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ओमिक्रोन की राजनीति

देश एक बार फिर दोराहे पर खड़ा हैं। एक ओर खुला राजमार्ग है जिसके दोनों ओर रोटी-पानी के स्रोत हैं लेकिन उसके हर मोड़ पर ‘दुर्घटना’ होने की आशंका भी है। दूसरी ओर वह बंद सड़क है, जो दुर्घटनाओं से तो हमें सुरक्षित कर देगी लेकिन रोज़मर्रा की ज़रूरतों का अभाव इस सुरक्षा का न्यूनतम मूल्य है।
इस दोराहे पर नेतृत्व का एक इशारा पूरे देश की नियति बन जाएगा। धर्मसंकट की इस घड़ी में नेतृत्व के कंधों की ज़िम्मेदारी महसूस की जा सकती है। एक ओर ऐसी सुरक्षा है जिसमें सम्पन्नता तो दूर न्यूनतम संसाधनों का भी अभाव हो जाएगा। और दूसरी ओर ऐसा जोखिम है जिसमें न्यूनतम आवश्यकता ही नहीं, वैभव-विलास तक का अभाव नहीं होगा।
सुबह-शाम एक-दूसरे की आँखों में झाँककर ‘लॉकडाउन लगेगा या नहीं’ -का उत्तर खंगालनेवालों को यह जानना होगा कि यह इतना सामान्य प्रश्न नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। सरकार राजमार्ग की ओर देश को ले जाएगी तो दूसरी लहर का हाहाकार स्मृतियों में उभरकर कान के पर्दे फाड़ देगा और बन्द सड़क की ओर देखने का प्रयास करेगी तो भूख और बेरोज़गारी के अजगर साँस लेना दूभर कर देंगे।
सरकार इस स्थिति में क्या निर्णय लेगी, यह उसके विवेक पर छोड़ना चाहिए लेकिन जनता यह अपेक्षा अवश्य करेगी कि जिस भी दिशा में देश को मोड़ा जाए, नेतृत्व उसके साथ उसी दिशा में चलता दिखाई दे। यदि जनता को बन्द गली में क़ैद करके नेतृत्व राजमार्ग के दोनों ओर बनी सुविधाएँ भोगता दिखा तो बन्द गली की घुटन से जनता के भीतर विस्फोट की आशंका उत्पन्न हो जाएगी और यदि जनता को राजमार्ग पर छोड़कर नेतृत्व ने स्वयं को बंद गली में सुरक्षित कर लेना चाहा तो राजमार्ग पर होनेवाली हर दुर्घटना की चीत्कार नेतृत्व के लिए ऐसी चिंघाड़ बन जाएगी, जिसमें जय-जयकार के नारों का शोर कभी सिर नहीं उठा पाएगा।
चुनाव निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इस बार प्रशासन को चुनाव करना है कि राजनीति की दुकान को बचाना है या उन दुकानों के ग्राहकों को…!
✍️ चिराग़ जैन

लॉकडाउन की सिचुएशन में वरिष्ठ कवि

सिचुएशन: देश के बड़े-बड़े कवियों को लॉकडाउन की सिचुएशन से गुज़रना पड़ा। उनकी पत्नी ने उन्हें घर के काम में हाथ बंटाने को कहा तो उन कवियों ने क्या गुल खिलाए। हर कवि एक विशेष काम कर रहा है और उसका वर्णन अपने अंदाज़ में कर रहा है।

मैथिलीशरण गुप्त
प्राची से ज्यों दिनकर निकला
यों अग्निमिलन को दुग्ध चला
हे क्षीर न इह विधि व्यर्थ बहो
इस भाँति करो न अनर्थ अहो
मत विकल करो मेरे मन को
नर हूँ, न निराश करो मन को

अब और न अधिक सहूंगा मैं
इस क्षण तव पान करूंगा मैं
अन्यथा देवि उठ जायेगी
मुझ पर कितना चिल्लायेगी
धिक्कारेगी मम जीवन को
न रहो, न निराश करो मन को

रामधारी सिंह दिनकर
कोने-कोने में घूम-घूम
गीले कपड़े से चूम-चूम
सारा घर-आंगन स्वच्छ किया
निज कर से सब प्रत्यच्छ किया
इक मकड़ी जाला लटका था
सीलिंग पर जाकर अटका था
आँखों से ओझल था वह खर
हाथों की सीमा से ऊपर
वह एक चूक मेरे सर थी
उर्वशि की दृष्टि उसी पर थी
जब नाश मनुज पर छाता है
तब इक जाला बच जाता है
भीतर तक टीस रहा हूँ मैं
अब चटनी पीस रहा हूँ मैं

काका हाथरसी
किसी काम ना आ रही, सम्मेलन की ड्रेस
काकाजी ख़ुद लग गये, करने कपड़े प्रेस
करने कपड़े प्रेस, गन्ध महकी घर भर में
‘क्या फूंका’ का मंत्र गुंजा काकी के स्वर में
जब तक काकी ने कमरे के भीतर झाँका
कपड़े नहीं, इस्तरी फूंक चुके थे काका

