+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

नेह का दर्प

प्रेम की धारा में तुम निर्बाध बह पाते
काश मुझसे एक पल तुम सत्य कह पाते

जब कोई अपनत्व था चरितार्थ तुममें
जब कभी जागा हो कोई स्वार्थ तुममें
क्यों मेरा संकोच बदला आग्रहों में
कौन सा अधिकार था उनकी तहों में
काश उस मनुहार का तुम अर्थ गह पाते

जब किसी घटना से आहत हो गया मन
जब क्षणिक आवेश में रत हो गया मन
जब मेरे मन में घना विक्षोभ जागा
जब मेरी वाणी ने तुम पर क्रोध दागा
काश मेरे नेह का तुम दर्प सह पाते

✍️ चिराग़ जैन

उम्मीद के बिना

तुम हमेशा
मुझे दोषी ठहराती हो
कि मैं अपने रिश्तों में
उम्मीदें बहुत रखता हूँ

लेकिन समझ नहीं पाता हूँ मैं
कि उम्मीद के बिना
निभ ही कैसे सकता है
कोई रिश्ता

…..उम्मीद के बिना तो
दान तक नहीं दिया जाता!

✍️ चिराग़ जैन

कम्मो मिल गई बीच बाज़ार

कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
बीवी लड़ने कू तैयार

कम्मो ने मुस्का कर देखा, बीवी हो गई ढोल
चार दिनां से बोल रही ना हमसे मीठो बोल
कम्मो ही बढ़िया थी यार

कम्मो मिली मगर की हमने एक न मन की बात
एक तरफ बीवी लतियाये एक तरफ जज़्बात
फिर से जागा सोया प्यार

ऐसी मिली घड़ी भर कम्मो खड़ी हो गई खाट
बीवी मुँह फेरे लेटी है, घर के रहे न घाट
हमपे पड़ी दुतरफ़ा मार

हालचाल तक पूछ न पाए, मुफ्त हुए बदनाम
कम्मो छूटी, बीवी रूठी, माया मिली न राम
उल्टे गले पड़ गई राड़

कर-कर हार गए मनुहार, कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
अब तो डाल दिए हथियार, कम्मो मिल गई बीच बाज़ार

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!