Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
देश की बौद्धिक सम्पदा, दो हिस्सों में बंट रही है। एक ओर वे लोग हैं जिन्होंने बहुत वर्षों से News Channels देखना बंद कर दिया है। ये लोग Social Media के माध्यम से देश का तापमान महसूस करने की कोशिश करते हैं। इनके लिए Trending Keywords ही Current Affairs बन जाते हैं।
सोशल मीडिया के जिस Influencers के पास अधिक Subscribers हैं, उनकी सोच ही इस तबके की सोच बन जाती है। सूचनाएं बटोरने आए जिज्ञासु ही इनके viewers हैं और इन्हीं व्यूअर्स की संख्या, इन्फ्लुएंसर्स की ताकत है।
इसी चक्र को साधते हुए खेल की तरह शुरु हुआ सोशल मीडिया आज बड़े से बड़े जनसमूह की सोच का Remote बन गया। दुनिया के अनेक देशों में सोशल मीडिया ने जनक्रांतियां खड़ी की हैं।
दुनिया भर के राजनैतिक दलों, सरकारों, विचारधाराओं, समाजसेवियों और यहां तक कि जन-आन्दोलनों ने भी सोशल मीडिया की ताक़त को समझते हुए ज़मीन पर काम करने से अधिक सोशल मीडिया की post को important समझने की प्रवृत्ति पाल ली।
दूसरी ओर है main stream media अर्थात् चौबीस घण्टे के news channels. पिछले डेढ़-दो दशकों में अचानक इनका दर्शक और पाठकवर्ग तेज़ी से कम हुआ। इसके पीछे एक बड़ा कारण तो यह है कि जो समय TV Screen पर व्यतीत होता था, वह अब mobile screen पर ख़र्च होने लगा। लोगों का Screen time बढ़ गया लेकिन टेलीविज़न की स्क्रीन के लिए लोगों के पास टाइम नहीं बचा। उधर OTT ने भी सीधे न्यूज़ चैनल्स देखने की आदत छुड़वा दी।
चौबीस घण्टे के चैनल्स को इस बात का अनुमान भी नहीं रहा होगा कि जिन Set top Box के लिए वे जनता को प्रेरित कर रहे थे, उन्हीं सेट टॉप बॉक्स के कारण जनता उनसे दूर हो जाएगी।
बहरहाल, तकनीक की कवायदों के साथ-साथ यह भी हुआ कि youtube और Facebook जैसे माध्यमों ने प्रापकों को ही संप्रेषक बना डाला। अब ख़ुद दर्शकों के अपने यूट्यूब चैनल्स बन गए। Reels बनाने की होड़ ने हर व्यक्ति के मन में संचार माध्यमों से कमाने की ललक जगा दी।
और रही-सही कसर पूरी कर दी, न्यूज़ चैनल्स में राजनैतिक हस्तक्षेप ने। जब जनता स्वयं विज्ञापनों के माध्यम से होनेवाली कमाई का गणित समझने लगी तो उसे यह भी समझ आ गया कि चैनल्स पर प्रसारित होनेवाली ख़बरों को कैसे दिखाने पर उनके अर्थ कैसे बदल सकते हैं। कैसे जनता को एंगेज करके विज्ञापन कमाए जाते हैं। कैसे endorsement को ख़बर कहकर दिखाया जा सकता है।
जनता का इस पूरे विपणन प्रबंधन को समझना, मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ।
लेकिन एक तबका अभी भी मेन स्ट्रीम मीडिया से चिपका हुआ है। वह अभी भी देश के दो दर्जन News Anchors को ही देश का असली युगदृष्टा समझकर उनका Bulletin नियम से देखते हैं। इस तबके की सोच का रिमोट उन लोगों के पास है, जिनका आर्थिक, प्राशासनिक अथवा राजनैतिक दबाव उन दो दर्जन न्यूज़ एंकर्स के मालिकों पर है। जन की भावना का सम्मान करने के स्थान पर ये लोग जन की भावना को अपने नियामकों के स्वार्थानुरूप मोड़ने में सफल होते हैं।
गड्ढे में भरे पानी को भीषण बाढ़ कैसे दिखाना है, यह कैमरा जानता है। किस एंगल पर कैमरा रखने से रैली हाउसफुल दिखाई देगी और किस एंगल पर कैमरा रखने से रैली असफल दिखेगी। इसकी ट्रेनिंग कैमरामैन को हो जाती है।
