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पराजित विजेता

आंधी के आघात सहे हैं ये शाखों के साथ बहे हैं सूखे हुए पड़े जो भू पर इनके कोमल गात रहे हैं हर मौसम से जूझे हैं ये, जूझे हैं, फिर टूट गए हैं ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं तूफानों का वेग सहा है, अब झोंकों से डरते हैं ये अपनी पूरी देह कँपाकर, उपवन में स्वर...

आकलन और आलोचना

जो लोग कला फ़िल्मों के मापदण्ड से सी-ग्रेड सिनेमा का आकलन करने निकले हैं, उनकी बुद्धि किसी का आकलन करने के लिए सक्षम नहीं है। वे आलोचना करने के प्रयास में विद्रूपता को प्रचारित कर रहे होते हैं और उन्हें आभास भी नहीं होता कि वे क्या पाप कर रहे हैं। सिद्धांत तो यह है कि...

तो क्या हुआ

तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता...

नवजीवन

सबकी नज़र पीर से सूखी, मेरी नज़र ख़ुशी से नम है जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है क्या सोचा था, शाख कटेगी तो मैं माली को कोसूंगा जो छिल-छिलकर क़लम बन गयी, मैं उस डाली को कोसूंगा जिसके दम पर पूरा गुलशन स्वस्थ रहा है, पुष्ट रहा है क्या सोचा था, इस गुलशन की उस...

यात्रा

अब तक पथ पर फूल बिछे थे नयन लुभावन चित्र खिंचे थे अब इक कंकड़ चुभ जाने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा जिस क्यारी को हाथ लगाया, उसमें फूल खिले; क्या कम है? जिस पगडण्डी को अपनाया, उस पर मीत मिले; क्या कम है? रेले-मेले, खेल-तमाशे, उत्सव के पल पाये यहाँ से अब कुछ सन्नाटा...
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