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प्रतीक्षा

कब उगेगा दिन, तुम्हारे आगमन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
कब कोई आकार होगा इस सपन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

मैं युगों से रोज़ लिख-लिखकर संदेशे
बादलों के हाथ भेजे जा रहा हूँ
शुद्धतम जल से चरण धोऊँ तुम्हारे
आँसुओं को भी सहेजे जा रहा हूँ
कब मुझे अवसर मिलेगा आचमन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

‘भोर की पहली किरण पर आओगे तुम’
-रात से हर रात ये ही कह रहा हूँ
सूर्य का उत्साह ठण्डा पड़ रहा है
और मैं भीतर ही भीतर दह रहा हूँ
हँस रहा मुझ पर हर इक तारा गगन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

चौखटों का नूर बुझने लग गया है
देहरी की आँख पथराने लगी है
बेर की हर डाल चुभने लग गयी है
मालती की देह कुम्हलाने लगी है
हो रहा नीरस निरंतर स्वर सृजन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

कौन जाने एक दिन मेरी कथा का
अंत, शबरी की कथा जैसा रहेगा
या निरन्तर बढ़ रही इस पीर का पथ
सिर्फ़ राधा की व्यथा जैसा रहेगा
बेर हूँ मैं या सुमन हूँ कुंजवन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
✍️ चिराग़ जैन

आस का पत्ता

ताल की आँखें सजल हैं
गन्ध की पाँखें विकल हैं
पेड़ पत्थर से हुए हैं
ख़्वाब नश्तर ने छुए हैं
पर अभी भी आस का दामन नहीं छूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

मुस्कुराहट पर बनावट का असर दिखने लगा है
हर क़दम पर अब कोई अनजान डर दिखने लगा है
नित नए अनुभव हमारी आस को खलने लगे हैं
रेत पर कुछ भ्रम हमारी प्यास को छलने लगे हैं
कष्ट बढ़ते जा रहे हैं
प्रश्न चढ़ते आ रहे हैं
आँख से आराम का सपना नहीं रूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

आँख के आगे कोई घेरा घनेरा छा गया है
है निपट एकांत, साये पर अंधेरा छा गया है
हर उजाला लुट चुका है, हर सहारा लुट चुका है
जो दिशा का ज्ञान देता वो सितारा लुट चुका है
आह का स्वर घुँट गया है
चाह का घर लुट गया है
हौसले का वक़्त ने झोला नहीं लूटा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

इस प्रतीक्षा के परे फिर से अहल्या श्वास लेगी
और शबरी के चखे हर बेर की क़िस्मत जगेगी
जानकी के पास सागर लांघ आएगी अंगूठी
भोर से पहले उठा ले आएंगे हनुमान बूटी
कष्ट जब हद से बढ़ेगा
देव को आना पड़ेगा
ये अटल विश्वास हो सकता नहीं झूठा
आखि़री पत्ता नहीं टूटा

✍️ चिराग़ जैन

मेरी ख़ामुशी पहचानो

अब उनका इंतज़ार छोड़ भी दो शानो तुम
ख़ुदकुशी कर लो कहीं अब मिरे अरमानो तुम

जुबां से कुछ न कहूँगा कभी, ये जानो तुम
जो हो सके तो मेरी ख़ामुशी पहचानो तुम

अब अपने बीच नहीं है वो मरासिम क़ायम
कि ख़ुद को मेरी उदासी की वजह मानो तुम

कभी तो दुनिया से मतलबपरस्ती भी सीखो
सदा दीवाने ही रहोगे क्या दीवानो तुम

किसी ‘चिराग़’ को जलने नहीं देना हरगिज़
नहीं तो जान गँवा बैठोगे परवानो तुम

✍️ चिराग़ जैन

वक़्त की सरहदें

प्यार ने लांघ दीं वक़्त की सरहदें
और सारे नियम देखते रह गए
इश्क़ हम पर ठहाके लगाता रहा
हम मुहब्बत के ग़म देखते रह गए

लोक-परलोक की धारणा से परे
शबरियों की प्रतीक्षा अटल ही रही
लोग कहते हैं राधा वियोगिन बनी
कृष्ण से पूछिये वो सफल ही रही
प्रेम से मृत्यु का भय पराजित हुआ
स्तब्ध से मौन यम देखते रह गए

एक कच्चे घड़े पर भरोसा किए
सोहनी तेज़ धारा में ग़ुम हो गई
कैस दर-दर भटकता रहा उम्र भर
और लैला सहारा में ग़ुम हो गई
रूह का आसमां में मिलन हो गया
जिस्म धरती पे हम देखते रह गए

कोई तो इस ज़माने को समझाइये
क़ायदे बावरों को सिखाता रहा
जो दीवाने हुए प्रेम के पान से
उनको विष के पियाले पिलाता रहा
प्रेम विषपान करके अमर हो गया
सारे ज़ुल्मो-सितम देखते रह गए

✍️ चिराग़ जैन

तलाश

रेल की खिड़की में बैठी तुम
अपनी हथेलियों में
तलाशती रह गईं मुझको
और प्रेम
सरसों सा फूलता रहा
धरती की हथेलियों में पड़ी
लोहे की लम्बी लकीरों के
दोनों ओर
दूर तक
…बहुत दूर तक।

✍️ चिराग़ जैन

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