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कर्ण का परिताप

तुम प्रपंचों में समय अपना खपाना मैं समर के हर नियम को मान दूँगा तुम बदलकर वेश मुझसे मांग लेना मैं कवच-कुण्डल ख़ुशी से दान दूँगा हाथ की सारी लकीरें हैं विरोधी अब भला कुछ झोलियों का रीतना क्या न्याय से या सत्य से सम्भव नहीं जो झूठ कहकर उस समर को जीतना क्या तुम निहत्थे...

झूठ के दम पे मुहब्बत

सच के कारण मिली नफ़रत क़ुबूल है लेकिन झूठ के दम पे मुहब्बत नहीं अच्छी लगती यूँ तो रिश्ते मेरे दिल को सुक़ून देते हैं पर ये रिश्तों की सियासत नहीं अच्छी लगती भूख जिस वक़्त कलेजा गलाने लगती है तब ख़ुदाओं की इबादत नहीं अच्छी लगती उनको कल तक मेरा क़िरदार बहुत भाता था अब मेरी...

बेग़ुनाही का दावा

कोई महज ईमान का जज्बा लिए जिया कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिए जिया टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ इक शख्स सच के नाम पे क्या-क्या लिए जिया जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिए जिया था बेलिबास अपनी नज़र में हर एक शख्स दुनिया के दिखावे को लबादा...
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