Chirag Jain Writings, Geet, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
तेरी पलकों में सपनों की दुनिया अब आबाद नहीं
मेरी यादें तेरे दिल तक पहुँचाती आवाज़ नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?
तू मुझको रजनीबाला का मूर्तरूप सी लगती थी
बातें तेरी, मुझे पौह की मधुर धूप सी लगती थी
तेरा यौवन मुझे पंत की सोनजुही में दीखा था
तूने मेरी यादों में रातों को जगना सीखा था
वो सारी बातें अब तेरे जीवन की सौगात नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?
फिल्मी गाने हम दोनों को आत्मकथा-से लगते थे
मेरे आँसू तुझको अपनी मौन व्यथा से लगते थे
इक-दूजे से आँख मिला हम बिन कारण मुस्काते थे
मिलने की उत्सुकता में जल्दी सोकर उठ जाते थे
अब बेचैनी से मन में उठते वो झंझावात नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?
बस की पिछली सीट पे बैठे हम घण्टों बतियाते थे
इक-दूजे के कंधे पर सिर रखकर हम सो जाते थे
मेरे मन की बातें तू बिन बोले ही सुन लेती थी
मेरी मुस्कानों के मतलब मन ही मन गुन लेती थी
क्या अब तेरे अंतस में वो मधुर प्रेम का राग नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?
घर वालों के लिए रोज़ हम नए बहाने गढ़ते थे
इक-दूजे के पत्र किताबों में रख-रखकर पढ़ते थे
हम दोनों को साथ देखकर दुनिया ताने कसती थी
लोगों की बातें सुनकर तू हौले-हौले हँसती थी
सोचा करते थे, छोड़ेंगे इक-दूजे का साथ नहीं
तुझको कुछ भी याद नहीं?
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
मैं अब जिन दोगलों के बीच रहकर ख़ूब रोता हूँ
मैं उनसे देर तक लम्बी ज़िरहकर ख़ूब रोता हूँ
मेरी मासूमियत तो बहुत पहले मर चुकी लेकिन
मैं सच बतलाऊँ अब भी झूठ कहकर ख़ूब रोता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा
हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है
पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है
चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है
धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है
कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका
शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है
इस शरारत से भी कलियों को मज़ा आता है
सबसे नज़रें बचा के कलियाँ चटक जाती हैं
फूल खिलते हैं तो गुलशन में बहार आती है
पर ये रंगीन फ़ज़ा और ये गुलशन की बहार
वक़्त के साथ वीराने में बदल जाती है
धूप की तल्ख़ी उड़ाती है रंग फूलों का
आंधियाँ नूर की महफ़िल को फ़ना करती हैं
पत्तियाँ सूख के तिनकों की शक़्ल लेती हैं
तिनके गुलशन में बेतरतीब बिखर जाते हैं
चांदनी टूट के रोती है इस तबाही को
अब इसे देखने कोई यहाँ नहीं आता
कोई हलचल यहाँ दिखाई ही नहीं देती
अब ये गुलशन यूँ ही वीरान पड़ा रहता है
एक कोने में कहीं ज़र्द से पत्तों में छिपा
एक बिरवा किसी का इंतज़ार करता है
उसको मालूम है कल फिर से बहार आएगी
फिर से सूरत इसी गुलशन की सँवर जाएगी
यही गुलशन, यही पत्ते, यही गुंचे मिलकर
पूरे आलम को बहारों से फिर सजा देंगे
ज़र्द पत्तों में ये वीराना दुबक जाएगा
हर तरफ़ रंग का, ख़ुश्बू का नशा छाएगा
सूखे तिनके किसी का घोसला बन जाएंगे
फिर से सब लोग इस गुलशन में चले आएंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
मुहब्बत में सनम के बिन कोई मंज़र नहीं दिखता
सिवा दिलबर कोई भीतर कोई बाहर नहीं दिखता
किसी को हर तरफ़ महबूब ही महसूस होता है
किसी को दूर जाकर भी ख़ुदा का घर नहीं दिखता
✍️ चिराग़ जैन