लेकिन हर मोबाइल में कैमरा आ जाने से इन प्रशिक्षित कैमरा पर्सन्स का काम थोड़ा कठिन हो गया है। यह सत्य है कि सोशल मीडिया पर दिखाए गए सौ सच, मेनस्ट्रीम मीडिया के एक झूठ के आगे बौने रह जाते हैं। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया पर देखे गए एक Raw वीडियो के माध्यम से मेनस्ट्रीम मीडिया के हज़ार HD Videos की विश्वसनीयता में डेंट तो लग ही जाता है।
यह दौर पत्रकारिता के लिए पुनर्विचार का एक अवसर है। व्यावसायिक तथा पारिवारिक विवशताओं का सम्मान करते हुए मैं यह स्वीकार करने को तैयार हूं कि अपने कॉर्पोरेट हाउसेस के निर्देश का पालन करते हुए उन्हें कई बार ‘शाम’ को ‘रात’ कहना पड़ सकता है। लेकिन जब ईयरपीस में ‘भरी दोपहर’ को ‘रात’ कहने का निर्देश आए तो एक पल के लिए कान से ईयरपीस हटाकर अपने ज़मीर की आवाज़ सुन लेना अंततः स्वयं उनके भी हित में होगा।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
“जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं है, जिसका कोई पौराणिक सन्दर्भ न हो।” -इस धारणा पर चिंतन करते हुए मुझे आन्दोलनों तथा विरोध-प्रणालियों का विचार आया।
अपने सीमित ज्ञान की हार्डडिस्क को स्कैन करने पर मुझे आश्वस्ति हुई कि आज के समय में जितने प्रकार के आंदोलन और विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं, उनमें से बहुत सी प्रणालियों का उदाहरण हमारे पुराणों में मिल जाता है।
अपनी बात मनवाने के लिए किसी अधिकृत व्यक्ति पर दबाव बनाने का उपाय आंदोलन कहलाता है। यह प्रयास एकल भी हो सकता है और सामूहिक भी।
राजनैतिक, सामाजिक अथवा व्यवस्था संबंधी किसी परिवर्तन हेतु किया गया यह प्रयास आधिकारिक रूप से एक शक्तिसंपन्न व्यक्ति के कानों तक अपेक्षाकृत सामान्य व्यक्तियों की आवाज़ पहुँचाने हेतु किया जाता है।
सामन्यतः आंदोलन करनेवाला व्यक्ति व्यवस्था से निराश नहीं होता, अपितु वह व्यवस्था में थोड़ा परिवर्तन करके उसे और अधिक जनहितैषी बनाने का समर्थक होता है।
श्रीकृष्ण के आह्वान पर जब गोकुलवासियों ने कंस के सैनिकों को करस्वरूप मक्खन देने से स्पष्ट मना किया था तो सम्भवतः ‘हड़ताल’ या ‘तालाबंदी’ का प्रथम उदाहरण घटित हुआ। इसी प्रकार इंद्र की पूजा बंद करके, गोवर्द्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय एक स्थापित सत्ता का ‘बहिष्कार’ करते हुए ‘तख्ता पलट’ करने का उदाहरण हो सकता है।
रामकथा में अशोक वाटिका में बैठी माँ सीता, जब अन्न-जल त्यागकर अपनी काया को कृश कर लेती हैं तो यह ‘अनशन’ का प्रमाण है।
माता कैकेयी द्वारा अपने पुत्र को राजा बनाने के प्रयासों का भरत ने ‘इस्तीफा देकर विरोध’ दर्ज किया।
हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद ने पिता को भगवान मानने से इंकार करते हुए ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ खड़ा कर दिया था।
सावित्री ने सत्यवान का जीवन लौटाने के लिए ‘सत्याग्रह’ का प्रयोग करके यमराज के निर्णय को बदल दिया था।
सागर मंथन ‘मानव शृंखला’ का उदाहरण है, तो समुद्र मंथन के समय हलाहल के निदान हेतु श्रीशिव को दिये गये ज्ञापन की प्रवृत्ति, ‘जनहितयाचिका’ जैसी मानी जा सकती है।
कठोपनिषद के नचिकेता ने अपने पिता के क्रोध के विरोध में तीन दिन तक यमराज के द्वार पर ‘धरना’ दिया।
द्रौपदी ने केश खोलकर पाण्डवों के सम्मुख ठीक वैसा ही विरोध प्रदर्शन किया था जैसे आजकल ‘काले झंडे’ अथवा ‘काली पट्टी’ बाँधकर किसी को शर्मिंदा किया जाता है।
गांधारी की आँखों पर पट्टी बांधने का प्रकरण ‘प्रतीकात्मक विरोध’ जैसा प्रतीत होता है और कर्ण के रथ को हाँकनेवाले मद्रराज शल्य ने ‘असहयोग आंदोलन’ का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
