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तुझको कुछ भी याद नहीं?

तेरी पलकों में सपनों की दुनिया अब आबाद नहीं मेरी यादें तेरे दिल तक पहुँचाती आवाज़ नहीं तुझको कुछ भी याद नहीं? तू मुझको रजनीबाला का मूर्तरूप सी लगती थी बातें तेरी, मुझे पौह की मधुर धूप सी लगती थी तेरा यौवन मुझे पंत की सोनजुही में दीखा था तूने मेरी यादों में रातों को...

ख़ूब रोता हूँ

मैं अब जिन दोगलों के बीच रहकर ख़ूब रोता हूँ मैं उनसे देर तक लम्बी ज़िरहकर ख़ूब रोता हूँ मेरी मासूमियत तो बहुत पहले मर चुकी लेकिन मैं सच बतलाऊँ अब भी झूठ कहकर ख़ूब रोता हूँ ✍️ चिराग़...

गुलशन

मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है इस शरारत से भी...

दिखावा

मुहब्बत में सनम के बिन कोई मंज़र नहीं दिखता सिवा दिलबर कोई भीतर कोई बाहर नहीं दिखता किसी को हर तरफ़ महबूब ही महसूस होता है किसी को दूर जाकर भी ख़ुदा का घर नहीं दिखता ✍️ चिराग़...
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