गोपालदास नीरज
हींग भी गली न थी कि हाय छौंक जल गया
क्या हुआ जो फ्राइपेन का कलर बदल गया
सब्ज़ियाँ मचल गयीं, मटर-मटर उछल गया
ये हसीन सीन घर की लक्ष्मी को खल गया
सात सुर पिछड़ गये
छन्द सब बिगड़ गये
फिर रसोई की तरफ़
किसी के पाँव बढ़ गये
और हम डरे-डरे, श्लोक सुन खरे-खरे
गैस की मशाल का क़माल देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे

ओमप्रकाश आदित्य
काम न करूंगा कोई, हाथ न बँटाऊंगा मैं
मेरे हिस्से कोई काम डाल नहीं सकती
काव्य की अनन्य प्रतिभा से मैं दमकता हूँ
प्रतिभा ये कपड़े खंगाल नहीं सकती
भाव में पगा के शब्द काव्यभोग भोगता हूँ
लेखनी ये दाल तो उबाल नहीं सकती
घर से निकालेगी तो थाने चला जाऊंगा मैं
मुझको तू घर से निकाल नहीं सकती

किशन सरोज
लॉकडाउन के समय में चौंककर
दाल-सी इक नायिका को छौंककर
देख क्या पाता किसी के हाथ की मेहंदी
छौंक से झलते नयन, मलता रहा मन
धर दिए अब और बर्तन चार करने साफ
काम कर-करके मेरा जलता रहा मन

जगदीश सोलंकी
जिनका सरफ एक बार धुल जाए
उनको फिर से सरफ वाले ढेर में न रखना
पूजा के जो कपड़े हैं, उनको अलग धोना
और उन्हें धो के अपने पैर में न रखना
रंग छोड़ते हैं, नए कॉटन के क्लॉथ; सुनो
उन्हें और कपड़ों के फेर में न रखना
हाथ से रगड़कर जल्दी-जल्दी रख देना
धीरे-धीरे धो के देर-देर में न रखना

✍️ चिराग़ जैन

मध्यम वर्ग का लॉकडाउन

किसने बोला काम करो
घर बैठो, आराम करो

कितना कुछ है मुमकिन देख
घर पर बैठ बुलेटिन देख
बहसों से कर टाइम पास
कितने हैं अच्छे दिन देख
भूख लगी हो ख़बरें खा
ख़बरों से ही प्यास बुझा
दिन भर अख़बारों को पढ़
फिर अख़बारों पर सो जा
ख़बरों पर विश्राम करो
घर बैठो आराम करो

बाहर क़ाफ़ी गर्दी है
गर्मी, बारिश, सर्दी है
दो रोटी के चक्कर में
तूने आफत कर दी है
दाम चढ़ेंगे, बढ़ने दे
रोग बढ़ेंगे, बढ़ने दे
तंत्र मलाई खाएगा
तू बस ख़ुद को कढ़ने दे
हर सपना नीलाम करो
घर बैठो, आराम करो

माना, तेरी आदत है
लेकिन बाहर दहशत है
तुझको ज़िंदा रखना है
तेरी अभी ज़रूरत है
भाषण हो तो बाहर जा
रैली में नारे लगवा
नेताजी को वोट दिला
फिर मरता हो तो मर जा
ऐसे उम्र तमाम करो
घर बैठो आराम करो

दुःखड़ा गाकर क्या होगा
सच दिखलाकर क्या होगा
गूंगी-बहरी जनता को
गीत सुनाकर क्या होगा
हम ऐसे फरियादी हैं
हर शोषण के आदी हैं
भीतर दहके अंगारे
बाहर गांधीवादी हैं
मन ही मन संग्राम करो
घर बैठो आराम करो

