Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
अप्रैल 2002 में मैंने कवि-सम्मेलनों में कविता पढ़ना प्रारम्भ ही किया था कि रोहिणी (दिल्ली) के एक कवि-सम्मेलन में एक पतले-दुबले कवि के दर्शन हुए। देहयष्टि प्रभावी नहीं थी लेकिन उनके भीतर के कवित्व और आँखों के सम्मोहन से मैं अछूता न रह सका।
मुझे याद है कि उस दिन उस मंच का संचालन भी उन्होंने ही किया था। छोटे माइक पर अर्द्ध-पद्मासन लगाकर जब वे मसनद पर विराजित हुए तो ऐसा लगा कि विद्वत्ता साकार होकर मंच का मोर्चा संभाल रही है। मुखर हुए तो ऐसा लगा जैसे शब्दों का प्रक्षालन करके उन्हें साधकर प्रस्तुत करने का आदेश पालन हो रहा हो। कवि-सम्मेलन के बीच जहाँ कहीं हास्य का प्रसंग हुआ तो उनकी भाव-भंगिमा में शरारत घुल गयी।
उस दिन मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा और व्यंजना से आच्छादित उनके व्यक्तित्व और प्रेम की विरह धारा से निर्मित उनके कृतित्व में एक संपूर्ण कवि को अनुभूत किया। उस दिन के बाद लम्बे समय तक उनकी संगत हुई।
उनका सान्निध्य मेरे भीतर करवट ले रहे ‘कवि’ को रोचक लगने लगा। यह दौर उनके संघर्ष का भी दौर था। संघर्षशील व्यक्ति से अधिक समृद्ध गुरुकुल कोई नहीं हो सकता। सो मैं उनकी ख़ूब संगत करता और विपरीत परिस्थितियों में उनके निर्णयों की सफलता और विफलता से जीवन का पाठ पढ़ता रहता।
किसी का आकलन करना मेरी प्रवृत्ति का अंश नहीं है, सो उनकी गतिविधियों और क्रियाकलापों को कभी सही और ग़लत के तराजू में तोलने की मैंने आवश्यकता महसूस नहीं की। मेरा मत है कि हर व्यक्ति एक ‘प्रवृत्ति’ होता है, और प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। इसी कारण उनके साथ बिताए लंबे-लंबे दिन और रात में मैं कभी परीक्षक बनकर नहीं, केवल शिक्षार्थी बनकर उपस्थित रहा।
अपनी भरपूर मेधा और शब्द-मंजुषा से उन्होंने मुझे ख़ूब निहाल किया। मैंने देखा कि संघर्ष से उपजने वाली खीझ से आँखें नम करने की बजाय दंतपंक्ति को आपस में रगड़ लेना अधिक कारगर सिद्ध होता है। मैंने देखा है कि जब परिस्थितियाँ चारों ओर से आघात कर रही हों तो थककर बैठ जाने की बजाय टूटे रथ का पहिया उठाकर जूझ जाने में सफल होने की गुंजाइश बची रहती है। मैंने देखा है कि उन्होंने रथ का पहिया उठाकर दर्जनों चक्रव्यूह भेदे हैं।
जो किसी का बुरा नहीं होता वह निष्क्रिय होता है। जो सक्रिय होगा उसे आलोचना मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन अपनी आलोचना से बिलबिलाने की बजाय दोगुनी ऊर्जा से जुटे रहना किसी को कुमार विश्वास बना सकता है।
राजनैतिक जीवन हो अथवा साहित्य जगत्… डॉ कुमार विश्वास ने बुलेटिन भर-भर आलोचना झेली है। सोशल मीडिया के ट्रोलर्स की चोट सहना आसान नहीं होता। डॉ विश्वास ने वह चोट बार-बार भोगी है। जब किसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की निंदा की कोई उचित दर दुकान नहीं मिलती तो निंदक उसकी निजता के गोदाम में प्रवेश करके ‘नियरे’ आने का प्रयास करने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने न तो जनता की सिम्पैथी से उन्हें खदेड़ा न ही गोदाम पर ताला लगाया… बल्कि भरे गोदाम में उन्हें रीते हाथ बाहर लौट आने पर विवश कर दिया।
2002 से 2022 तक के इस लंबे सफ़र में मैंने उनका अपनत्व और परायापन… दोनों भोगे हैं, लेकिन इस परायेपन में भी मैंने उनसे यह सीखा है कि एक फोन कॉल से किसी भी पराएपन को अपनत्व में बदला जा सकता है।
