Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
किसी गाँव में आम का एक पुराना बाग़ था। बाग़ में आम के सैंकड़ों पेड़ थे। लेकिन बाग़ पर किसी की कोई मिल्कियत नहीं थी। जब आम की ऋतु आती थी तो इन पेड़ों पर ख़ूब आम लगते। गाँव के शरारती लड़के, आम से लदी डालियों को बेरहमी से नोच डालते।
जिसका एक पिता नहीं होता, उसकी सफलता पर उसके अनेक बाप पैदा जाते हैं। यही इस आमबाग़ की स्थिति थी। फल लगने पर पूरा गाँव इस बाग़ के फल खाता, लेकिन इसकी देखभाल करने कभी कोई नहीं आता।
मुद्दतों से बेचारा बाग़ स्वयं ही अपनी देखरेख कर रहा था। फल के मौसम में जो आम स्वतः धरती पर गिर जाते, वे अपने आप ही बरसात के पानी के भरोसे पनप जाते थे। इस तरह बाग़ में नये वृक्ष उगते रहते थे। हाँ, यदि कभी कोई वृक्ष बीमार हुआ तो वह भी इलाज न मिलने के कारण अपने आप ही ठूठ में तब्दील हो गया।
निराई और सफाई के अभाव में बाग़ में उगी खरपतवार भी स्वयं को वृक्ष समझने लगी थी। एक दिन गाँव के एक युवक, हरिया ने इस बाग़ के प्रति कृतज्ञताज्ञापन करने की सोची। उसने स्वतः सिंचित इस बाग़ में सिंचाई के लिए ट्यूबवेल लगवाया। दिन-रात परिश्रम करके निराई, सफाई और छँटाई शुरू की।
लावारिस आम के पेड़ों को इस तरह सँवारते देखा तो गाँववालों ने हरिया पर यह आरोप लगाना शुरू किया कि यह बाग़ पर कब्ज़ा करना चाहता है। इस आरोप की परवाह न करते हुए कर्मठ हरिया खरपतवार हटाते हुए आम के पेड़ों की दशा सुधारने में रत रहा।
कभी किसी ने सरकारी दफ़्तर में जाकर उसकी शिक़ायत की, तो वह कलेक्टर ऑफिस में जाकर अपनी नीयत का स्पष्टीकरण दे आया। किसी ने गाँव के बुजुर्गों को उसके खि़लाफ़ भड़काने का प्रयास किया तो बुज़ुर्ग बाग़ पर आ पहुँचे, लेकिन उसकी लगन और मेहनत देखकर उसे चेतावनी की बजाय शाबासी देकर लौट गये।
हरिया इतने बड़े बाग़ में अकेला जुटा रहा। ज्यों-ज्यों बाग़ की दशा सुधरने लगी, त्यों-त्यों गाँव का एक तबका हरिया की प्रशंसा भी करने लगा। लेकिन बाग़ की डालियाँ नोचनेवाले शरारती लड़कों का अब बाग़ में मनमाना प्रवेश अवरुद्ध हो गया। उधर जो खरपतवार स्वयं को बाग़ का हिस्सा समझने लगी थी, उसे हरिया ने जड़ से उखाड़कर बाग़ से बाहर फेंकना शुरू कर दिया।
आजकल खरपतवार और शरारती लड़कों ने हरिया के विरुद्ध अभियान छेड़ रखा है। मालिकाना हक़ की अफ़वाह झूठ साबित हो जाने के बाद गाँव के लड़के गाँववालों को यह कहकर भड़का रहे हैं …कि हरिया ने बाग़ के आम खाने के लिए यह सब काम शुरू किया है। …कि हरिया बाग़ की देखभाल करने के बहाने धंधा कर रहा है।
उधर, बाहर पड़ी खरपतवार उन पेड़ों के कान भर रही है, जो अभी हरिया की साफ-सफाई के दायरे में नहीं आ सके हैं।
गाँव के बुजुर्ग हरिया के अनवरत श्रम में बाग़ का सुव्यवस्थित भविष्य देख पा रहे हैं, लेकिन ज़मीन का शोषण करनेवाली खरपतवार और डालियों को नोचनेवाले अमानुष, हरिया से नाराज़ हैं। उन्हें यह बात समझ ही नहीं आ रही कि आम खाने के लिए किसी को बाग़ में पसीना बहाने की ज़रूरत नहीं थी। यदि हरिया यह सफाई अभियान न छेड़ता, तब भी वह बाग़ के फल तो खा ही रहा था।
