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क़िस्से-कहानियों का सताया हुआ लोकतंत्र

हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्ण मुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना समस्त चातुर्य राजा को ख़ुश करने में झोंक दिया। बुद्धिमान हुए, तो बुद्धिमत्ता राजा को ख़ुश करने में जुट गयी।
मतलब यह कि कला, विद्वत्ता, चातुर्य और बुद्धिमत्ता; राजा से स्वर्ण मुद्राएँ पाने की होड़ में व्यस्त हो गयीं और राजा इन सबको काम पर लगाकर शासन में अपनी मनमानी करके ख़ुश रहा।
इन्हीं कहानियों ने हमें यह भी बताया कि नगर की समस्त सुंदर कन्याओं का अंतिम उद्देश्य यही है कि राजकुमार उनके सौंदर्य पर मोहित हो जावे। इसलिए आज भी सत्ताधीशों के राजकुँवर सुन्दर कन्याओं पर आकृष्ट होकर उनका जीवन धन्य करते पकड़े जाते हैं।
हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्णमुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना समस्त चातुर्य राजा को ख़ुश करने में झोंक दिया। बुद्धिमान हुए, तो बुद्धिमत्ता राजा को ख़ुश करने में जुट गयी।
मतलब यह कि कला, विद्वत्ता, चातुर्य और बुद्धिमत्ता; राजा से स्वर्णमुद्राएँ पाने की होड़ में व्यस्त हो गयीं और राजा इन सबको काम पर लगाकर शासन में अपनी मनमानी करके ख़ुश रहा।
इन्हीं कहानियों ने हमें यह भी बताया कि नगर की समस्त सुंदर कन्याओं का अंतिम उद्देश्य यही है कि राजकुमार उनके सौंदर्य पर मोहित हो जाये। इसलिए आज भी सत्ताधीशों के राजकुँवर सुन्दर कन्याओं पर आकृष्ट होकर, उनका जीवन धन्य करते पकड़े जाते हैं।
इन कहानियों के अनुसार राजा के दो ही काम थे- प्रथम, अपने मंत्रियों से ऊल-जलूल सवाल पूछना और द्वितीय, आखेट करना। इन दोनों से जो समय बचता था, वह रूठी रानी को मनाने में व्यतीत हो जाता था।
मंत्रियों के भी दो ही काम थे। या तो वे सबसे होनहार मंत्री से ईर्ष्या करने में व्यस्त रहते थे या फिर राजा के बेसिरपैर के टास्क पूरे करने में लगे रहते थे। इन दोनों से चिढ़कर ही वे अक्सर राजा को शिकार के समय जंगल में अकेला छोड़कर जानबूझकर भटक जाते थे। लेकिन शिकार में भटकने के बावजूद बिना जीपीएस के ही राजा भटकता हुआ अपने महल पहुँच जाता था।
राजकुमारियाँ सखियों के साथ जलक्रीड़ा और वनभोज (पिकनिक) में व्यस्त रहती थीं। जहाँ कोई भूत-प्रेत या राजकुमार उनके रूप-लावण्य पर मोहित होने पहुँच ही जाता था। (इस सीन में कभी कोई जंगली जानवर नहीं आ सका, क्योंकि जंगली जानवर प्रोटोकॉल के बाहर कभी नहीं जाते।) सो, राजकुमार की एंट्री होते ही राजकुमारी उसके सफेद घोड़े पर सवार होकर दूरदेश चली जाती थी। अक्सर कहानी यहाँ ख़त्म हो जाती थी। राजकुमारी को दूरदेश ले जाकर राजकुमार ने उससे क्या व्यवहार किया; यह हमें किसी कहानी ने नहीं बताया।
जनता इन कहानियों में कभी-कभार ही प्रकट होती थी। उसका उपयोग यही था कि वह कोई ‘समस्या’ लेकर लड़ते-झगड़ते राजदरबार में पहुँचे और राजा के शेष मंत्रियों की ईर्ष्या को धता बताकर सबसे चतुर मंत्री उनके झगड़े का कोई भी ऊल-जलूल समाधान देकर राजा को ख़ुश कर दे।
राजा के ख़ुश होते ही कहानी ख़त्म हो जाती है। फिर जनता की समस्या का समाधान जनता को भाये या न भाये- इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जनता का कहानी में कोई रोल है भी तो उससे यही पता चलता है कि जनता या तो कोई ठग है, जो अपनी चतुराई से राजदरबार का हिस्सा बन जाता है। या फिर कोई निर्धन ब्राह्मण है जिसकी गुणवती कन्या पर मोहित होकर राजा उसका दारिद्र्य दूर कर देता है। या फिर कोई व्यापारी है, जिसकी मिलावटखोरी को राजा के सिपाही पकड़ ही लेते हैं। राजा की सवारी निकलने पर सड़क के दोनों ओर सिर झुकाकर खड़ी भीड़ जनता है। या फिर राजा के कारनामों पर महल के बाहर इकट्ठी होकर राजा का जयजयकार करनेवाला समूह, जनता है।
इन सब संस्कारों को हम इक्कीसवीं सदी तक घसीट लाए हैं। संविधान ने हमें सिंहासन पर बैठा दिया था, लेकिन हमने अपनी आदत के अनुसार अपने लिए एक राजा चुना और उसके महल के बाहर खड़े होकर उसकी जय-जयकार करने लगे।
✍️ चिराग़ जैन

