एक मशहूर एंकर शराब पीकर लड़खड़ाते हुए जनरल रावत के निधन का समाचार पढ़ते पाए गए थे। विश्वास मानिये, उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, एक पत्रकार बाकायदा खबरों की दलाली करते कैमरे में कैद हुए, बाकायदा जेल होकर आए। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, नोटबंदी के दौर में नए नोट के पक्ष में माहौल बनाते हुए नए नोट में चिप होने की ख़बर प्रसारित हुई थी। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
लेकिन आज तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने गिरने की हर मार्यादा लांघकर बाकी के तीनों स्तंभों को धराशायी करने का कुचक्र रच दिया। आज हिंदी पत्रकारिता के जनक पंडित जुगल किशोर की आत्मा बहुत कष्ट में होगी।
अंग्रेज सरकार से डरे बिना भारतीय समाज को जागृत करने के प्रयास में जेल जानेवाले पत्रकारों को आज यह देखकर कैसा लग रहा होगा कि उनकी वंशबेल ऐसे क्लीवस्वभावी प्राणियों से जा लिपटी है, जिन्हें कोरा झूठ बोलने में लेशमात्र भी संकोच नहीं होता।
हालांकि निर्लज्जता के उत्कर्ष तक जा पहुंचे पत्रकारों से कोई उम्मीद तो नहीं है लेकिन यह याद दिलाने का दुस्साहस कर रहा हूं कि इस देश में उपहार सिनेमा की ख़बर पढ़ते समय सुरेन्द्र प्रताप सिंह की हृदयगति रुक गई थी। याद दिलाना चाहता हूं कि आपातकाल के विरोध में जनसत्ता ने पूरा पेज काला छापकर सरकार का मुखर विरोध किया था।
मैं यह अपेक्षा कतई नहीं करता कि आज की पत्रकारिता सरकार की किसी नीति का विरोध कर सकेगी। लेकिन इतनी अपेक्षा तो थी ही कि ये सच से ठीक 180 डिग्री मुंह फेरकर सफेद झूठ बोलते अपने आकाओं को ख़ुश करने में नहीं हिचकिचाएंगे।
मैं सोच नहीं पाता हूं कि इन लोगों का सामना जब अपने बच्चों से होता होगा, तो क्या इनका दिल दहल नहीं जाता होगा कि अपने नौनिहालों के लिए वे कैसे भारत का निर्माण कर रहे हैं।
सरकारी योजनाओं का विज्ञापन, सरकारी ईवेंट्स की ईवेंट कवरेज तक जिन पत्रकारों की पूरी क्षमता सिमटकर रह गई है, उन्हें अपने घरों में एक आईना ज़रूर रखना चाहिए, ताकि कभी गाहे-बगाहे उन्हें अपनी शक्ल दिखाई दे जाए तो याद कर सकें कि कभी उनकी आंखों में भी हया हुआ करती थी।
✍️ चिराग़ जैन
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एक पत्रकार ने अध्यापकों की कौड़ी गिन दी और पूरा समाज उस पत्रकार के विरोध में खड़ा हो गया। एक प्रशासनिक अधिकारी ने ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया और युवाशक्ति ने रातोंरात एक डिजिटल क्रांति खड़ी कर दी।
शिक्षा के दोनों छोर एक साथ छेड़े गए और एक पूरे समाज के सिले हुए होंठ खुल गए। इस क्रांति का भविष्य क्या होगा यह तो कहना कठिन है, किन्तु इन दोनों प्रकरणों ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि संभावनाएं और आशंकाएं क्षीण हो सकती हैं किन्तु समाप्त कभी नहीं होती।
सोशल मीडिया पर विचरण करते हुए पाता हूं कि देश में किसी क्रांति जैसा माहौल है। रवीश कुमार से लेकर खान सर तक कोई भी ऐसी बात नहीं कह रहा है, जो समाज जानता न हो, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि बातें कही जाने लगी हैं। कब तक कह पाएंगे और कहां तक सुनी जाएंगी… यह कहना जल्दबाज़ी होगी।
इस दौर में अट्टालिकाओं के अहंकार से त्रस्त समाज से मैं यह अपेक्षा अवश्य करूंगा कि इस बार अपने विवेक से समझौता मत करना। सिस्टम का विरोध ही सही, लेकिन किसी के भी पीछे चलने से पहले यह समझ लेना कि कहीं हमारा नेतृत्व करनेवाला भी अपने किसी हितसाधन के लिए हमें भीड़ की तरह ‘इस्तेमाल’ तो नहीं कर रहा है।
