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शांति बनाम उन्माद

जो शांति का उपाय खोजने के लिए अन्तिम प्रयास तक जूझता रहे, उसे शांतिदूत कहा जाता है। जब दोनों ही पक्ष ख़ून-ख़राबे के उन्माद में हों तथा किसी तरह शांति का उपाय न सूझ रहा हो, उस समय भी शांति का उपाय खोजना ऐसा ही है, ज्यों सींग भिड़ाए खड़े दो बिजारों को लड़ने से रोकना हो। इस स्थिति में स्वयं के लहूलुहान होने का संकट रहता है।
हमारे पौराणिक साहित्य में शांति के ऐसे प्रयासों के दो विशिष्ट उदाहरण मिलते हैं। प्रथम, राम की सेना लंका को घेरे खड़ी है और सीता की खोज, लंका दहन तथा सेतुनिर्माण सरीखी अविश्वसनीय घटनाओं से रावण का मनोबल टूटा हुआ है। वानर सेना आत्मविश्वास से भरी हुई है। ऐसे में भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अंगद को शांतिदूत बनाकर लंका की राजसभा में भेजा। अंगद ने जब राघव का प्रस्ताव रावण के सम्मुख रखा तो रक्ष-शक्ति के बलाभिमान से उन्मादी हुए रावण को लगा कि राम युद्ध से डरकर शांति की बात कर रहे हैं। इसी उन्माद में रावण ने शांतिदूत अंगद का अपमान किया किन्तु अंगद ने अपना बल प्रदर्शित कर रावण के अहंकार को चूर कर दिया। ध्यान से देखें तो समझ आता है कि रावण के दरबार में पैर जमाने वाले अंगद कोई करतब नहीं कर रहे थे, अपितु वे उन्मादी अहंकार को यह जताना चाह रहे थे कि जिस रक्षशक्ति के बूते वह युद्ध में विजयी होने का दम्भ भर रहा है, उसके सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं को अकेला एक अंगद परास्त करके जा रहा है। अंगद रावण को यह बताना चाह रहे थे कि शांति की बात करनेवाले को कायर नहीं, दूरदर्शी समझना चाहिए। उसका धन्यवाद करना चाहिए कि वह उस महाविनाश को देखकर, उससे एक युग को बचा लेना चाहता है, जिसे उन्मादी आँखें नहीं देख पा रही हैं।
दूसरे, जब यह तय हो गया कि अब कौरव और पाण्डव कुरुक्षेत्र में घात-प्रतिघात से पूरे द्वापर को लहूलुहान कर देंगे, तब स्वयं नारायण श्रीकृष्ण ने यह निर्णय लिया कि इस युद्ध को रोकने का एक प्रयास और किया जाना चाहिए। युगनायक वासुदेव श्रीकृष्ण स्वयं ‘शांतिदूत’ बनकर हस्तिनापुर पहुँचे और पाण्डवों की ओर से संधि का उपाय सुझाया। किन्तु इस क्षण भी अपने बाहुबल के मद से ग्रसित सुयोधन ने न केवल शांतिदूत का अपमान किया अपितु श्रीकृष्ण को बंदी बनाने की भी चेष्टा की। इस स्थिति में भी श्रीकृष्ण ने विराट स्वरूप प्रदर्शित कर उसके उन्माद की गति को विराम देने का ही प्रयास किया था। नारायण सरीखे व्यक्तित्व को आत्मश्लाघा की डींगें हाँकने की कोई आवश्यकता नहीं थी, वे तो युद्धोन्मत्त मूढ़ों को यह बताना चाहते थे कि जिस बाहुबल पर वह बौराये फिर रहे हैं, उससे अधिक शक्तिशाली होकर भी हम शांति की भाषा बोल रहे हैं।
शांति की बात करने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है। युद्ध की राह पर धकेलने के लिए तो केवल बाहुबल चाहिए, जबकि शांति की राह पर लाने के लिए बाहुबल के साथ-साथ बुद्धिबल तथा आत्मबल भी आवश्यक होता है। इसीलिए शांति की राह सुझाने वाला युद्धोन्मत्त उन्मादी से तीन गुना अधिक बलवान होता है।
यही कारण है कि जिसने शांति की बात करनेवाले को कायर समझकर उसका अपमान किया है, उसे समूल नाश की दुर्दशा झेलनी पड़ी है।
युद्ध से रक्तरंजित हुए समाज पर मातम और वैधव्य का जो सन्नाटा पसरता है, वह किसी शकुनि या मंथरा से यह प्रश्न नहीं करता कि लाशों की उस अतिवृष्टि को जन्म देनेवाले बादल किस कुचक्र के आकाश में निर्मित हुए थे, वह तो हमेशा भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर और कृष्ण से ही पूछता है कि जब वे बादल घुमड़ रहे थे तब इनकी छतरियाँ क्या कर रही थीं!
सड़क पर भिड़ने जा रहे दो बिजारों को दूर करनेवाला व्यक्ति करुणा से उत्पन्न साहस से संचालित होता है। उसके शांतिप्रयासों का अपमान करके उसी पर धावा बोलनेवालों को या तो अहंकारी रावण कहा जाएगा, या अशिष्ट सुयोधन या फिर उसे कोरा जानवर कहा जाएगा… ‘जानवर’!

