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रात के अंधेरे में

सुना है कि चिरैया के नुचे हुए पंखों को उसके घोंसले की मिट्टी नसीब न हो सकी। रात के अंधेरे में घरवालों को घर में बन्द करके पुलिस ने बिटिया की चिता जला दी। उसकी मिट्टी से लिपटकर रो लेने का भी अधिकार न मिल सका लाचार परिवार को। सुनते हैं, इस देश में कोई असुरक्षित महसूस...

कर्ण का परिताप

तुम प्रपंचों में समय अपना खपाना मैं समर के हर नियम को मान दूँगा तुम बदलकर वेश मुझसे मांग लेना मैं कवच-कुण्डल ख़ुशी से दान दूँगा हाथ की सारी लकीरें हैं विरोधी अब भला कुछ झोलियों का रीतना क्या न्याय से या सत्य से सम्भव नहीं जो झूठ कहकर उस समर को जीतना क्या तुम निहत्थे...

ज्ञान की सजावट

भारत में समाज सुधारकों की भरमार रही है लेकिन समाज सुधर न सका। इसका यह अर्थ नहीं है कि समाज सुधारकों के मन में कोई बेईमानी थी। इसका कारण यह है कि हमारी ग्राह्यता और उनकी सम्प्रेषणीयता में तारतम्य नहीं था। यदि ऐसा न होता तो एक नानक ही पर्याप्त थे समूची मानवता के लिए। एक...

आंदोलन या उपद्रव

जाटों के उपद्रव को ‘आंदोलन’ कहकर मिडिया भी कम नुक़सान नहीं कर रहा। मैं सरकार से गुर्जरों, जाटों और पटेलों को नौकरियों में आरक्षण देने की मांग करते हुए अपेक्षा करता हूँ कि इनसे तब तक “बिना वेतन नौकरी” करवाई जाए जब तक इनके उपद्रवों से हुए नुक़सान...

लड़ाई की संभावनाएं

सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो...
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