कहीं श्वेत परिधानी बाबा का रिमोट किसी चालाक प्रशासनिक के हाथ में तो नहीं है। किसी के सुर में सुर मिलाने से पहले यह अच्छी तरह पड़ताल कर लेना कि कहीं इस सुरीले क्रांतिकारी के सुरों का कोई सप्तक किसी दूसरे आततायी के चरणों में जाकर विलीन तो नहीं हो रहा है।
‘जन’ एक महत्वपूर्ण शब्द है। दुनियाभर में अब राजनीति को इस ‘जन’ की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस जन को एकत्रित करके शातिर लोगों ने जैसे-जैसे धोखे किए हैं, उनसे सबक लेकर इस बार कदम मिलाकर भी चलना आवश्यक है और कदम संभालकर भी…।
मुझे याद है कांग्रेस सरकार के समय राहुल गांधी ने एक बयान दिया था कि मध्यम वर्ग कैटल क्लास की तरह सफ़र करता है। इस बयान पर खूब हंगामा हुआ था। राहुल गांधी के विरुद्ध लोगों का गुस्सा फूटा था। उस समय कांग्रेस के सत्ताजनित अहंकार के परिणामस्वरूप प्रत्येक ख़बर लोगों की भावनाओं को आहत करती थी।
अब भी लगभग वही माहौल है। बस तब जनता बोलती थी, आज बोलने पर अनकही-सी मनाही है। पानी को अगर सही तरीके से निकलने का रास्ता न मिले तो वह पाइप फोड़कर निकलता है। हालांकि मैं फिर भी इस बात पर अडिग हूं कि किसी भी तरह की अराजकता अंततः हानिकारक ही सिद्ध होती है। यह बात सिस्टम को भी समझनी होगी और जनता को भी। सिस्टम को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि अपेक्षा, बात और शिकायत दरअस्ल सिस्टम का विरोध ही हैं। ठीक इसी तरह जनता को भी यह समझना होगा कि प्रशासन चलाते समय कहा गया हर शब्द अभिधा नहीं होता।
एक और महत्वपूर्ण बात। यदि केवल अध्यापकों को राष्ट्रप्रेमी, ईश्वर के अवतार और ऐसे ही हाइपोथेटिकल विशेषणों से नवाज़ने का सिलसिला ज़ोर पकड़ गया तो मूल विषय धूमिल हो जाएगा। जैसे किसान आंदोलन के समय हुआ। जैसे डॉक्टरों की हड़ताल के समय हुआ। जैसे खिलाड़ियों के समय हुआ।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर मनुष्य में कुछ खामी हो सकती है। जिस देश में डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अध्यापक हुए हैं उस देश में कोई अध्यापक भ्रष्ट हो ही नहीं सकता, इस सामान्यीकृत धारणा से अपने समाज को बचाना आवश्यक है। और जिस देश में एक पत्रकार दारू पीकर लड़खड़ाती हुई एंकरिंग करता हुआ रिकॉर्ड हुआ है, उस देश में सभी पत्रकार दारुड़िये हैं, यह धारणा भी अपरिपक्व है। मेरा तो मानना है कि जो पत्रकार दारू पीकर न्यूज़ पढ़ता हुआ मिला है, वही पत्रकार कभी सत्ता की आंखों में आंखें डालकर प्रश्न करता हुआ मिल जाए तो उसका उस विशेष साहस के लिए सम्मान किया जाना चाहिए। और फिर वही पत्रकार किसी दिन पीत पत्रकारिता करता पाया जाए तो उसी पत्रकार की आलोचना होनी चाहिए।
पत्रकारों को यह बात समझनी पड़ेगी कि जनता का जो गुस्सा इस समय पत्रकारिता के विरुद्ध आंधी की तरह फूट रहा है, वह किसी एक पत्रकार की एक स्टेटमंेट का परिणाम नहीं है। पत्रकारों को यह याद करना होगा कि इस देश ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी सरीखे पत्रकारों को देखा है। इस देश की पत्रकारिता ने साहस और नैतिकता के इतने बड़े प्रतिमान खड़े किए हैं कि व्यावसायिकता और सत्ता के दबाव से उत्पन्न आपकी कोई भी विवशता यह देश नहीं समझ सकेगा। इसलिए अपनी रिपोर्टिंग में दबाव का अनुपात आटे में नमक जितना ही रखें। इससे अधिक दबाव दिखा तो खानेवाला आपकी रसोई के कौर को थूक देगा।
✍️ चिराग़ जैन