यहाँ तक कि माता दाक्षायिनी ने अपने पिता की हठधर्मिता के विरुद्ध योगाग्नि का आह्वान किया और स्वयं को भस्म कर लिया। यह घटना ‘आत्मदाह’ के ‘चरम विरोध’ का उदाहरण बन गई। श्री शिव का तांडव नृत्य तो स्पष्ट रूप से ‘उग्र विरोध प्रदर्शन’ है ही।
इसके अतिरिक्त भी लंकादहन, अशोक वाटिका ध्वंस, भीष्म प्रतिज्ञा, गंगावतरण और वामनावतार सरीखे अनगिनत पौराणिक प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि व्यवस्था को जनकल्याणकारी बनाए रखने के लिए सत्ता की नीतियों का विरोध करना दरअस्ल सत्ता का विरोध नहीं होता।
घेराव, ज्ञापन, याचिका, धरना और रैलियों का उद्देश्य सत्ता को परेशान करने की बजाय समस्या पर ध्यान केंद्रित करना भी हो सकता है।
यदि शासन ने जनता के साथ अपनत्व का संबंध बिसार नहीं दिया हो तो उसे हर आंदोलनकारी एक तपस्वी प्रतीत होता है। और यदि शासन ने सत्तामद में जनता को तुच्छ समझना सीख लिया हो तो वह हर तपस्या को राजद्रोह घोषित करने का अभ्यस्त हो जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
सृजन के आश्रमों में साधना करनेवाले साधक, अपने किसी पूर्ववर्ती का अनुसरण करें -यह सामान्य है। शैली, कहन और पठंत के आधार पर किसी वरिष्ठ से प्रेरणा लेना या प्रभावित हो जाना कविता और कवितापाठ की परम्परा ही है। किन्तु, इस परम्परा की स्वीकार्यता को जानते हुए भी अपनी अलग शैली गढ़ना, अपना अलग मुहावरा खोजना, अपनी अलग कहन तैयार करना और अपनी पठन्त के प्रभाव से अपनी विधा के नवागन्तुकों की महत्वाकांक्षा का लक्ष्य बन जाना किसी को ‘विशेष’ बनाता है। इसी वैशिष्ट्य का नाम है, डॉ. हरिओम पंवार।
मैं जब से कवि-सम्मेलन जगत् में प्रविष्ट हुआ हूं, तब से अब तक इनके लिए अनेक विशेषण और उपाधियां सुनने को मिलीं। किसी ने इन्हें ‘ओज का हिमालय कहा’ तो किसी ने ‘वीर रस का भीष्म पितामह’। किसी ने इन्हें ‘कवि-सम्मेलन की सफलता की गारण्टी’ कहा तो किसी ने ‘अग्नि की लपटों का शब्दानुवाद’। इन सब उपाधियों से सहमति प्रकट करते हुए मैं डॉ. हरिओम पंवार को एक ऐसे कवि के रूप में देखता हूं, जो जनमन की सबसे सटीक अभिव्यक्ति करने में सक्षम हैं।
सामान्य-जन की चर्चा से जनमत का सबसे सटीक अनुमान सुन लेने की दक्षता हैं, डॉ. हरिओम पंवार। अख़बार की सुर्खियों में राजनीति का भविष्य टटोल लेने की दृष्टि का नाम है डॉ. हरिओम पंवार। हवा की दिशा देखकर देश की दशा भांप लेने का कौशल हैं डॉ. हरिओम पंवार।
उनकी इसी प्रतिभा ने उन्हें आधी सदी से भी अधिक समय से अनवरत अपने समय का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि बनाए रखा है। डॉ. हरिओम पंवार की कविताओं का यदि देश-काल-समय के मापदण्ड पर विश्लेषण किया जाए तो आप पाएंगे कि वे हमेशा उस वृक्ष को सिंचित करते दिखाई दिए हैं, जिसमें सशक्त हो जाने की क्षमता हो। यही कारण है कि वे किसी भी मुद्दे पर सत्ता या विपक्ष के साथ खड़े होने की बजाय जनमन के साथ खड़े दिखाई दिए हैं।
समकालीन विषयों पर लेखनी चलाना, तलवार की धार पर चलने से अधिक दुष्कर कार्य है। घट रही घटना पर कलम चलाने से यश मिलने की जितनी प्रबल संभावना होती है, अपयश की भी उतनी ही अधिक आशंका रहती है। ऐसे में आलोचना से अक्षुण्ण रहकर आधी सदी का सामाजिक जीवन बिता देना किसी कीर्तिमान से कम नहीं है।