✍️ चिराग़ जैन

प्रतिशोध का दंश

प्रतिशोध एक अंतहीन प्रक्रिया है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, खानदान, राजनीति, विचारधारा, देश, समाज… इन सबका सौंदर्य और सुख प्रतिशोध की इस महाज्वाला में भस्म हुआ जाता है। देवासुर संग्राम से लेकर रामायण, महाभारत और चाणक्य ही नहीं, वरन प्रत्येक संस्कृति और समाज के पास प्रतिशोध की इस विकराल चिता में ज़िन्दा जली हुई ज़िन्दगी की भयावह दास्तान है।
राम, गौतम, महावीर, नानक, ईसा… इन सबने इसी प्रतिशोध के चक्र को गतिहीन करके निष्क्रोध होने के अलग-अलग मार्ग सुझाए। उन्होंने हमें दिखाना चाहा कि मनुष्य की मुस्कुराती हुई आँखों में सुख देखने का अभ्यास कर लो तो रक्तपात और परपीड़ा में आनन्द तलाशनेवालों का क़द छोटा होता चला जाएगा। उन्होंने हमें सिखाया कि घृणा फैलाकर कोई समाज सुखी न रह सकेगा। उन्होंने हमें बताया कि क्षमा को इतना विराट बना लो कि विद्रूपता उसके आकार को लांघने का साहस न कर सके। उन्होंने हमें बताया कि अपनी मनुष्यता को इतना प्रबल बना लो कि कोई अमानुष उसके संकल्प को विचलित न कर सके। उन्होंने हमें सुझाया कि अपनी आस्था को इतना पुष्ट कर लो कि अनास्था का कोई झंझावात उसे आहत न कर पाए।
लेकिन हम तो उल्टे चलने लगे। हमने अपने धर्म का आनन्द भोगने की बजाय दूसरे के धर्म को नष्ट करने में सारी ऊर्जा झोंक दी। हम अपनी लकीर बड़ी करने की बजाय दूसरों की लकीरें मिटाने में जुट गए। हम क्षमा को ताक पर रखकर उद्दंडता के अखाड़े में दण्ड पेलने लगे।
हम घृणा को प्रेम से जीतने की बजाय, घृणा का उत्तर घृणा से देने पर उतारू हो गए। जिस क्षण हम अपने तरीके छोड़कर उसके तरीके से लड़ने लगे, बस उसी क्षण से हम पराजित हैं।
हमारी स्थिति उस विदुर की तरह है जो शकुनि के पासे बदलवाकर अब पछता रहा है। हम उन पांडवों की तरह हैं जो कौरव बनकर युद्ध जीत तो गए किन्तु उनके भीतर का पाण्डवत्व कुरुक्षेत्र में गिरनेवाला पहला शव बन गया।
हम कुरुक्षेत्र में प्रवेश करते समय केवल इतना भर संकल्प ले लें कि जब इस रण से बाहर निकलेंगे तो अपने भीतर के पाण्डवत्व को साथ लेकर लौटेंगे। हम अपनी क्षमा को बिसारकर उद्दंडता को सबक़ नहीं सिखाएंगे।
विश्वास कीजिये, यदि हम ऐसा कर पाए तो हमारे धर्मस्थलों में विद्यमान ग्रंथ जीवंत हो उठेंगे। फिर हमें हमारे महापुरुषों की वाणी का प्रचार करने के लिए लाउड स्पीकर नहीं लगाने पड़ेंगे। फिर हमारा आचरण ही हमारे धर्म का प्रतीक हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन

राह के काँटे चुभेंगे

बो रहे हो इस चमन में नागफनियाँ
जिस्म होंगे देखना घायल तुम्हारे
दूब के कोमल गलीचे मत उखाड़ो
पाँव सहलाती मिलेगी कल तुम्हारे

