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मंच से मन तक कुछ अलग : डॉ. हरिओम पंवार

सृजन के आश्रमों में साधना करनेवाले साधक, अपने किसी पूर्ववर्ती का अनुसरण करें -यह सामान्य है। शैली, कहन और पठंत के आधार पर किसी वरिष्ठ से प्रेरणा लेना या प्रभावित हो जाना कविता और कवितापाठ की परम्परा ही है। किन्तु, इस परम्परा की स्वीकार्यता को जानते हुए भी अपनी अलग...

सृजन सुख

इस तपोवन में सृजन की साधनाएँ चल रही हैं ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है मन गहन संवेदना अनुभूत करने में जुटा है तन अभी स्वर-व्यंजनों में प्राण भरने में जुटा है भाव का उत्कर्ष छूकर नयन खारे हो रहे हैं इस सृजन सुख में जगत् के डर किनारे हो रहे हैं शब्द से सच का...

गीत की चेतावनी

आज फिर एकांत की उंगली पकड़कर सोच को अपनत्व की बाँहों में भरकर कोई बोला प्राण का संगीत हूँ मैं ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं अक्षरों के वस्त्र ओढ़े हैं बदन पर भंगिमा में भाव का विस्तार देखो शब्द के आभूषणों से हूँ अलंकृत नयन में रस की अलौकिक धार देखो मैं सुदामा की...

कविता और सत्ता

पौराणिक सन्दर्भों से लेकर आज तक गुरुकुल और कविता ने सत्ता का निर्देशन किया है। चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त हो या सिकंदर सरीखा विश्वविजेता; सभी ने गुरुकुल की तर्जनी का सम्मान किया है। यह व्यवस्था इसलिए भी अपरिहार्य है कि सत्ता जनभावना से सीधे संपर्क में नहीं रह पाती।...

अमर पंक्तियों का व्याकरण

किसी पंक्ति में ऐसा क्या विशेष होता है कि वह अचानक युगजयी हो जाती है! हज़ारों-लाखों लोगों ने पूरा-पूरा जीवन लगा दिया काव्य रचने में, लेकिन पूरी दुनिया में उंगली पर गिने जाने योग्य कविताएँ ही अमर हुई हैं। और जो अमर हुई हैं उन पंक्तियों के शब्द शिल्प में कुछ असाधारण...
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