डॉ. हरिओम पंवार के अमृत महोत्सव पर मुझे यह कहते हुए कोई संकोच नहीं है कि स्वस्थ रहने का नुस्खा इस व्यस्त कवि की जीवनगाथा में स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। सामाजिक जीवन जीते हुए सहयात्रियों के साथ मतभेद और कटुता के क्षण पूरी तरह समाप्त नहीं किये जा सकते। लेकिन इन क्षणों को डील करने के लिए जो सूत्र चाहिए, वह डॉ. हरिओम पंवार के पास नैसर्गिक रूप से विद्यमान है। वे परस्पर व्यवहार में अपने किसी मनोभाव को अभिव्यक्त करने में लीपापोती करने में विश्वास नहीं करते। मन के भीतर कड़वाहट का विष निर्माण करने से बेहतर है, शब्दों के माध्यम से उसे अभिव्यक्त करके सहज हो जाया जाए।
यही कारण है कि उनके साथ यात्राएं करनेवाले जानते हैं कि वे जितनी जल्दी क्रुद्ध होते हैं, उतनी ही सरलता से क्रोध को बिसार भी देते हैं। ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर’ की नीति का सबसे सटीक चित्रण कहीं मिलता है तो वह उनका आचरण है। किसी बात पर अड़ने की उनकी अवधि कुछ मिनिटों का दायरा कभी नहीं लांघती।
मैं डॉ. हरिओम पंवार जी के अमृत महोत्सव के अवसर पर उनके दीर्घायु और स्वस्थायु होने की कामना करता हूं। तथा एक युग का अमृतग्रंथ तैयार करने का विचार संजोनेवाले संपादन मण्डल के श्रम का अभिनंदन करता हूं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
एकाएक देखने पर धैर्य भी कायरता जैसा ही लगता है। धैर्य की साधना वास्तव में शौर्य के उद्वेग को संयमित करने का पराक्रम ही है।
क्रोध और आवेग का पर्याप्त कारण मिलने पर भी संयत रह पाना किसी पराक्रम से कम नहीं है। किन्तु यह पराक्रम सविवेक है। यह ओज की कुण्डलिनी जागृत करने की तपश्चर्या है। यह शौर्य का सदुपयोग करने का अभ्यास है। और इस तप के फलस्वरुप जो आत्मबल अर्जित होता है, वह शौर्य को दुविधा से अछूता कर देता है।
इसीलिये अनवरत प्रार्थना के उपरांत सागर के समक्ष अग्निबाण तानते हुए राम के मन में कोई दुविधा नहीं रही। इसीलिए निन्यानबे गालियाँ गिननेवाले कृष्ण, सौवीं गाली पर शिशुपाल का वध करते समय संबंध की किसी संवेदना के असमंजस में नहीं घिरे।
यही कारण है कि लाक्षागृह, चीरहरण, वनवास और अज्ञातवास के दौरान कायर प्रतीत होनेवाले पाण्डव; कुरुक्षेत्र में सौ कुरुपुत्रों के रक्त में स्नान करते समय किसी ग्लानिबोध से पीड़ित न हुए। यही कारण है हस्तिनापुर के प्रति निष्ठा का घूंघट ओढ़कर मौन रहनेवाले पितामह की काया को शरशैया तक ले आनेवाले अर्जुन की डबडबाई आँखों से भी कोई निशाना चूक न पाया।
पत्नी का अपहरण करनेवाले रावण के सम्मुख भी राम ने जब अंगद के माध्यम से संधि प्रस्ताव भेजा तब रावण को राम कायर प्रतीत हुए होंगे। किन्तु उस क्षण राम के धैर्य को कायरता समझने की भूल रावण को कितनी महंगी पड़ी, यह सर्वविदित है।
अपना दिल बड़ा करके जब कोई बिना क्षमायाचना के भी आपको क्षमा कर दे तो उसके बड़प्पन का सम्मान करना, क्योंकि अपनी पीड़ा को भुलाकर जो आपको क्षमा करने का आत्मबल जुटा ले, उसको अपने शौर्य का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं रह जाती। और जिसके पास अपने क्रोध पर विजय पाने का सामर्थ्य है, उसकी शक्ति को नापने के लिए उसे रणभूमि में घसीटना आत्मघात जैसी मूर्खता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
प्रशांत महासागर के पश्चिमी छोर पर बसा ख़ूबसूरत देश है न्यूज़ीलैंड। मुस्कराते हुए लोगों का देश। चेहरे पर ज़िन्दगी जैसी ख़ूबसूरत ताज़गी लिए यहाँ के लोग तनाव और उन्माद से अछूते दिखाई देते हैं।