चरित्र निर्माण के विवेकहीन पाठ्यक्रम

बचपन में हमें जो कहानियाँ पढ़ाई गयी हैं; उनके झोलझाल को समझने में पूरी ज़िन्दगी कन्फ्यूज़ हो गयी है। कबूतर और बहेलिये की कहानी ने हमारे दिमाग़ में भरा कि हमें सबकी मदद करनी चाहिए। तो सारस और केकड़े वाली कहानी ने बताया कि जिसकी मदद करोगे, वही तुम्हें मार डालेगा।
बन्दर और मगरमच्छ की कहानी पढ़कर हम समझ गए कि जिसे हम मीठे जामुन खिलाएंगे, वही दोस्त एक दिन हमारा कलेजा खाने के षड्यंत्र में शामिल होगा। यह सोचकर हम दोस्तों को संदेह की दृष्टि से देखने लगे तो अध्यापक ने शेर और चूहे की कहानी पढ़ाकर बताया कि इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हमें अपने दोस्तों का भला करेंगे तो दोस्त भी हमारा भला करेंगे।
लोमड़ी और सारस की कहानी पढ़कर हमने ‘जैसे को तैसा’ सरीखा महान वाक्य सीख लिया तो ‘साधु और बिच्छू’ की कहानी ने बताया कि यदि बिच्छू अपनी बुराई नहीं छोड़ रहा तो साधु अपनी अच्छाई क्यों छोड़े।
इन विरोधाभासी कहानियों को पढ़कर जो पीढ़ी तैयार हुई उसके सामने यह मुसीबत हमेशा बनी रही कि वह साधु की तरह बिच्छू के डंक को इग्नोर करके उसे बचाए या फिर लोमड़ी की तरह सुराही का बदला लेने के लिए थाली में खीर परोसकर सारस के सामने रख दे।
हम यह बूझते ही रह जाते हैं कि सूई चुभोनेवाले दर्जी पर कीचड़ फेंकने वाला हाथी बनना है या फिर राजा की उंगली कटने पर ‘ईश्वर जो करता है अच्छे के लिए करता है’ कहने वाला मंत्री बनना है।
हमारे पाठ्यक्रम निर्माताओं ने सम्भवतः यह विचार ही नहीं किया कि वे वास्तव में बच्चों को बताना क्या चाहते हैं। उन्हें यह समझ ही नहीं आया कि लकड़हारे की जिस कहानी से बच्चों को ‘संगठन में शक्ति है’ का पाठ पढ़ा रहे थे, उसी कहानी से कुछ बच्चे ‘फूट डालो शासन करो’ का गुर सीख बैठे।
उन्हें यह भान ही न रहा कुल्हाड़ी और जलपरी वाली जिस कहानी से ईमानदारी की शिक्षा देने निकले थे उसी कहानी का अंत होते-होते वे ईमानदारी के साथ लालच का स्वाद चखा बैठे।
यदि इन कहानियों का व्यक्तित्व के निर्माण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता तो फिर इन भालू, बन्दर, खरगोश और कछुओं की अनावश्यक गल्प को पढ़ाने में बचपन का क़ीमती समय क्यों नष्ट किया गया? और यदि इन्हीं कहानियों के आधार पर बच्चों का चरित्र निर्माण होता है, तो फिर इनमें इतना विरोधाभास क्यों देखने को मिला? इस विषय को इतना ग़ैर-ज़िम्मेदार रवैये से कैसे देखा जा सकता है?
