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ऊब का गीत

आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है आदमी को खींचती है राह उसकी प्यार का मतलब नहीं है प्यार केवल प्यार का आधार है परवाह उसकी मेघ से ऊबे तो इक सूरज बुलाया सूर्य दहका, देह ने बरसात कर दी रात से उकता गए तो दिन उगाया थक गए दिन से तो फिर से रात कर दी जो हमारे पास है उससे दु:खी...

सच बोलना पाप है

क्या कहा, तुम सच कहोगे और ज़िंदा भी रहोगे झूठ का चाबुक तुम्हारी खाल खींचेगा समझ लो और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो ख़ुद नदी ने इस तरह के दाँव सारे रख दिए हैं नाव जैसे दिख रहे पत्थर किनारे रख दिए हैं पेड़, जिसकी छाँह के दम पर भिड़े हो धूप से तुम धूप ने उस पेड़ की...
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