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बोगनवेलिया

सारा शहर सज उठा है तुमसे बरसात नहीं हुई तो भी… मायावी हो तुम बोगनवेलिया कभी कतार बाँध कर खड़े हो जाते हो तेज़ दौड़ती सड़क के दोनों ओर कभी लिपट जाते हो किसी वृक्ष से और कभी ऐसे ही बस उग आते हो निरुद्देश्य जहाँ-तहाँ तुम ऊँच-नीच नहीं जानते छोटा-बड़ा भी नहीं भाषा-धर्म समझते ही...
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