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ग्लोबल वार्मिंग

मेघों का जल घट रहा, सूरज उगले आग धरती धू-धू जल रही, मानव अब तो जाग तप्त धरा, बादल विफल, गया संतुलन डोल रे मानव अब तो संभल, अब तो ऑंखें खोल मानव अब क्यों हो गया, आखिर बिल्कुल मौन तूने ही छलनी करी, दिव्य परत ओज़ोन तितली, धुरवा, बीजुरी, पाला, सावन, कूप धीरे-धीरे धर रहे,...
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