इन दिनों यहाँ पतझड़ का मौसम है। ‘मुहब्बतें’ फिल्म वाले मेपल के पत्ते सड़कों का शृंगार करने में व्यस्त हैं। पेड़ों से पत्ते झड़ चुके हैं, लेकिन पेड़ों के अस्तित्व में कहीं कोई शिकायत महसूस नहीं होती, उल्टे वे मौसम की इस छटा को संवारते ही दिखाई देते हैं।
आसमान के खुले मैदान में सूरज और बादलों की आँख-मिचौनी लगातार चलती रहती है। सूर्यदेव बहुत सवेरे ड्यूटी पर आ जाते हैं और उतनी ही जल्दी घर भाग जाते हैं। रात में शहर का तापमान 3° सेल्सियस तक गोता लगा लेता है और दिन में कभी 17°-18° से आगे पांव नहीं बढ़ाता। हवाएं मौसम की ठंडक को बढ़ाते हुए इतराती फिरती हैं। ऐसे में धूप की गुनगुनी छुअन देह के रोम-रोम को दुलारती है, तो मन भी खिल उठता है।
ऑकलैंड शहर के बीचोंबीच सुदीमा होटल में हमारा प्रवास है। छठे माले के टू साइड ओपन फॅमिली स्वीट के दोनों ओर बड़ी-बड़ी खिड़कियों से शहर दिखाई देता है। ठीक सामने स्काई टावर है। 328 मीटर ऊँची यह शानदार इमारत ऑकलैंड की पहचान है।
स्थानीय समयानुसार 18 जून की शुरुआत होते-होते हम लोग इमिग्रेशन की औपचारिकता संपन्न करके, लगेज बेल्ट से अपना सामान बरामद करते हुए हवाई अड्डे से बाहर निकल आए थे।
बाहर दस-बारह लोग हमारी प्रतीक्षा में खड़े थे। स्वागत-सत्कार के दौरान मैंने सभी की आँखों में अपने देश से आए अतिथियों के प्रति वही अपनत्व देखा, जो मायके के गांव से आए किसी व्यक्ति के प्रति सासरे में बसी बिटिया की आँखों में होता है।
प्रेम उपाध्याय, जो हमारे मुख्य आयोजक हैं, उनके कंधे पर आयोजन का लगभग सारा ही दायित्व था। हमें लाने-लिवाने से लेकर कार्यक्रम की टिकटें बुक करने तक का ‘संपूर्ण दायित्व’ प्रेम ने खुद के हाथों में सीमित रखा। उनका वश चलता तो वे शायद हम तीनों कवियों को किसी डब्बे में पैक करके कहीं छुपा देते ताकि कोई हमें देख भी न सके।
प्रेम उपाध्याय काफी मददगार स्वभाव के व्यक्ति हैं। उन्होंने मुझे बताया कि जिन खुशबू जी को उन्होंने वीजा की प्रक्रिया के लिए नियुक्त किया था, वे उनके मित्र की पत्नी हैं और उन्होंने वीज़ा लगवाने का नया काम शुरू किया है, इसलिए केवल उनको प्रोत्साहित करने के लिए प्रेम ने उन्हें यह काम सौंपा। ऐसे बेहतर मनुष्य मुश्किल से मिलते हैं, जो स्वयं किसी काम में पारंगत होते हुए भी अपने दोस्त की पत्नी को मोटिवेशन देने के लिए काम भी दे और फीस भी।
इनकी सहृदयता का एक उदाहरण यह भी था कि वीज़ा की प्रक्रिया के दौरान खुशबू जी ने हमसे कुछ दस्तावेज़ मांगे तो प्रेम ने मुझे भारी-भरकम अंग्रेजी का एक मेसेज लिखकर भेजा और मुझे कहा कि मैं यह खुशबू को इसलिए भेज दूँ ताकि उन्हें प्रोफेशनल व्यवहार सिखाया जा सके। प्रेम उपाध्याय के इस परोपकारी स्वभाव से मैं भावुक हो उठा।
न्यूज़ीलैंड में प्रेम ने दो शो बुक किए थे। एक ऑकलैंड में और दूसरा क्राइस्ट चर्च में। दुर्भाग्य यह रहा कि उन्हीं दिनों न्यूज़ीलैंड में कुछ और सेलिब्रिटी भी कार्यक्रम कर रहे थे। वहां रहनेवाले भारतीय सीमित थे और कार्यक्रम अधिक हो गए तो क्राइस्ट चर्च के आयोजक ने कार्यक्रम रद्द कर दिया। प्रेम ने हमें बताया कि उस कार्यक्रम के लिए लगभग साढ़े तीन हज़ार डॉलर की टिकटें प्रेम ने अपनी जेब से करायी और यह सारा नुकसान उन्होंने अपनी जेब से भुगता। उनकी इस विनम्रता के कारण कवियों ने भी उस रद्द हुए कार्यक्रम का कोई मानदेय प्रेम उपाध्याय से नहीं लिया।
