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समय का बारदाना

जब समय फंदा कसेगा भूमि में पहिया धँसेगा शाप सब पिछले डसेंगे पार्थ नैतिकता तजेंगे उस घड़ी तक जूझने का भ्रम निभाना है सब समय का बारदाना है नीतियों का ढोंग करतीं, सब सभाएँ मौन होंगी न्याय की बातें बनातीं मन्त्रणाएँ मौन होंगी जब प्रणय को भूलकर राघव निरे राजा बनेंगे तब सिया...

अस्तित्वों का महासमर

हम सब इस कारण ज़िन्दा हैं, शायद मर जाना दूभर है दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है जब तक सम्भव हो तब तक ये श्वास चलाने को ज़िन्दा हैं तन को इंधन दे पाएँ, बस भूख मिटाने को ज़िन्दा है शायद कुछ ऐसा कर जाएँ, दुनिया जिसको याद रखेगी जीवन भर का जीवन जीकर, फिर मर...

स्त्री तुम कल आना

स्त्री की सामाजिक स्थिति पर एक प्रभावी कटाक्ष है, अमर कौशिक निर्देशित फिल्म “स्त्री”। नारी मुक्ति के तमाम चलताऊ नारों और मोर्चों से हटकर पुरुषवादी समाज की सोच का शानदार चलचित्र है “स्त्री”। हालांकि फिल्म का प्रचार एक हॉरर-कॉमेडी की तरह किया जा...

आशाओं पर आघात

पतझर का आना निश्चित था पत्ते झर जाना निश्चित था हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला...

वृंदावन की याद

दुनिया का सारा वैभव है राजमहल की सुविधाओं में फिर भी कान्हा को रह-रह कर वृंदावन की याद आती है सोने-चांदी में भरकर जब इत्र बरसता है राहों में मन को गोकुल के सीधे-सादे सावन की याद आती है जब राजा के सैनिक घर से सारा माखन ले जाते थे हम पानी के साथ चने खाकर तकते ही रह जाते...
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