+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

सृष्टि गीत

एक जीवन में हमें संसार जितना दिख रहा है
वह गगन के एक कण बादल से ज़्यादा कुछ नहीं है
चांद, मंगल तक सफर की ख्वाहिशें और कोशिशें सब
बालपन के मूढ़ कौतूहल से ज़्यादा कुछ नहीं है

जो तुम्हारी दृष्टि को बस टिमटिमाते दिख रहे हैं
वे सभी तारे तुम्हारी सोच से बेहद बड़े हैं
क्षेत्रफल, ऊँचाइयाँ जो नापकर रटते रहे हो
वे महज इंसान के कुछ मनलुभावन आँकड़े हैं
लहलहाता दिख रहा है जो तुम्हें सागर, धरा पर
फर्श पर इक बून्द की हलचल से ज़्यादा कुछ नहीं है

बाँह के विस्तार से ही विश्व की गणना करो मत
पाँव से मत इस ज़मीं को नापने की डींग मारो
सिर्फ़ अपनी देह के आकार से तुलना करो मत
हो सके तो दृष्टि को ऊँचाई पर लाकर निहारो
तुम जिसे आकाशचुम्बी कह रहे गर्दन उठाकर
वह शिखर भी खुरदुरे भूतल से ज़्यादा कुछ नहीं है

उम्र केवल एक ज़र्रा है समय की अंजुमन का
इस जगत् की एक सिहरन मात्र ये जीवन समर है
जिस धरा के एक टुकड़े पर बसी दुनिया तुम्हारी
ये धरा ही इस महाब्रह्मांड में बस बून्द भर है
तुम जिसे दुनिया समझकर जीत लेना चाहते हो
यूँ समझ लो, एक टिड्डीदल से ज़्यादा कुछ नहीं है

✍️ चिराग़ जैन

चंद्रग्रहण

कई रोज़ से देख रहा था
कि बादल के आगोश से निकल कर
और ख़ूबसूरत लगता था चाँद
और बढ़ जाती थी उसकी चमक
जैसे किसी ने फेशियल कर दिया हो
प्यार का!

लेकिन कल रात
तमतमाया हुआ था चाँद का चेहरा
शोले टपक रहे थे उसकी आँखों से
क्योंकि कल रात
जिस साये ने जकड़ लिया था चाँद को
उसकी छुअन में प्यार नहीं
सिर्फ़ ज़िद्द थी
किसी नफ़रत
किसी चिढ़
या किसी जलन से भरी
…..एक वहशी ज़िद्द!

और ज़िद्द
मुँह तो काला कर सकती है
पर मन हरा नहीं कर सकती
मौसम ग़ुलाबी नहीं कर सकती!

✍️ चिराग़ जैन

समय-चक्र

सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है
जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है
जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा
जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा
पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी झेल रही है रंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

शनि की महादशा झेली है, अब कष्टों से डरना कैसा
सपनों को मरते देखा है, इससे बढ़कर मरना कैसा
अंतर्दशा बदलने से ही, मन के पत्थर घुल जाते हैं
लग्न कुण्डली नहीं बदलती, लेकिन गोचर खुल जाते हैं
हर क्षण रूप बदलता रहता, ये किस्मत का गोरखधंधा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

जिसको भी अमरत्व मिलेगा, वह जग को नश्वर मानेगा
जिसको विष पीना आता है, उसको जग ईश्वर मानेगा
रावण हँसता है लंका में, राम बिलखते सिया विरह में
कंस राजसुख भोग रहा है, कृष्ण जन्मते बंदीगृह में
सारा जीवन कष्ट सहे जो, नाम उसी का आनंदकंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!