एक ओर ‘हार की जीत’ जैसी कहानी पढ़ाकर हमें यह बताया गया कि यदि बाबा भारती अपने आचरण को संयत कर लें तो खड़गसिंह जैसे डाकू का भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ़ हमें यह भी बताया गया कि चींटी ने हाथी की सूंड में घुसकर उसके अहंकार को चकनाचूर कर दिया। अब जब भी अपने अहंकार के मद में चूर होकर मेरी सुख-शांति में सेंध लगाता है तो मैं समझ नहीं पाता कि मुझे बाबा भारती जैसा आचरण करना है या फिर उस अहंकारी की सूंड में घुसकर उसे काट लेना है।
इन कहानियों ने हमारी बौद्धिक क्षमताओं को इतना कुंद कर दिया है कि हम सही और ग़लत का विवेक भूलकर कहानी के एक पक्ष को पकड़कर उसके पीछे चल पड़ते हैं।
इन्हीं कहानियों की बदौलत हम एक पूरी पीढ़ी को ऐसे मस्तिष्क की सौगात दे बैठे हैं, जो एक बार जिसे नायक मान ले, फिर उसकी सब बातें उसे सही लगने लगती हैं।
इसी कन्फ्यूज़न की वजह से हमें ‘दीवार’ फ़िल्म में स्मगलर बना अमिताभ जस्टिफाइड लगता है और ‘ज़ंजीर’ फ़िल्म में पुलिसवाला बना अमिताभ जस्टिफाइड लगता है। इसी अविवेक की वजह से हम शहंशाह फ़िल्म में क़ानून अपने हाथ में लेनेवाला अमिताभ भी पसंद है और शोले फ़िल्म में गब्बर की सुपारी लेनेवाला अमिताभ भी पसंद है।
हम दरअस्ल कहानी को समझते ही नहीं हैं। बल्कि हम तो नायक की पूँछ पकड़कर कथानक और अन्य पात्रों का आकलन करते हैं।
बचपन मे अध्यापक ने जिसकी ओर इंगित करके बता दिया कि यह नायक है, हमने उसके दृष्टिकोण से कहानियों को समझने में बचपन बिता दिया।
डायरेक्टर ने इशारे से जिसको नायक के रूप में प्रस्तुत कर दिया, उसकी नशाखोरी और आपराधिक कृत्यों को भी हमने स्टाइल कहकर जस्टिफाई कर लिया।
राजनीति ने जिसे नायक बनाकर प्रस्तुत कर दिया, उसके षड्यंत्र को भी हमने यह कहकर प्रचारित किया कि देखो अपने विरोधियों को क्या मज़ा चखाया है।
इन नायकों को महान मानने में हमारे देश का नुक़सान हुआ तो हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, हमारे समाज का बेड़ा ग़र्क हुआ तो भी हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और हमारे चरित्र में अविवेक की दीमक लग गयी तो भी हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।

✍️ चिराग़ जैन

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