मीडिया : एक चेहरा ये भी
हमारे मुल्क़ की क़िस्मत में ये विस्फोट क्यूँकर था
शहर से गाँव तक माहौल कल दमघोट क्यूँकर था
पसीना चू रहा था सबकी पेशानी से पर फिर भी
ख़बर पढ़ते हुए उनके बदन पर कोट क्यूँकर था
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
हमारे मुल्क़ की क़िस्मत में ये विस्फोट क्यूँकर था
शहर से गाँव तक माहौल कल दमघोट क्यूँकर था
पसीना चू रहा था सबकी पेशानी से पर फिर भी
ख़बर पढ़ते हुए उनके बदन पर कोट क्यूँकर था
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से
न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन
न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से
वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत
हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से
ये दहशतग़र्द अब इस बात से आगाह हो जाएँ
कि अब आवाम की बढ़ने लगी हिम्मत धमाकों से
वज़ूद अपना जताने के लिए वहशी बने हैं जो
उन्हें हासिल नहीं होती कभी शोहरत धमाकों से
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
याद है मुझको अभी भी
मैंने तुमको
एक जीती-जागती कविता कहा था।
सुन के तुम शरमा गई थी
खिलखिलाकर हँस पड़ी थी
और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में
चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए
मेरी आँखों में उतर आई थी तुम।
याद है मुझको
कि उस लम्हा
बिना सोचे ही तुमने
टप्प से उत्तर दिया था-
“तुम भी तो कोई रिसाला हो मुक़म्मल।”
आज समझा हूँ तुम्हारे
उस सहज उत्तर के मआनी,
मैं रिसाला हूँ
कि जिसको
हर घड़ी इक और ताज़ा वाक़या
या हादसा बुनना पड़ेगा।
मैं रिसाला हूँ
मुझे कुछ राज़ की बातें छिपाकर
ज़ेह्न में रखना ज़रूरी था।
पर तुम्हें मज़मून सारा
कह सुनाया बीच में ही
ख़ुद रिसाले ने
अनमने मन से मगर
थामा हुआ था
हाथ में तुमने, रिसाला;
बस रिसाले की ख़ुशी के वास्ते
और आख़िरकार इक दिन
ऊबकर तुमने
रिसाला बीच में ही छोड़कर
अपनी ख़ुशी की राह पकड़ी।
….ऊबना ही था तुम्हें!
पर तुम्हें अब भी मुक़र्रर
गुनगुनाना चाहता हूँ
क्योंकि कविता हर दफ़्अ
उतनी ही ताज़ा जान पड़ती है।
✍️ चिराग़ जैन
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