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जिस दिन साँस पराई होगी

देह बचेगी स्पर्श न होगा आँखें होंगीं दर्श न होगा सब अपनों के आने का भी मुझको किंचित हर्ष न होगा उस दिन अधरों पर भी कोई याद नहीं मुस्काई होगी जिस दिन साँस पराई होगी जिन होंठों की मुस्कानों से मुझको प्राण मिला करते हैं जिन चेहरों के खिल जाने पर मन के तार हिला करते हैं...

उलाहना

मैं अंधेरों के नगर में दीप धरने जा रहा हूँ तुम उजालों की प्रतीक्षा में समय व्यतीत करना मैं पसीने से नदी का पाट भरने जा रहा हूँ तुम किसी बरसात की मनुहार का संगीत गढ़ना कर्मरत अर्जुन हुआ तो कृष्ण उसके सारथी थे देवता जीवन बदल सकते नहीं केवल भजन से आ गई चलकर अकेली जो गहन...
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