चूँकि सुदीमा होटल एक भारतीय परिवार द्वारा संचालित था, इसलिए हमें आश्वस्ति थी कि इस होटल में हमें भारतीय भोजन आराम से मिल जाएगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। प्रेम उन दिनों व्यस्तता के चरम पर थे। वे स्वयं ही एक-एक व्यक्ति को फोन करके टिकट बेच रहे थे, स्वयं ही हमारे ड्राईवर बनकर हमें खाना खिलाने ले जा रहे थे, स्वयं ही कार्यक्रम की व्यवस्था में संलग्न थे और स्वयं ही अपने sponsor लोगों से संपर्क में थे।
एक दिन वे हमें हरपाल जी के घर भोजन पर ले गए। हरपाल जी एक पंजाबी व्यक्ति हैं और उनकी पत्नी किरण जी फीजी से हैं। किरण जी की कलात्मक अभिरुचि ने उनके घर को एक छोटा-मोटा संग्रहालय बना दिया है। रसोई से लेकर आँगन तक, सब कलापूर्ण। किरण जी त्वचा संबंधी समस्याओं का एक क्लिनिक चलाती हैं। उनके क्लिनिक का प्रत्येक कोना इतना कलात्मक है कि आदमी अपनी बीमारी भूल जाए।
किरण जी ने बहुत रुचि से हमें भोजन कराया। स्वाद के साथ अपनत्व भी तैर रहा था उनकी रोटियों पर। मैंने उनकी रसोई की खूब photography की। उनके पति भी सरस तथा मददगार वृत्ति के व्यक्ति हैं। कलाकारों के प्रति उनके व्यवहार में जो आदरभाव दिखा, वह मेरे लिए अविस्मरणीय था।
रात का भोजन हरपाल जी के सौजन्य से संपन्न हुआ और अगली सुबह के नाश्ते के लिए हम होटल के रेस्तरां में जूझते रहे। हम समझ चुके थे कि इस यात्रा में भोजन की चुनौती आनेवाली है, इसलिए सुरेन्द्र जी ने प्रेम उपाध्याय के सामने एक प्रस्ताव रखा कि हम प्रेम के घर से स्वयं भोजन बनाकर ले आया करें, लेकिन प्रेम जी तो स्वयं हमारे साथ होटल में पड़े थे। उन्होंने हमें बताया कि वे यहाँ अकेले रहते हैं और जिस कमरे में वे रहते हैं, उसमें और भी कुछ बैचलर लड़के रहते हैं। इसलिए उस स्थान पर कवियों को ले जाना उन्हें असहज कर देगा। हमने उनकी असमर्थता का सम्मान किया और विपरीत परिस्थितियों में इस यात्रा को आनंद सहित संपन्न करने के लिए कमर कस ली।
अगली दोपहर हमें ‘शिवानी’ नामक एक रेस्तरां में ले जाया गया। इसकी मालकिन शिवानी जी ने बड़े मन से हमें भोजन कराया। भोजन में भारतीय महक थी और यह स्थान हमारे होटल से अधिक दूर भी नहीं था इसलिए सुरेन्द्र जी ने चाहा कि इसी स्थान से हमारा भोजन का इंतजाम करा दिया जाए। लेकिन न जाने क्यों, प्रेम उपाध्याय ने इस प्रस्ताव को लगभग अनसुना कर दिया।
शिवानी जी के रेस्तरां से वापसी होटल आते समय हमें रास्ते में माउंट ईडन नामक एक स्थान पर छोड़कर हमारा आयोजक फोन पर टिकटें बेचने में जुट गया। सुरेन्द्र जी गाड़ी में बैठे रहे और मैं धीरे-धीरे चलकर पर्वत की चोटी तक पहुँचकर ऑकलैंड शहर का विहंगम दृश्य देखता रहा।
हम अनवरत यह सोचते रहे कि न्यूजीलैंड में रहनेवाले भारतीय काफी नीरस प्रवृत्ति के लोग हैं, इसीलिए इतने लंबे प्रवास में न तो कोई हमसे मिलने आया और न ही किसी ने हमें आमंत्रित करने की कोशिश की। प्रवासी भारतीयों के इस व्यवहार से प्रेम भी काफी खिन्न दिखे।
लेकिन 21 तारीख़ को जब कार्यक्रम आयोजित होना था तब सबका व्यवहार इतना मधुर था कि हमें पिछले 4 दिन की बोरियत और चुनौती का कारण समझना कठिन हो गया। खिलखिलाते हुए लोग, हमसे मिलने को आतुर लोग, हमारे साथ फोटो खिंचवाने की होड़, हमारा सान्निध्य पाने की ललक… यह सब देखकर हमें आश्चर्य भी हुआ, हर्ष भी और कष्ट भी।
