Article, Chirag Jain Writings, Prose, Seriously Funny
राममंदिर में चोरी की ख़बर सुनकर पूरा देश स्तब्ध रह गया। जो त्रस्त थे, उन्होंने माथा पकड़ लिया और जो व्यस्त थे उन्होंने मोबाइल। आपदा में अवसर तलाशनेवाले विरोधियों ने तुरंत लिखा- “जो भगवान अपने मंदिर की रक्षा नहीं कर पाए, वो हमारी रक्षा क्या कर पाएंगे!”
यह लगभग ऐसा ही तर्क था कि जिस दीपक के तले अंधेरा है, वो कमरे में कैसे रौशनी कर सकेगा!
हमारे यहाँ कोई भी अपराध होते ही अपराधी बाद में पकड़े जाते हैं, बातें पहले पकड़ी जाती हैं। कोई घटना में राजनीति ढूँढता है तो कोई धर्म। किसी को जातीय एंगल दिखता है तो किसी को ज्योतिषीय।
जब तक चोर बेचारा चोरी के माल की बैलेंस शीट भी नहीं बना पाता, तब तक बुद्धिजीवी लोग उसकी चोरी के दर्जनों दार्शनिक ग्रंथ छाप देते हैं।
चोरी के बाद प्रशासन पूरा विचार-विमर्श करने के बाद एक फिक्स बयान देता है- “जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।”
ऐसा लगता है कि चोर यह सुनकर घबरा जाएगा और कहेगा, “अरे! अब तो जाँच बैठ गई। चलो, सामान वापस कर आते हैं।”
जाँच कमेटियों को सबसे पहले सीसीटीवी कैमरे खंगालने होते हैं। यह विज्ञान द्वारा निर्मित एकमात्र ऐसा यंत्र है जिसके पास इतना विवेक है कि क्या देखना है और क्या नहीं देखना है। इसीलिए आरती, प्रसाद-वितरण, भक्तों की भीड़ और यहाँ तक कि किसी भावुक श्रद्धालु की आँखों में उतर आई नमी तक की फुटेज इन कैमरों में एचडी क्वालिटी में दिख जाती है लेकिन जैसे हो चोर अपना एक्शन शुरू करता है, उसी क्षण कैमरे अपनी आँखें मूंद लेते हैं। क्योंकि कैमरों की टीचर ने उन्हें बचपन में ही सिखा दिया था कि “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो!”
बाद में पुलिस एक धुंधली तस्वीर दिखाकर कहती है—”यही संदिग्ध है।” तस्वीर देखकर लगता है कि आदमी नहीं, कोई बादल का टुकड़ा भाग रहा है।
चोरी में जितनी मेहनत चोर नहीं करता, उससे अधिक मेहनत न्यूज़ चैनल करते हैं। भारी भरकम संगीत के साथ चीखती हुई आवाज़ में एंकर पूछता है- “आख़िर कौन है इस चोरी का मास्टर माइंड?” यदि चोर टीवी देख रहा हो तो डरकर नहीं, सिरदर्द से आत्मसमर्पण कर दे।
इनके बाद प्रकट होते हैं विशेषज्ञ। विशेषज्ञों के विश्लेषण और सुझाव, माहौल को मनोरंजक बनाने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। कुछ लोग डिबेट में शोर मचाते रहते हैं और कुछ लोग शोर मचानेवालों को शांत कराते रहते हैं। बिना किसी निष्कर्ष के डिबेट का स्लॉट पूरा हो जाता है और हम विज्ञापन देखने लगते हैं।
जो लोग रामजी के आगे सिर झुकाकर फोटो डालते रहे, वे ही अब कंधे उचकाते हुए कैमरे से मुँह छुपा रहे हैं। रामभरोसे जीनेवाले देश में राम का ‘ट्रस्ट’ कठघरे में है।
प्रश्न यह नहीं है कि “ऐसा कैसे हो गया?” प्रश्न यह है कि “ऐसा होने क्यों दिया?”
अपराधी चाहे जो भी हो, एक बात सुनिश्चित है कि इस बार रावण ने साधु का नहीं, सेवक का वेश बनाया है। इस बार चोरी पंचवटी में नहीं, अयोध्या में हुई है।
राम जी की प्रतिष्ठा तो अक्षुण्ण है लेकिन अगर किसी निजी स्वार्थ के लिए चोरी के मामले में बेईमानी हुई तो भगवान अपने भक्तों पर ‘ट्रस्ट’ नहीं कर पाएंगे।
✍️ चिराग़ जैन
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शहर में बैठकर
गाँवों का अंदाज़ा नहीं होगा।
वहाँ ऐसे भी आंगन हैं
कि जिनके घर नहीं बाक़ी।
जहाँ खंडहर से भी बदतर घरों में
जी रहे हैं लोग
सुना है, कुछ जगह तो
खंडहरों के भी महज खंडहर बचे हैं।
समझ पाना दिनोंदिन और मुश्किल हो रहा है
कि उन मिट्टी के दड़बों में दुबककर
जो कुछेक परिवार रहते हैं
उन्हें कच्ची दीवारों से ज़ियादा क्यों तलब है
बिखर जाने की!
