+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

इतनी तो मर्यादा रखो

सामाजिक जीवन जीनेवाले लोग भी अंततः मनुष्य होते हैं। राजनीति, फ़िल्म जगत्, क्रिकेट, साहित्य, अध्यात्म या अन्य किसी भी क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं, एक उसका निजी जीवन, दूसरा उसका सामाजिक जीवन।
हममें इतनी नैतिकता अवश्य होनी चाहिए कि उसके निजी जीवन को उसके सामाजिक जीवन से गड्ड-मड्ड न करें। ऐसा करके हम न केवल उस व्यक्ति को आहत करते हैं, अपितु अपनी सोच का टुच्चापन भी सार्वजनिक कर देते हैं।
राजनीति में यह सर्वाधिक होता है। फलाने जी के फलानी जी के साथ सम्बन्ध हैं, यह कहना सबसे आसान है। किसी की चरित्र हत्या करने से ज़्यादा आसान कुछ नहीं है। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि राजनेताओं से तुम्हें देश चलवाना है, या बेटी ब्याहनी है? हाँ, यदि किसी का निजी जीवन उसके सामाजिक आचरण को प्रभावित करने लगे तब शालीनता से इस विषय पर टोकना अवश्य चाहिए।
अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होने की ख़बर पर रेखा जी के साथ उनका नाम जोड़कर जिस तरह सोशल मीडिया पर बातें बनाना, घृणास्पद हैं। विश्वास कीजिये, सामाजिक जीवन जीनेवाला हर व्यक्ति, अपनी निजी जिंदगी में आपसे ज़्यादा समस्याएँ और चुनौतियाँ झेलता है। लेकिन वह इन समस्याओं पर न तो कभी आपसे सहयोग मांगने आता है, न ही उनका असर अपने कार्यक्षेत्र में दिखने देता है। लेकिन वह यह भी अपेक्षा रखता है कि उसकी निजी संवेदनाओं को सार्वजनिक उपहास का विषय न बनाया जाए।
आप मज़ाक़ कीजिये ना, राजनेताओं के राजनैतिक जीवन पर मज़ाक़ कीजिये। आध्यात्मिक लोगों के प्रवचनों और तहरीरों में हुई चूक पर परिहास कीजिये; क्रिकेटर्स के खेल पर सवाल उठाइये, पिच पर उसके व्यवहार का मज़ा लीजिए, साहित्यकारों के लेखन, भाषण और भाषा की ख़ूब खिंचाई कीजिये, फिल्मी सितारों की भूमिकाओं, संवादों, अभिनय आदि पर जितना चाहे लिखिए लेकिन उनकी निजता में प्रवेश करते समय इतना सतर्क अवश्य रहें कि आपके नेतृत्व, आपके मनोरंजन, आपके आधात्मिक विकास और आपके बौद्धिक विकास के लिए ये लोग अपनी निजी ज़िन्दगी को अनदेखा कर देते हैं।
मैं हास्य का पक्षधर हूँ किन्तु किसी का दिल दुखाकर हँसते हुए ओंठ एक संवेदनहीन हृदय का प्रमाण होते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

अनूप जलोटा का निजी जीवन

रोज़गार की प्रवृत्ति से व्यक्ति की प्रवृत्ति का आकलन करना हमारी पुरानी आदत है। पूरी वर्ण-व्यवस्था इसी आदत की देन थी। इसी आदत के चलते हम कथावाचकों को संत मानने लगे। हम यह सोच ही न पाए कि किसी कहानी को रोचक ढंग से कहने के लिए क़िस्सागोई का अभ्यास किया जाता है, भक्ति का नहीं। इसी भ्रांति ने धर्म का सत्यानाश किया है। धर्मस्थलों की देखरेख के लिए नियुक्त केयरटेकर को हमने धर्म का ठेकेदार समझ लिया। धीरे-धीरे हम सन्त-फ़क़ीरों और धर्म में रोज़गार तलाशने वालों के मध्य भेद करने की क्षमता खो बैठे।
ठीक ऐसा ही हम अनूप जलोटा प्रकरण में कर रहे हैं। अनूप जलोटा एक श्रेष्ठ गायक हैं। उन्होंने ग़ज़ल गायकी में हाथ आजमाए लेकिन उनकी आवाज़ भजन के लिए अधिक उपयुक्त थी, इसलिए उन्होंने भजन गाना शुरू कर दिया। लेकिन हम उन्हें आध्यात्मिक पुरुष मान बैठे। जैसे हम जागरण में भजन गानेवाले आर्केस्ट्रा आर्टिस्ट को माता का भक्त मान बैठते हैं और भेंट चढ़ाकर उनसे आशीर्वाद की अपेक्षा करते हैं।
इस अंतर को समझना होगा। बिग बॉस में इस बार जोड़ी की एंट्री होनी थी। अनूप जी से भी जोड़ी से ही एंट्री मंगवाई गई होगी। एक भजन गायक की कम उम्र की प्रेमिका वह भी तीन असफल विवाह सम्बन्धों के बाद… इस परिस्थिति में बिगबॉस के निर्माताओं को रोचक तत्व दिखाई दिया। यही रोचकता तलाशकर टीआरपी का धंधा करना रिएलिटी शो बनानेवालों का रोज़गार है।
कोई व्यक्ति अपना रोज़गार कैसे करता है, कितनी ईमानदारी से करता है; इन्हीं प्रश्नों की चर्चा महत्वपूर्ण है। कोई अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या करता है इससे उसके रोज़गार पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विश्व भर को चमत्कृत करनेवाले आइंस्टाइन को उनके परिवार ने एक बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदार व्यक्ति घोषित किया था। किसी के व्यक्तिगत जीवन से उसकी प्रतिभा, उसके सामाजिक जीवन, उसके रोज़गार का आकलन करेंगे तो हम युगों के बहुत क़ीमती रत्न खो देंगे क्योंकि हर हीरा अपने निजी जीवन में केवल एक पत्थर होता है।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!