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प्रीत का अवतरण

जब किसी राधिका ने सुरों को छुआ लोक बस बाँसुरी में मगन हो गया प्रेम ने फुसफुसा कर कहा जो कभी अनहदी राग वह इक कथन हो गया द्वार पर एक जोगी खड़ा भरतरी एक पल में पराया किया प्रीत को था कठिन द्वार पर भूल कर प्रेम को पीठ पर लाद लाना किसी जीत को पींगला की व्यथा आंख से बह चली...
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