मेरे एक शे’र को दुबई के मुशायरे में उद्धृत करके डॉ कुमार विश्वास ने मुझे यह सौभाग्य दिया है कि मुझे अज़ीम शायर जनाब अहमद फ़राज़ ने फोन करके आशीष दिया। इस बात के लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। मेरी एक क्षणिका की घुमावदार पगडण्डी को उन्होंने न जाने कितने ही लोगों तक पहुँचाया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। उनसे नाराज़ भी बहुत कारणों से रहता हूँ, लेकिन वह हमारी निजता का विषय है…!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
मेरे इस लेख को वे लोग न पढ़ें जो स्वयँ को महिला आयोग का अघोषित अध्यक्ष समझते हुए किसी भी मुद्दे में महिला का नाम आते ही महिला को पीड़ित और बेचारी समझकर बुद्धि के कपाट बंद कर देते हैं। वे लोग भी इस पोस्ट से दूर रहें जो स्वयं को मन ही मन, भाजपा, आप, कांग्रेस या अन्य किसी दल का प्रवक्ता मान बैठे हैं और अपने-अपने दल का नाम आते ही सोचने-समझने की शक्ति को पैरों के नीचे रखकर उस पर खड़े होकर हो-हल्ला मचाने लगते हैं।
यह केवल उन लोगों के लिये है जो एक ही समय में एक ही व्यक्ति के जीवन की हर घटना को अलग-अलग करके उस पर सोच सकते हैं और किसी भी प्रकार के आग्रह से मुक्त होकर एक ऐसे चिंतन की आधारशिला पर खड़े हो सकते हैं जो समाज के उन्नयन के लिये अपरिहार्य हो चुका है। क्योंकि इस पोस्ट के प्रश्न जटिल न भी हों तो कड़वे ज़रूर हैं।
क्योंकि प्रश्न यह है कि हाथ हिला-हिलाकर किसी भी व्यक्ति के चरित्र, निर्णय, चाल-चलन और यहाँ तक कि संवेदना तक को सवालों के कठघरे में ला खड़ा करने वाले मीडिया एंकर क्या वास्तव में देश और समाज के लिये चिंतित हैं। प्रश्न यह है कि यदि कोई सवाल किसी की ज़िंदगी से भी बड़ा है, और उस सवाल ने पूरे मीडिया हाउस को झखखोर डाला है तो फिर उस सवाल की गंभीर और गर्मागर्म चर्चा के बीच ब्रेक लेने के निर्णय को टाला क्यों नहीं जा सकता। प्रश्न यह भी है कि स्वयं को निर्णायक मानकर किसी भी शख़्स से बैसिर-पैर के सवाल पूछनेवाले पत्रकार उसको जवाब देने तक का अवसर नहीं देते तो क्या जनता इस तानाशाही को समझ पाती है? सवाल यह है कि जंतर-मंतर पर फाँसी झूल जानेवाले गजेन्द्र की किशोर बेटी से जब यह पूछा जा रहा था कि आपके पिता आपसे क्या बातें करते थे तो क्या दर्शकों के भीतर इस संवेदनहीन मीडिया के प्रति कोई घृणा उत्पन्न हुई थी?
अभी एक टीवी चैनल पर वो मोहतरमा बैठी हैं जिन्होंने सोशल मीडिया पर वायरल हुई कुछ तस्वीरों को लेकर पहले उन पर क्षोभ जताया जिनकी वॉल पर ये तस्वीरें पोस्ट की गईं थीं। फिर उन्होंने यह कहा कि इस मामले से हुई बदनामी के कारण मेरे पति ने मुझे घर से निकाल दिया है।
उनके पति की मांग़ यह है कि कुमार विश्वास अगर इन आरोपों का खंड्न कर दें तो उनको संतोष हो जायेगा। सवाल यह है कि जिस लड़की के चरित्र पर लांछन लगा है क्या उसको स्टूडियो में बैठाकर उससे बार-बार चटखारे लेकर सारी रामकहानी पूछना क्या किसी बलात्कार से कम है? सवाल यह है कि महिला आयोग उस राम से प्रश्न क्यों नहीं पूछता जिसने सोशल मीडिया की एक अप्रमाणिक तस्वीर को आधार मानकर अपनी ब्याहता को घर से निकाल दिया, और अब उसे उस रावण की गवाही चाहिये जिसके साथ उसकी सीता का नाम जोड़ा गया है?