हरिया ने बचपन से सुना है कि भले का अंत भला ही होता है, उपद्रवियों ने सुन रखा है कि बार-बार बोला गया झूठ, एक दिन सच साबित हो जाता है। इन दोनों तथ्यों के बीच, हरिया अनवरत आम के पेड़ों को दुलार रहा है। बाग़ हरिया के प्रति कृतज्ञ तो है, लेकिन उस खरपतवार से निगाह नहीं हटा पा रहा है, जो रह-रहकर जड़ों के रास्ते बाग़ में घुसने की जुगत लगाती रहती है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
सुना है, कुछ वर्ष पूर्व मुम्बई में कोई परिवार, एक पत्रकार को दोषी ठहरा कर आत्मघात कर गया। मुम्बई पुलिस ने मुआमले की तफ़्तीश की और बिना किसी पर आरोप सिद्ध किये, मुआमला बन्द हो गया।
सुना है, इस बीच मुम्बई में बैठी सरकार के साथ दिल्ली में बैठी सरकार का झगड़ा हो गया। परिवार बँटा तो घर के बर्तनों से लेकर चाटुकारों तक को बाँट लिया गया।
सुना है, इस मांडवाली में उक्त पत्रकार दिल्ली वाली सरकार के हिस्से आ गया और उसने मुम्बई वाली सरकार के खि़लाफ़ ख़ूब ज़हर उगला।
सुना है, मुम्बई सरकार ने उक्त पत्रकार को उसकी औक़ात याद दिलाने के लिये आत्महत्या वाले उस मुआमले को फिर से खुलवा दिया और उस पत्रकार को गिरफ़्तार करवा लिया।
सुना है, इस देश में पुलिस जनता के लिये काम करती है।
सुना है, इस देश में पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है।
सुना है, इस देश में न्यायपालिका भी है।
सुना है, इस देश में जनता का शासन है।
सुना है, आत्महत्या करने वाले परिवार ने भी ऐसी कई बातें सुन रखी थीं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
सुना है कि चिरैया के नुचे हुए पंखों को उसके घोंसले की मिट्टी नसीब न हो सकी। रात के अंधेरे में घरवालों को घर में बन्द करके पुलिस ने बिटिया की चिता जला दी। उसकी मिट्टी से लिपटकर रो लेने का भी अधिकार न मिल सका लाचार परिवार को।
सुनते हैं, इस देश में कोई असुरक्षित महसूस करे तो पुलिस उसे सुरक्षा देती है। लेकिन अपने आंगन की निरपराध चिरैया का दाह संस्कार करने का अधिकार मांगनेवाले परिवार से पुलिस को न जाने कौन-सी असुरक्षा महसूस हुई होगी। जेल में बन्द दुर्दांत अपराधी के परिवार में कोई मौत हो जाए तो उसे भी अंतिम संस्कार में शामिल होने की छूट मिल जाती है, लेकिन यह क्या था कि परिवार में मौत होने पर निरपराध परिवार को घर में क़ैद करके अंतिम संस्कार किया गया। हो सकता है कि अव्यवस्था को रोकने के लिये प्रशासन को यह आवश्यक जान पड़ा हो, किन्तु मनुष्यता के लिए यह कृत्य उस अपराध से कम नहीं था, जिसके कारण उस आंगन की चहक मातम में बदल गई।
इंद्रजीत की मृत्यु के बाद श्रीराम ने पुत्र के अंतिम संस्कार तक युद्ध विराम की घोषणा करके शोकग्रस्त शत्रु को जो अभय दिया था, कल रात हाथरस में उस परम्परा की चिता जल गई।
इस देश का तंत्र एक आमूल-चूल परिवर्तन की बाट जोह रहा है। स्पष्ट शब्दों में सुन लीजिए, क़ानून की आँखों में धूल झोंकने पर आप जिसकी पीठ थपथपाएंगे, वह एक दिन आपकी आँखों में धूल ज़रूर झोंकेगा। इसलिए, अच्छा अथवा बुरा, सशक्त अथवा कमज़ोर; जो भी लिखित संविधान हमारे पास है; उसका मखौल बनाने की इजाज़त किसी को नहीं मिलनी चाहिए; फिर चाहे वह पुलिस हो या अपराधी!