जब तुम्हारी राह के अनुयायियों को
नागफनियों की चुभन से ऊब होगी
राह के काँटे चुभेंगे पीढ़ियों को
तब सभी का पथ हमारी दूब होगी
सिर्फ कोमलता तुम्हारा साथ देगी
क्रूरता उलझाएगी आँचल तुम्हारे

आज जो तुम ताल में विष डालते हो
वह तुम्हारे वंश को पीना पड़ेगा
कल तुम्हारे नौनिहालों को विवश हो
आज के इस दंश को जीना पड़ेगा
कल तुम्हारे अंश को ठगते फिरेंगे
आज के छोड़े हुए ये छल तुम्हारे

आज जिसके ताप से तुम जल रहे हो
वह तुम्हारे ही किसी कल की लपट है
आज जो प्रतिशोध बनकर सामने है
वह तुम्हारे पूर्ववर्ती का कपट है
तुम सुबह की लालिमा में ये न भूलो
कालिमा के दास अस्ताचल तुम्हारे

रोक दो प्रतिशोध की अब ये लड़ाई
ये तुम्हारी पीढ़ियों को पाट देगी
आज तुम दीवार तोड़ोगे जड़ों से
कल कोई बुनियाद तुमको काट देगी
आज जंगल में शहर को घेर लोगे
कल शहर खा जाएंगे जंगल तुम्हारे

✍️ चिराग़ जैन

फ़ुरसत

उफ़्फ़ ये फ़ुरसत है कि मिलती ही नहीं है मुझसे
एक मुद्दत से मेरे पास नहीं आई है
एक मुद्दत से कई काम अधूरे हैं मेरे
वायदे, ख़्वाब, मुलाक़ातें कई हैं बाक़ी
एक तस्वीर अधूरी सी बनी रक्खी है
एक मिसरा-सा ग़ज़ल का है, बिना सानी के
एक किस्से का भी मफ़हूम लिखा रक्खा है
एक बूढ़ा है, कई बार बुलाता है मुझे
उससे हर बार बहाना-सा बना देता हूँ
अपने अरमान के पंछी को दग़ा देता हूँ
कितना मसरूफ़ बना रक्खा है मैंने ख़ुद को
वक़्त मिलता ही नहीं मुझको कभी इतना भी
अपनी टेबल पे रखे फालतू काग़ज़ छाँटूँ
मेज की तीनों दराज़ों को पलटकर इक दिन
उनमें तरतीब से सामान सजाकर रख दूँ
कितना बिखरा हुआ सा रहने लगा हूँ अब मैं
इन दराज़ों में भरे फालतू सामानों से
मुँह चुरा लेता हूँ मैं अपने ही अरमानों से
क्या-क्या बाक़ी है, कहाँ तक ये गिनोगे तुम भी
चलो फ़ुरसत से मिलूंगा तो बताऊंगा कभी
उफ़्फ़ ये फ़ुरसत है कि मिलती ही नहीं है मुझसे