प्रश्न यह है कि यदि उन तस्वीरों के पीछे की कहानी में कोई सत्य होगा भी तो क्या कुमार विश्वास उसको सार्वजनिक रूप से स्वीकार करेंगे? यदि कुमार विश्वास के कथन की नैतिकता पर इतना ही विश्वास है तो फिर उनके चरित्र पर विश्वास करने में संकोच क्यों? प्रश्न यह है कि जब कुमार विश्वास ने मीडिया के सामने यह कह दिया कि इन ख़बरों में कोई सत्य नहीं है तो फिर पीड़िता की मांग पूरी क्यों नहीं हो गई? उसके पति के संदेह की खाई कैसे पोली रह गई?
प्रश्न यह है कि इस प्रकार के घटनाक्रम यदि इसी प्रकार सेंसेशनल बनाये जाते रहे तो क्या कोई स्त्री समाज और देश के हित कभी किसी भी मुहिम में आगे बढ़ पाएगी? क्या किसी व्यक्ति का सम्मान और पारिवारिक संबंधों की नींव किसी ऐरे ग़ैरे नत्थूख़ैरे के कह देने भर से तय होती रहेगी।
प्रश्न यह है कि हम पीड़ा में से ख़बर तलाशने से कब बाज़ आएंगे? प्रश्न यह है कि 8 मिनिट के विज्ञापनों से पैसा जुगाड़ने की हवस में बाक़ी के 22 मिनिट तक हम पत्रकारिता के मूल्यों को कितने गहरे कुँए में फेंकेंगे?
एक लड़की चिल्ला-चिल्ला कर अपने हाव-भाव और बातों से कुमार विश्वास को “बदमाश” सिद्ध करने पर उतारू है। अचानक वो भावुक हो गई क्योंकि महिला जो है, पीड़ित महिला जो है, लगातार जो है, उसके आँसू जो हैं, वो बह रहे हैं। इतनी देर में कैमरा लड़की की काजल घली आँखों में उतरे आँसुओं को एक्स्ट्रीम क्लोज़ अप से दिखाता है। तभी एंकर के कान में एवीयू से कुछ कहा जाता है, झटाक से कैमरा ज़ूम आउट करता है, एंकर हाँफ़ते हुए बताती है कि इस बीच हमसे किरण बेदी जुड़ चुकी हैं, किरण जी, हमारे साथ स्टुडियों में पीड़ित महिला बैठी है, जो सुबक सुबक कर रो रही है, उसके पति ने उनको घर से निकाल दिया है। आप उनसे कुछ कहना चाहेंगीं?
किरण जी कुछ क़ायदे की बात कहने का प्रयास करती हैं, लेकिन एंकर उनकी बात को सुने बिना फिर उछल-उछल कर चिल्लाने लगती हैं कि आप ये बताओ कि ये कहाँ जाएँ, ……कि इनकी हालत जो है, आप देखिये… कि महिलाओं की रक्षा का मुद्दा… कि फ़लाना… कि ढिमका… कि ये …कि वो… कि अभी वक़्त हो चला है एक ब्रेक का… आप हमारे साथ बने रहिये… टैंनेंटैणं… मेकअप दादा, टचअप… पानी……… (एवीयू से कान मेंफ़ुसफ़ुसाहट होती है) …क्या बात है, हिला कर रख दिया! (एंकर मुस्कुराते हुएखखारती है) रैडी… रोलिंग्…
…प्रश्न ये है कि इन सबके बीच समस्याओं और मुद्दों को गंभीरता से कब सोचा जाएगा?
✍️ चिराग़ जैन