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स्वावलंबी प्रकृति

हम तब तक किसी काम को टालने का प्रयास करते हैं, जब तक उस कार्य को करना अपरिहार्य न हो जाए। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। काम को टालने के हमारे पास अनगिनत उपाय हैं। और उचित अवसर की प्रतीक्षा, कार्य को टालने का सर्वाधिक प्रयुक्त बहाना है। जिसे कार्य करना होता है, वह...

अतीत से सामना

सामने आ गए आज फिर हम आज फिर से संभलना पड़ेगा एक-दूजे से ख़तरा नहीं है ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा आँख से तुम बरसने न दो बदलियाँ काँपकर सब बयां कर न दें उंगलियाँ चल न आना मेरी ओर सब भूलकर बोलने लग न जाएँ कहीं पुतलियाँ नेह को कब दिखी कोई सीमा देह को ही समझना पड़ेगा...

उर्दू और भारत

अगर भाषाओं से धर्म की पहचान होती तो हिन्दी के पास रसखान और रहीम नहीं होते तथा उर्दू के पास फ़िराक़ और गुलज़ार नहीं होते। राजनीति को मुर्गे लड़ाने का चस्का हो, तो वह कहीं और जाए, भाषाएँ तो आश्रमों की संतति होती हैं। रामप्रसाद बिस्मिल और भगतसिंह की भाषा को पराया मानने...

भीड़ हैं हम

हमने ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसने हमें ‘भीड़’ से ‘जनता’ बनाना चाहा। हमें भीड़ बने रहना पसंद है। हम भीड़ बनकर जीते हैं और भीड़ बनकर मर भी जाते हैं। इसीलिए हमारे अख़बारों की सुखिऱ्याँ हमारा नाम नहीं जानतीं। कभी यात्री, कभी श्रद्धालु, कभी किसान, कभी तीर्थयात्री, कभी...

अपराधी कौन

महाभारत के महाविनाश की दोषी न तो दुर्योधन की हठधर्मिता है, और न ही धृतराष्ट्र की नेत्रहीन महत्वाकांक्षा! महाभारत के युद्ध में जो रक्तपात हुआ उसका गोमुख उस पट्टी से निसृत है जो सनेत्रा गांधारी ने अपने विवेक की आँखों पर बांध ली थी। ठीक इसी तरह वर्तमान दुर्घटनाओं के लिए...
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