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क़लाम साहब नहीं बिके

मन दुखी है मेरा ही नहीं… सबका आज सिर्फ़ क़लाम साहब ही सुपुर्द-ए-ख़ाक़ नहीं हुए उनके साथ ही दफ़्न हो गई ये उम्मीद भी कि इस देश का मीडिया कभी ज़िम्मेदार होगा इस देश का मीडिया कभी संवेदनशील होगा इस देश का मीडिया कभी इस देश का होगा। मीडिया ने बोला नहीं पर साफ़-साफ़ बता दिया याक़ूब...

कलाम साहब नहीं रहे!

आह! कलाम साहब नहीं रहे! जीवन की अंतिम श्वास तक सक्रिय और सकारात्मक रहकर आप नहीं रहे!! देह ही हारी होगी मन तो जीवित ही था आपका चिकित्सकों ने काश मन टटोला होता तो कह न पाते कि “ही इज़ नो मोर…” सुना है “लिवेबल प्लेनेट अर्थ” पर बोल रहे थे आप महसूस...
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