ऑकलैंड के वातावरण में परागकण बहुतायत में हैं, जिन्हें पौलन कहा जाता है। इनके कारण साइनस, अस्थमा और एलर्जी के रोगियों को दिक्कत हो जाती है। कार्यक्रम के दिन मुझे इस समस्या ने घेर लिया था। साइनस चरम पर था। मैंने प्रेम से कहा कि कोई नेज़ल स्प्रे मंगवा दे ताकि शाम का कार्यक्रम ठीक हो जाए। प्रेम ने मुझे Peracitamol tablet मंगवा कर दी। शाम को कार्यक्रम से पहले सुमित नामक सज्जन हमें लेने होटल आए। उन्होंने मेरी तबीयत देखी तो उन्होंने ही वातावरण के इस ‘हे-फीवर’ के विषय में बताया। वे आश्चर्य कर रहे थे कि प्रेम ने उन्हें यह बता दिया होता तो इसका उचित उपचार (नेज़ल स्प्रे और आई drop) मैं ला देता।
सिरदर्द, जुकाम और बुखार से पीड़ित मैं आयोजन स्थल पर पहुँच गया। ग्रीन रूम में मालव जी ने मेरी स्थिति को देखकर मेरे लिए ortivin मंगवाई। उसकी बदौलत मैं कार्यक्रम ठीक से संपन्न कर सका।
उधर कार्यक्रम प्रारंभ होने से पूर्व ही प्रेम ने शो फ्लो क्लियर कर दिया था। हमारी प्रस्तुति 2 घंटे की थी, फिर एक मध्यांतर और उसके बाद बकौल प्रेम उपाध्याय, कुछ सरप्राइज था, जिसके विषय में शो की एंकर को भी नहीं पता था।
कार्यक्रम धमाल हुआ। ठहाकों की बरसात हुई। श्रोताओं ने हँसी का जी भरकर लुत्फ़ उठाया। भारत और भारतीयता से माहौल उत्साहित हो गया। स्टैंडिंग ओवेशन से लोगों ने कवियों को सैल्यूट किया। इसके बाद मध्यांतर की घोषणा हुई। हालाँकि शो जहाँ पहुंच चुका था, इसके बाद मध्यांतर का कोई औचित्य नहीं था। लेकिन आयोजक ने शायद मध्यांतर के लिए किसी रेस्तरां वाले से कुछ sponsorship ले रखी थी। इसलिए वह कार्यक्रम की सफलता की कीमत पर भी मध्यांतर जरूर करना चाहता था।
वही हुआ जिसका डर था। मध्यांतर के बाद हॉल में केवल 20 प्रतिशत लोग लौटे। इनमें से अधिकतर वे sponsor थे, जिनका सम्मान किया जाना था।
कला, जिस कार्यक्रम को चरम पर ले आई थी, बाजार ने उसे काफी नीचे लाकर समाप्त किया। यद्यपि जो लोग कविता और हास्य सुनने आए थे, वे संतुष्ट भी थे और प्रसन्न भी।
अगला पूरा दिन आयोजक के व्यवहार तथा कृतघ्नता के कारण बोरियत और खिन्नता से भरा रहा। रात का भोजन नमस्ते भारत के संचालक दंपति ने इतना स्वादिष्ट भेजा कि दिन भर का कष्ट बौना रह गया। अगली सुबह हमारा किसी के घर नाश्ते का कार्यक्रम था और फिर वहीं से हमें हवाई अड्डे चले जाना था। सुबह-सुबह ज्ञात हुआ कि नाश्ते का कार्यक्रम कैंसिल हो गया है। हमने रात के बचे हुए भोजन से काम चलाया और अंततः वीज़ा लगवाने वाली खुशबू जी के घर से रास्ते का भोजन लेकर हम रवाना हो गए। जिस देश में हमें रिसीव करने आधी रात को दर्जन भर लोग मौजूद थे, उस देश में भरी दोपहर में एक शानदार प्रस्तुति के बाद भी कोई हमें सी-ऑफ करने नहीं आया।
अंतिम दिन तक हम समझ चुके थे कि हमारे साथ पिछले 6 दिन से क्या हो रहा था। न्यूज़ीलैंड के लोगों में ‘नेहा कक्कड़’ नामक एक कलाकार के प्रति काफ़ी रोष था। हमें बताया गया कि 3 वर्ष पूर्व इसी आयोजक ने नेहा कक्कड़ को किसी शो के लिए बुलाया था और नेहा ने इस आयोजक को काफी परेशान किया था।
हवाई जहाज की खिड़की से न्यूज़ीलैंड की धरती पीछे छूटती दिख रही है। बादलों में नेहा कक्कड़ के प्रति करुणा और इस आयोजक के मददगारों के प्रति दया की तस्वीर उभर रही है।
हँसते और चहचहाते हुए देश में एक मुखौटे की उपस्थिति कैसे पंचवटी के रमणीक माहौल को शोक और निराशा के अंधकूप में धकेल सकती है, इसका अनुभव लेकर भारत की दिशा में उड़ चला हूँ।
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
हम तब तक किसी काम को टालने का प्रयास करते हैं, जब तक उस कार्य को करना अपरिहार्य न हो जाए। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। काम को टालने के हमारे पास अनगिनत उपाय हैं। और उचित अवसर की प्रतीक्षा, कार्य को टालने का सर्वाधिक प्रयुक्त बहाना है।