✍️ चिराग़ जैन

एलियन का यात्रा वृत्तांत

पृथ्वी पर बड़ी-बड़ी ज़मीनें हैं। जिन पर इंसानों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों को वे गाँव, क़स्बा, शहर, देश और दुनिया कहते हैं, जहाँ दो पैरों से चलनेवाले विचित्र प्राणियों के झुंड रहते हैं। झुंड का प्रत्येक सदस्य एक ऐसे झुंड में रहना चाहता है, जिसमें केवल उसकी बात मानी जाए और केवल उसकी सुविधाओं का ध्यान रखा जाए।
पृथ्वीवासी युगों-युगों से इन झुंडों में एक अदद इंसान तलाश रहे हैं। लेकिन आज तक किसी को कहीं कोई इंसान मिला ही नहीं, क्योंकि जब कोई पृथ्वीवासी ‘इंसान’ तलाशने निकलता है, तब केवल उतनी ही देर के लिए वह ख़ुद भी इंसान बन जाता है, और उस वक़्त के गुज़रते ही वह वापस अपने वर्चस्व वाला झुंड बनाने के लिए किसी झुंड में खो जाता है।
पृथ्वी के दो छोर हैं- उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। इन दोनों ध्रुवों पर प्रकृति ने जीवन जीने योग्य स्थितियाँ नहीं बनाईं, और बाक़ी पृथ्वी को इंसानों ने जीवन जीने लायक नहीं छोड़ा। प्रकृति ने नदियाँ बनाई थीं, लेकिन मनुष्य ने नदियों से जीवन लेते-लेते, नदियों का जीवन ले लिया। पर्यावरण की चिंता और ईश्वर का भय; ये दोनों ही प्रत्येक मनुष्य ने अपने अतिरिक्त सबके लिए आवश्यक बना रखे हैं। चूँकि मनुष्य की आँखें अपने गिरेबान में नहीं झाँक सकतीं, इसलिए एयरकंडीशन कमरे में बैठकर ग्लोबल वार्मिंग पर बात करने में कोई नैतिक संकट उत्पन्न नहीं होता।
हर झुंड के अपने कुछ नियम हैं, इन नियमों को बनाने का काम ‘सरकार’ का होता है। सरकार उन लोगों का समूह है जो अपनी बातों से ज़मीन पर रेंगते लोगों को आसमान के ख़्वाब दिखा सकें। सपने इतने सच्चे लगने चाहियें कि रेंगनेवालों को अपने कुचले जाने का पता न चल सके। सरकार बनाने के लिए हर झुंड में एक प्रतियोगिता होती है, जिसे ‘चुनाव’ कहते हैं। इस प्रतियोगिता में जो सबसे ज़्यादा झूठा, ढीठ, ढोंगी और बेशर्म साबित होता है उसे विजेता मान लिया जाता है। अपने कार्यकाल में जब ये विजेता लोग जनता को गिड़गिड़ाने और गाली देने तक विवश कर देते हैं तब अगली प्रतियोगिता में अन्य प्रतियोगियों के जीतने की संभावना बनती है। इससे प्रतियोगिता में रोचकता बनी रहती है। प्रतियोगिता के विजेता अन्य झुंडों के विजेताओं से मिलने-जुलने और लड़ने-भिड़ने में समय व्यतीत करते हैं। इन खर्चों को पूरा करने के लिए झुंड के बाक़ी लोग दिन-रात कठोर परिश्रम करके धन की व्यवस्था करते हैं। हर सरकार अपने झुंड के लोगों को बताती है कि उनके झुंड की दूसरे झुंडों के बीच इज़्ज़त बढ़ रही है। ऐसा सुनकर झुंड के लोग नाचने लगते हैं और सरकार के ख़र्चे उठाने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाते हैं।
पृथ्वी का मनुष्य भोजन-पानी के बिना जीवित रह सकता है, किन्तु दूसरों के जीवन में ताका-झाँकी किये बिना नहीं जी सकता। किसके जीवन में क्या चल रहा है, किसकी किससे दोस्ती है, किसकी किससे दुश्मनी है, कौन क्या खाकर सोया है, कौन भूखा सोया है… इस प्रकार के लाखों प्रश्न जीवनयापन का कच्चा माल हैं। मनुष्य बड़ी लगन से इन प्रश्नों को जन्म देता है, फिर दिन-रात श्रम करके इनके उत्तर या तो खोज लेता है, या फिर गढ़ लेता है। उत्तर मिलते ही उन्हें लेकर वह दूसरे मनुष्य को पहले मनुष्य की समस्या और अपनी ज्ञानवत्ता से अवगत कराता है। इस प्रक्रिया में जो चर्चा होती है, वही चर्चा मानव जीवन का परम सुख है। सुख के उन्माद में यह चर्चा धीरे-धीरे झूठ और चरित्र-हत्या के हथियारों का पुलिंदा बनकर उस मनुष्य तक पहुँच जाती है जिसके विषय में चर्चा की जा रही थी। अब वह मनुष्य सक्रिय होता है और चर्चा का पीछा करते हुए चर्चा के जनक को तलाशने लगता हैं। चर्चा आगे बढ़ती जाती है और उसका नायक उसके सूत्रों में उलझकर पीछे होने लगता है। अंततः एक दिन वह जनक को तलाश लेता है और फिर कहासुनी, तू-तू-मैं-मैं, गाली-गलौज, झगड़ा, हाथापाई, मारपीट, भिड़ंत, मुठभेड़ और युद्ध तक कुछ भी हो सकता है। इस घटना के अंत में भी विजेता को धर्मात्मा और पराजित को अधर्मी मान लिया जाता है। फिर इस घटना की चर्चा चलती है। फिर युद्ध, फिर चर्चा, फिर युद्ध…. बस इसी तरह यह संसार-चक्र चलता रहता है।

✍️ चिराग़ जैन

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