वहाँ कितनी ही बूढ़ी हड्डियां
ख़ुद को ही अपनी उम्र काफी कम बताती हैं।
वहाँ कितनी ही आँखें
नौकरी की चाह में घर से गए बड़के की
अब तक मुन्तज़िर हैं।
वहाँ पूरा नहीं होता किसी का ख़्वाब अब
भरपेट रोटी का!
वहाँ पर जिन घरों के लोग
झरकर गिर चुके हैं
वो घर दिन रात रस्ता देखते हैं;
कोई उन पर कभी कब्ज़ा जमाने भी नहीं आता!
वहाँ ऐसी भी बस्ती है,
कि जिसने एक मुद्दत से
बिना लाठी के सीधा चल रहा मानुष नहीं देखा।
मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ के खेत पानी को तरस कर मर चुके हैं।
मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ खेतों की लाशों पर खड़े पेड़ो की लाशों पर
कई लाशें लटकती हैं।
मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ उतरी हुई इक बाढ़ की कीचड़ में
इक नन्हीं परी
कुछ ढूंढ़ने की जिद्द लिए घण्टों मचलती है।
मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ गुज़रे हुए तूफ़ान से बाक़ी बचे
कुछ बदनसीबों को
अभी तक ख़ुद के जिंदा बच निकलने का
बहुत अफसोस होता है।
मेरे हिन्दोस्तां का एक टुकड़ा
आज भी वो है,
जहाँ वीरान रेगिस्तान में
मीलों की अपनी मिल्कियत लेकर
कोई बुढ़िया अकेली घूमती है।
ठहरकर जब कभी ये लोग
ऊपर देखते हैं,
इन्हें भगवान से अब डर नहीं लगता।
बड़ी मुद्दत से ख़ुद भगवान
छिपता फिर रहा है इन ग़रीबों से!
उसे इनकी हिक़ारत से भरी आहों का
अंदाज़ा नहीं होगा।
शहर में बैठकर गाँवों का अंदाज़ा नहीं होगा।
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सभी राजनैतिक दल एक साथ मिलकर देश को एक निश्चित दिशा में ले जा रहे हैं। मीडिया वाच डॉग बनकर इस कारवां के पीछे दौड़ रहा है, ताकि देश द्रुतगति से उस दिशा में बढ़ता रहे। जनता अपने भविष्य को दाँव पर लगाकर इस कारवां में जीत-हार तलाश रही है।
यह तय करने की फ़ुरसत किसी के पास नहीं है कि सियासत ने पालकी कहकर अपने कंधों पर जो उठा रखा है, वह कहीं चकडोल तो नहीं है।
जब दर्शक-दीर्घा का उत्साह शांत होने लगता है तो कंधा दे रहा दल, जनता को जनार्दन कहकर संबोधित कर देता है। जनता, मूकदर्शक के पद से इस्तीफा देकर, पुनः शोरगुल करने लगती है। सब स्वयं को कंधा समझकर, देश का बोझ स्वयं पर महसूस करने लगते हैं और किसी न किसी दल का नाम लेकर चिल्लाने लगते हैं।
उत्साह बढ़ने पर कभी-कभार दर्शक-दीर्घा में हंगामा हो जाता है। हंगामे को दंगे में तब्दील करने के लिए दर्शक-दीर्घा में बैठे भावी राजनेता पूरी ऊर्जा झोंक देते हैं। इससे उपजे धर्मयुद्ध में जो शव गिरते हैं, उनका अंतिम संस्कार करने के लिए कारवां में बढ़ रहे कर्णधार, देश का बोझ वहीं छोड़कर दर्शक-दीर्घा में प्रकट होते हैं। अपने-अपने समर्थकों की चिताएँ सजाकर, वे परस्पर विरोधियों की चिताओं पर जाकर दंगा करनेवालों को लताड़ते हैं। इस डाँट-डपट के बीच, जेब से टोटकों की लोई निकालकर, वे वोटों की रोटियाँ भी सेंक लेते हैं।
इस समय उत्तरदायी मीडिया भी मुख्य कारवां का लालच छोड़कर, दर्शक-दीर्घा के इस घटनाक्रम की कवरेज कर रहा होता है।
हंगामा थमते ही देश के मुद्दों, देश की जनता और देश की हालत को वहीं छोड़ते हुए, सभी दल पुनः देश का बोझ लेकर उसी दिशा में बढ़ने लगते हैं। मीडिया पुनः उनके पीछे दौड़ने लगता है। जनता पुनः दर्शक-दीर्घा में बैठकर इसे देश की पालकी समझकर दाँव लगाने लगती है।
✍️ चिराग़ जैन