✍️ चिराग़ जैन

श्रद्धांजलियों का ढोंग

कभी सुना था कि आपके जीवन का आकलन इस बात से किया जाता है कि आपके दुनिया से जाने के बाद लोग आपके बारे में क्या बोलते हैं। लेकिन अब लगता है कि किसी भी व्यक्ति के भीतर के घटियापन का आकलन इस बात से किया जाना चाहिए कि वह किसी की मौत को भुनाने के लिए किस हद्द तक गिर सकता है।
हम इस हद्द तक ढोंगी हैं कि किसी की मृत्यु तक का फायदा उठाना चाहते हैं। हमारा मीडिया किसी के मरते ही न्यूज़ बुलेटिन, कैप्सूल और पैकेजिंग की मारामारी में लग जाता है। कल्पना करो, तो आत्मा काँप जाती है कि क्या माहौल होता होगा न्यूज़रूम का। अरे बॉडी के शॉट्स आए क्या, अरे प्रोम्पटर पे देख कोई अपडेट है क्या, ब्रेकिंग प्लेट बनवाओ हरे रंग के कपड़े से लटका था, हॉस्पिटल लाइन-अप करो, ओबी लगवाओ, ओए बाप के शॉट्स आ गए, जल्दी फ्लैश कर, सुसाइड का कोई पुराना एनिमेशन निकाल यार, अमिताभ का ट्वीट लगा, बहन की बाइट ले, दोस्त रो रहा है, उसको बोल क्लोज़ अप ले….!
अब तो घृणा भी नहीं होती। कुछ लोग ऐसी ख़बर आते ही तुरन्त ट्वीट करके यह जताते हैं कि मरनेवाले से उनका गहरा दोस्ताना था। हर मरे हुए आदमी को संबोधित करके ट्वीट करते हुए बची हुई दुनिया में यह ढिंढोरा पीटते हैं कि दुनिया के सारे सेलिब्रिटीज़ उनके ख़ासम-ख़ास हैं। यह और बात है, जिससे व्यक्तिगत सम्बन्धों का दावा किया जाता है, वे उनसे किसी भी सोशल प्लेटफॉर्म पर कनेक्टेड नहीं होते। कुछ स्वयंभू सेलिब्रिटी किसी के मरते ही गूगल पर उसके परिवार के सदस्यों के नाम तलाशकर ऐसा ट्वीट तैयार करते हैं, जिससे लगे कि इसका मरनेवाले से पारिवारिक संबंध था और इसे परिवार के हर सदस्य की चिंता है।
तीसरी क़िस्म के लोग मनुष्यता की सीमा के पार जाकर भी अपने एजेंडे के प्रति कटिबद्ध हैं। किसी के मरते ही उनके भीतर का हिन्दू, उनके भीतर का मुस्लिम, उनके भीतर का वामपंथी, उनके भीतर का राष्ट्रवादी, उनके भीतर का सेक्युलर, उनके भीतर का सवर्ण, उनके भीतर का दलित अथवा उनके भीतर का भारतीय सक्रिय हो जाता है और उनके भीतर मर चुके मनुष्य के शव पर नंगा नाच करने लगता है। वे बेशर्मी से बताते हैं कि मरनेवाला ग़द्दार था, उसका मर जाना ही ठीक था। वे ढिठाई से सोशल प्लेटफार्म पर लिखते हैं कि उसने फलानी फ़िल्म में मुस्लिम का रोल किया था इसलिए उसके मरने पर दुःखी नहीं होना चाहिए, उसने फलाने शो में यह कहा था, इसलिए उसका मर जाना ठीक है।
मैं कई बार सोचता हूँ कि जिस रावण ने राम जी की पत्नी का अपहरण किया, उस तक की मृत्यु पर राम संज़ीदा हो गए थे। फिर किसकी उपासना करते हैं ये मृत्यु के बाद किसी को गाली देने वाले लोग। फिर स्वतः ही उत्तर मिलता है, कि राम के जीवन के आदर्श मनुष्यों के लिए अनुकरणीय हैं, जो पहले ही अपने भीतर के इंसान की हत्या किए बैठे हैं, जिन्हें किसी मानव की मृत्यु से क्षोभ नहीं होता, उनको राम के आदर्शों की मृत्यु से कहाँ कष्ट होता होगा।
किसी की मृत्यु के बाद बची हुई दुनिया में जो काँव-काँव होती है, उसे देखकर समझ आता है कि हमारे पुरखों ने मृत्यु समाचार सुनकर दो मिनिट के लिए मौन हो जाने की परिपाटी क्यों बनाई थी।

✍️ चिराग़ जैन

कौन पूछे हाल प्यादों का

एक राजा, एक रानी
कुछ वज़ीरों की कहानी
चंद घोड़े, चंद हाथी
बस यही है राजधानी
ऊँट रस्ता तक रहे, चुपचाप भादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का

कोई मजबूरी जताकर मार डालोगे हमें तुम
कल बिसातों पर मगर फिर से सजा लोगे हमें तुम
दाँव पहला, हर दफ़ा हम ही चलेंगे खेल में पर
हम घिरे तो खेल से बाहर निकलोगे हमें तुम
जानते हैं रंग हम सबके लबादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का

हाँ, ज़माने के लिए तुम हर तरह हम से बड़े हो
पर हक़ीक़त में हमारी ओट में दुबके पड़े हो
जंग के मैदान में दोनों तरफ़ से घिर गए हम
सामने दुश्मन खड़ा है, और पीछे तुम खड़े हो
वार सहना है हमें सबके इरादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का

भूलना मत, हम नहीं हैं अब तुम अपने आसरे हो
भूलना मत, जिस जगह हम थे, वहाँ अब तुम धरे हो
भूलना मत ढाल तुमको, बोझ लगने लग गई थी
हम तुम्हारे मोहरे थे, तुम किसी के मोहरे हो
अब दिखेगा नूर सारे शाहज़ादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का

✍️ चिराग़ जैन

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