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कर्ण का परिताप

तुम प्रपंचों में समय अपना खपाना मैं समर के हर नियम को मान दूँगा तुम बदलकर वेश मुझसे मांग लेना मैं कवच-कुण्डल ख़ुशी से दान दूँगा हाथ की सारी लकीरें हैं विरोधी अब भला कुछ झोलियों का रीतना क्या न्याय से या सत्य से सम्भव नहीं जो झूठ कहकर उस समर को जीतना क्या तुम निहत्थे...
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