एक बेटी कल रात मिट्टी हो गई। जाओ चिरैया, तुम्हारे पोर-पोर पर हुए घाव किसी पोस्टमार्टम रपट में कम या ज़्यादा दर्ज हो जाएंगे; लेकिन तुम्हारी आत्मा पर जो खरोंचें पड़ी हैं उनकी सिसकी लिखने के लिए कोई पोथी पूरी न पड़ेगी। अब हम तुम्हारी जाति पर चर्चा करके तुम्हारे मनुष्य होने के अधिकार का हनन करेंगे; अब हमारा तंत्र तुम्हारे बयान बदलने की कहानियाँ गढ़कर तुम्हारे प्रति उपजी संवेदनाओं पर आरी चलाएगा। अच्छा हुआ बिटिया, तुमने आँखें मूंद लीं, वरना इस देश में न्याय की तलाश में तुम्हें यह तंत्र बार-बार वह हादसा दोहराता हुआ दिखता।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
फूलों का सौंदर्य निरखने
बगिया में दुनिया आती है
रंग लुभाते हैं आँखों को
गंध भ्रमर को ललचाती है
लेकिन हर ललचाने वाला
सुख की घड़ियों का ग्राहक है
जड़ में जिसका लगा पसीना
इस उपवन पर उसका हक़ है
शोभा बढ़ती है उपवन की
रूप निरखने वालों से भी
फूलों का मकरंद निखरता
उसको चखने वालों से भी
लेकिन मधुबन उसका होगा
जो ये फूल उगाने आया
तुम सब खिल जाने पर आए
पर वो इन्हें खिलाने आया
तुम उत्सव के अभिनेता हो
वो संघर्षों का नायक है
जिसने सींचे हैं सब पौधे
बस मधुबन पर उसका हक़ है
मंदिर-मंदिर द्वारे-द्वारे
तुमने केवल हाथ पसारे
ईश्वर के व्यापारी बोलें-
ईश्वर हैं क्या सिर्फ़ तुम्हारे?
पूजक बनकर तुमने केवल
इच्छाओं का भार दिया है
छैनी ने आकार दिया है
शब्दों ने विस्तार दिया है
देवालय में मूरत रखकर
शीश झुकाने वाले सुन लें
जिसने रूप गढ़ा मूरत का
बस भगवन पर उसका हक़ है
धरती उनकी है, जो आए
तिनका-तिनका नीड़ बनाने
उनका क्या जो निकल पड़े हैं
ध्वंस मचाती भीड़ बनाने
जो लालच से अभिप्रेरित है
उसका कुछ अधिकार नहीं है
विक्रेता, सर्जक से ऊँचा!
जीवन है, बाज़ार नहीं है
कंस, कालिया सबने केवल
गोकुल का दोहन करना था
जिसने वंशी के स्वर घोले
वृंदावन पर उसका हक़ है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
इससे वो ही बच पाया, जो औरों को मरवाए
न्याय भवन में जनहित का इक ढोंग चलाया जाता है
ऊँची-ऊँची बातें करके पास बुलाया जाता है
फिर धोखे से इस चौसर के पासे बदले जाते हैं
इस दलदल में धर्मराज तक अपराधी बन जाते हैं
सिंहासन तन-मन से अंधा, वीर पड़े मुँह बाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
न्याय, मूर्ति बनकर बैठा है, षड्यंत्रों का मेला है
नियमों का इक चक्रव्यूह है, जिसमें सत्य अकेला है
आरोपी पर धाराओं के शस्त्र चलाए जाते हैं
नियमों का खिलवाड़ बनाकर वीर गिराए जाते हैं
सच के साथी प्रथम द्वार तक, पार नहीं कर पाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
वो जिसने आरोप लगाया, उससे प्रश्न करेगा कौन
ढोंग किसी का, क्षोभ किसी का, लेकिन मोल भरेगा कौन
राजभवन के जयकारों की क़ीमत कौन चुकाता है
सत्ता का अन्याय जगत् में मर्यादा कहलाता है
सच ख़ुद को साबित करता है, झूठ खड़ा इतराए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
✍️ चिराग़ जैन