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परदेसी जीवन

1 ये है हासिल विदेश जाने का ध्यान रखता हूं दाने-दाने का कौन मुझको दुलारता आकर फायदा क्या था कुलबुलाने का 2 जाने क्या बन के रह गया हूँ मैं ध्यान रखता हूँ दाने-दाने का घर कहीं, मैं कहीं, सुक़ून कहीं ये है हासिल विदेश जाने का ✍️ चिराग़...

अविश्वास

विलीन नहीं हो पाता है अविश्वास कभी भी किसी भी सम्बन्ध से। केवल ढँक लेती हैं उसे प्रेम, अपनत्व, सौहार्द और नेह की परतें …किसी-किसी सम्बन्ध में …कुछ समय के लिए। शायद इसीलिए प्रकट हो जाता है दोबारा प्रेम का पर्दा गिरते ही! दृश्य बदलते ही नेपथ्य से निकल चला...

सीधी सी बात

ग़ज़ब है हर बार ढूंढ़ लाती है कोई न कोई बहाना इनकार के लिए। वही पुरानी बातें वही पुराने बहाने वही पुराने हाव-भाव वही पुराने तौर और तो और झेंप, शर्म और आँखें चुराना भी जस का तस। …ये सब तो मैं फिल्मों में भी देख चुका हूँ सैंकड़ों बार। इतनी बड़ी हो गई इत्ती-सी बात समझ...
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