मन तो गोमुख है
कविता मेरे अस्तित्व का आधार है। यदि मुझसे मेरी कविताओं को श्रेणीबद्ध करने को कहा जाए तो मैं अपनी तमाम रचनाओं को दो वर्गों में रखूंगा- एक ‘मंच की कविता’ और दूसरी ‘मन की कविता’। ‘मंच की कविता’ रोज़ रात को कवि-सम्मेलनों में तालियाँ और वाह-वाही लूटती फिरती है। लेकिन ‘मन की कविता’ ऐसा नहीं कर पाती। वह किंचित संकोची है, मेरी तरह। वह मेरे नितान्त एकाकी क्षणों में मेरे चारों ओर लास्य करके संतोष प्राप्त कर लेती है।
यात्राओं से थका-हारा जब बिस्तरानुगामी होता हूँ तो हौले से आकर मेरे सिरहाने बैठ जाती है, कभी नयन कोर पर आ ठहरती है, तो कभी अधरों पर एक मुस्कान का चुंबन जड़ जाती है। इसे शोर-शराबा, हो-हल्ला और भीड़-भाड़ कतई पसंद नहीं। यह तो बेहद सरल शब्दों का चोगा पहने मुहल्ले की उस अनपढ़ गृहिणी सी मेरे साथ चलती है, जिसकी उपस्थिति को तो मैं अनदेखा कर सकता हूँ लेकिन उसकी अनुपस्थिति की ख़लिश को नहीं।
इन कविताओं ने कभी मुझसे झगड़ा नहीं किया, कभी रूठी भी नहीं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से एक ख़्वाहिश करने लगी थीं। एक ज़िद्द सी कर रही थीं। मैं इस ज़िद्द से परेशान न हुआ। बल्कि मुझे ऐसा लगा जैसे कोई छोटी सी बच्ची मेरे वक़्त के बटुए में से चार-आठ आने की मांग कर रही हो। तेज़ भागती ज़िन्दगी के बीच भी मुझे यह मांग नाजायज़ न लगी।
बस, यकायक धारणा की कि नया संग्रह प्रकाशित होना है। बेतरतीब सफ़हों पर बिखरा ख़ज़ाना देखते ही देखते किताब की शक़्ल में ढल गया।
अनुक्रम
उजियारे के अवशेष
गाँव का पुराना मकान कच्चा-पक्का फ़र्श दीमक लगी जर्जर चौखट और देहरी के दोनों ओर चिकनाई के दो गोल निशान!मुद्दत हुई हर साल दीपावली पर दीपक जलाते थे दो हाथ। फिर अपने पल्लू की ओट में छिपाकर हवा के झोंके से बचाते हुए दीवार की आड़ में हौले से देहरी पर दो दीपक धर आते थे दो हाथ। न जाने क्यों आज फिर से जीवंत...
आहट
वो तुमसे मेरी पहली मुलाक़ात थी और सिर्फ़ तुम जानती थीं कि आख़िरी भी…! स्टेशन पर खड़े चिड़चिड़ा रहे थे सभी लोग कि ट्रेन लेट क्यों हो रही है और हर आहट के साथ सहम जाता था मैं -’हाय राम! कहीं गाड़ी तो नहीं आ रही!’ ✍️ चिराग़...
शब्द शिव हैं
शब्द शिव हैं। जब कभी बहती है भावना उद्विग्न हो मन के भीतर से तो उलझा लेते हैं उसे व्याकरण की जटाओं में। रोक देते हैं उसका सहज प्रवाह। सीमित कर देते हैं उसकी क्षमताएँ। कविता वेग है आवेग है उद्वेग है। वो तो शब्दों ने उलझा लिया वरना, बहा ले जाती सृष्टि के सारे कचरे को। शब्द ब्रह्म नहीं हैं, शब्द शिव...
सपनों का कॅनवास
मैं खुली आँखों से एक सपना देखता था अक्सर। बनाता था इक तस्वीर अपनी ख़्वाहिशों की। न जाने कब उभर आया एक मुकम्मल इंसान मेरे मन के कॅनवास पर। न जाने क्यों मैंने रख दिया अपना दिल बिना सोचे-समझे इस इंसान के सीने में ...तुम केवल एक रिश्ता नहीं हो मेरे लिए तुम मेरे सपनों का कॅनवास हो। ✍️ चिराग़...
कोशिश
मैं ‘मन’ लिखने की कोशिश करता हूँ ....सिर्फ़ कोशिश। कभी इसका मन कभी उसका मन कभी सबका मन ...और कभी-कभी अपना भी मन। इतना ही समझ आता है मुझे कि ‘कोशिश’ और ‘कामयाबी’ उर्दू ज़ूबान के दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं! ✍️ चिराग़...
अनदेखी
देर तक देखता रहा मैं एक बिन्दु को आशा भरी नज़रों से लगातार। उतनी ही देर तक तकती रहीं दो आँखें छलछलाती हुईं मुझे भी! ✍️ चिराग़...
महत्व
तुमसे मिलना... ...जैसे हाई-वे पर दौड़ती गाड़ी दो पल को ठहरे किसी पैट्रोल पम्प पर। ...जैसे परवाज़ की ओर बढ़ता परिंदा यकायक उतर आए धरती पर पानी की चाह में। ...जैसे बहुत लंबी मरुथली यात्रा के दौरान हरे पेड़ की छाँव! ✍️ चिराग़...
रिस्क
मेरे भीतर दौड़ना चाहती है इक नदी दरदरे रेगिस्तान की ओर। मस्तिष्क ने कहा- "रिस्क है इसमें।" मन बोला- "जुआ ही तो है या तो लहलहा उठेगा रेगिस्तान या दरदरा जाएगी...
लव इन दिल्ली-यूनिवर्सिटी
मौरिस नगर के नुक्कड़ों को आज भी याद हैं हज़ारों निशब्द प्रेम कहानियाँ जिनका पूरा सफ़र तय होकर रह गया आँखों-आँखों में ही। लेकिन अब ये प्रेम कहानियाँ ऐसी ख़ामोशी से नहीं बनतीं। अब दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ लिखकर अपने अधिकार जान गया है प्रेम। अब लोक-लाज और पिछड़े हुए समाज से आगे निकलकर ‘निरुलाज़’ और...
ऐब्स्ट्रेक्ट
किसी की याद के कुछ रंग यक-ब-यक बिखर जाते हैं ज़ेहन के कॅनवास पर। और मैं ठहर कर निहारने लगता हूँ उस कलाकृति की ख़ूबसूरती को। बूझने लगता हूँ अतीत के स्ट्रोक्स की जटिल पहेलियाँ। आज तक समझ नहीं पाया हूँ कि ये ऐब्स्ट्रेक्ट बना तो बना कैसे? ✍️ चिराग़...