जिसे कार्य करना होता है, वह कार्य कर देता है। किसी कार्य को करने का एक ही तरीका है, कि उस कार्य को संपन्न करने के लिए प्रारंभ किया जाए।
विश्व का कोई पथप्रदर्शक आपको चलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। वह तर्जनी को किसी दिशा मे बढ़ाकर आपको रास्ता तो दिखा सकता है, किंतु हथेलियों से आपको उस रास्ते पर धकेल नहीं सकता। धकेलने से कोई रास्ता तय होता भी नहीं है। रास्ता तो चलने से तय होता है। इसलिए पथ प्रदर्शन का दायित्व दिशा दिखाने तक सीमित है। चलना तो आपको स्वयं ही होगा।
बुद्ध, महावीर जैसे ऊर्जावान मनुष्यों ने भी आपको मार्ग दिखाया, वे आपका हाथ पकड़कर आपको मोक्ष तक नहीं ले जा सके। यहाँ तक कि कृष्ण, जो अर्जुन के सारथी बनकर उनका रथ हाँक रहे थे, वे भी अर्जुन के लिए युद्ध न कर सके। गांडीव तो अर्जुन को स्वयं ही उठाना पड़ा।
पूरी प्रकृति स्वावलंबन के इसी सिद्धांत से संचालित है।
यही कारण है कि जीवन के लिए आवश्यक किसी भी ज्ञान का अर्जन करने के लिए दुनिया के किसी प्राणी को किसी संस्थान मे जाने की आवश्यकता नहीं होती। सद्यजात शिशु, साँस लेने के लिए किसी पाठ्यक्रम का अध्ययन नहीं करता। पलकें झपकने से लेकर चलने, बोलने और सोने-जागने तक कि शिक्षा के लिए कहीं कोई संस्थान नहीं है। भूख लगने पर कोई प्राणी भोजन का कौर, पेट की ओर नहीं ले जाता। पेट मे उत्पन्न जठराग्नि को शांत करने के लिए नन्हें से नन्हा प्राणी भी मुँह के रास्ते ही भोजन ग्रहण करता है। यह प्रकृति द्वारा प्राप्त स्वावलंबन का सर्वोत्कृष्ट प्रमाण है।
संतानोत्पत्ति, आत्मरक्षा और अभिव्यक्ति सीखने के लिए भी पाठ्यक्रम आवश्यक नहीं है। ये क्रियाएं भी प्रकृति द्वारा प्रदत्त स्वाभाविक गुणों में सम्मिलित हैं।
आवश्यक अभिव्यक्ति के लिए जितनी भाषा जाननी चाहिए, वह प्रकृति ने हर प्राणी को सिखा दी है। और प्रकृति द्वारा सिखाई गई ये भाषा कंठ ही नहीं अपितु आँखों, श्वास, हाथों, चेहरे और नथुनों तक से बोलना जानती है। सम्भवतः यही कारण है कि अभिव्यक्ति जब अपने उत्कर्ष पर पहुँचती है तब शब्द गौण हो जाते हैं। उस समय आँसू न जाने किस स्रोत से निकलकर नयनों से बह निकलते हैं।
विश्व के जितने भी शिक्षण संस्थान हैं, वे प्राणी को प्रकृति के स्वाभाविक संतुलन से दूर ले जाकर, प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के लिए अलग-अलग पाठ्यक्रम बताते हैं। यदि हम प्राकृतिक होने का अभ्यास करें तो किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता ही नहीं होगी। बल्कि यों कहें कि हम ज्यों-ज्यों सिखाए गए ज्ञान से मुक्त होते जाएंगे त्यों-त्यों प्राकृतिक होते जाएंगे। कृत्रिमता का लोप ही प्राकृतिक हो जाना है।
प्रकृति की योजना हमारी योजनाओं से अधिक सुचारू तथा दोषरहित है। प्रकृति की योजना और हमारी योजना में ठीक वही अन्तर है जो अन्तर वन तथा उद्यान में होता है। उद्यान एकाएक सुव्यवस्थित लगते हैं, किन्तु वे स्वावलंबी नहीं होते। उन्हें अनवरत संवारना पड़ता है। जबकि जंगल की कोई देखरेख नहीं करनी पड़ती, वह अपने वृक्ष स्वयं लगा लेता है। उद्यान स्वावलंबी हो जाए तो वह जंगल बन जाएगा और जंगल पराश्रित जो जाए तो वह उद्यान जैसा लगने लगेगा।
प्रकृति स्वावलंबन की पक्षधर है, इसलिए प्रकृति की ऊर्जा स्वावलंबी प्राणियों के साथ एकाकार हो जाती है और पराश्रित के भीतर जो आलस्य है, वह प्रकृति द्वारा उत्पन्न विरोध है।
✍️ चिराग़ जैन