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लोकतंत्र के चार स्तम्भ

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं। इनमें से किसी भी स्तम्भ से चिपक कर खड़े हो जाओ, कोई न कोई दूसरा स्तम्भ उसके साथ मिलकर तुम्हें पीस कर रख देगा। विधायिका की स्थिति ऐसी है जैसे किसी युवती को झीनी पोशाक में झरने के नीचे बैठा कर निकाला गया हो और बाहर आते ही वह दूसरी...

पगडण्डी और राजमार्ग

पगडण्डी को छूकर निकला राजमार्ग कुछ देर त्यौरी पिघलीं, आँखें चमकीं, चिंता हो गई ढेर तेज़ दौड़ते वीराने को भाया दृश्य सुहाना चैपालों को हंसी-ठहाका, पनिहारिन का गाना बूढ़ा बरगद, मीठी पोखर और पशुओं का घेर मन में कितनी ठंडक उतरी, कैसे मैं बतलाऊँ जब सूखी आंखों ने देखी, मटके...

नोटबंदी

नोटबंदी की आठवें दिन मैं अपने मकान मालिक को किराया देने पहुँचा तो मकान मालिक अड़ गया, बोला ‘मैं तो कैश ही लूंगा।’ मैंने कहा कि बैंक से पैसे निकल नहीं पा रहे हैं और वैसे भी अब प्रधानमंत्री जी ने नक़द लेनदेन से बचने की अपील की है। मकान मालिक नहीं माना और बोला ‘मैं...

रेतीली पगडण्डी पर बड़े निर्णय की मोटर

कविता अपने युग की अकथ कथाओं का जनहितकारी वर्णन है। कवि जब जन पीड़ा से विह्वल होकर शासन के विरुद्ध लेखनी चलाता है उस समय उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करनी चाहिए कि सत्ता और तंत्र का गठजोड़ उसे किस सीमा तक व्यक्तिगत हानि पहुँचा सकता है। ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कविता...

मजमेबाज़ी का तमगा

हम हैं हिंदी कविता की बुनियाद में गड़ने वाले लोग कहीं बहुत जमने वाले और कहीं उखड़ने वाले लोग कवि-सम्मेलन पर मजमेबाज़ी का तमगा मत टाँको मंचों पर भी मिल जाते हैं, लिखने-पढ़ने वाले लोग ✍️ चिराग़...
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