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भारत देश ही ऐसा है कि जो भी यहाँ आता है, जल्दी ही यहाँ के रंग-ढंग सीख जाता है। कोविड कि साथ भी यही हुआ। हमने उसे भारत में रहने के नियम-क़ायदे सिखाने में देर नहीं लगायी। अब कोविड हर रोज़ सुबह उठकर अख़बार पढ़ता है और सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार अपनी दिन भर की प्लानिंग करता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान है।
रुकी हुई हवाई सेवाएँ प्रारम्भ करते हुए सरकार ने बताया कि मिडिल सीट ख़ाली रखनी है। हवाई अड्डे पर पहुँचने से पहले वेब चेक इन करना है। आरोग्य सेतु एप में ग्रीन स्टेटस होना आवश्यक है। हेल्थ डिक्लेरेशन वेब चेकइन के समय ही भरवा लिया गया। हवाई अड्डे पर थर्मल स्क्रीनिंग और न जाने क्या-क्या नियम बनाकर कोविड से सुरक्षा के उपाय किये गये।
बाद में पता चला कि इन सब नियमों में एयरलाइंस की कमाई की संभावनाएँ खुल गयी हैं। वेब चेक इन करते समय जहाज में कोई भी सीट निःशुल्क नहीं है। अगर आप एयरपोर्ट आकर चेक इन करेंगे तो एयरलाइंस आपसे 100 रुपये चार्ज करेगी। मतलब कोविड को समझा दिया गया है कि जो सौ रुपये ख़र्च करे, उसके नहीं चिपटना है।
जिस मिडिल सीट को ख़ाली रखना था उस पर डिस्पोजेबल सूट पहनाकर यात्री बैठाये जा रहे हैं। अगर कोई घर के कपड़े पहनकर सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन करेगा तो कोविड उसे पकड़ लेगा। लेकिन अगर किसी कोई सफेद क़फ़न टाइप का ढकोसला लपेटकर दोनों तरफ़ के लोगों से सटकर बैठे तो उससे कोविड ख़ुद डिस्टेंस रखेगा। जिस आरोग्य सेतु एप्लिकेशन के न होने पर प्रारम्भ में लोगों को हवाई अड्डे में घुसने नहीं दिया जा रहा था, उसको अब कोई चैक तक नहीं कर रहा है।
उधर कोविड को यह भी समझ आ गया है कि इस मुल्क में राजनैतिक गतिविधियों से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं है। इसीलिए श्मशान में जलती चिताओं के पास खड़े शोकाकुल परिजनों की गिनती की गयी, बारात में बारातियों की गिनती की गयी, बाज़ार में समान बेचते दुकानदारों के चालान काटे गये लेकिन किसी राजनैतिक पार्टी के सदस्यता अभियान में हज़ारों लोगों की उपस्थिति से कोई समस्या खड़ी नहीं हुई क्योंकि वहाँ कोविड के घुसने पर मनाही थी।
बिहार में चुनावी रैलियों में भीड़ आती है तो राजनेता इतराते हुए उसकी फोटो ट्वीट करके अपनी लोकप्रियता का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि कोविड को पहले ही समझा दिया गया है कि ‘देखो भाई, तुम्हारा वोटर कार्ड नहीं बना है इसलिए रैली के आसपास भी मत दिखना।’
कोविड समझता है कि सरकारी कामकाज में अड़ंगा लगाया तो उसको जेल में बन्द कर दिया जाएगा। इसलिए कोविड सरकारी नियमों का पालन करता है। सरकार ने सिनेमाघरों में एक सीट छोड़कर बैठने की इजाज़त दी है तो कोविड को समझ आ गया है कि उसके लिये सिनेमाघरों में स्थान छोड़ दिया गया है, अब वह उस छोड़ी हुई सीट के दोनों ओर बैठे लोगों को तंग नहीं करेगा।
कोविड जानता है कि जलती हुई चिता के आसपास लोग भीड़ लगाकर खड़े हो जाते हैं, उनको पकड़ना चाहिए, लेकिन रैली में लोग लोकतंत्र के लिए जान हथेली पर रखकर आते हैं। इन देशभक्तों का सम्मान करना चाहिए।
किसी से हाथ मिलाओगे तो कोविड फैल सकता है लेकिन चुनावी रैली में कोई नेता पोडियम के साथ खड़ी रोती हुई महिला को गले लगाकर चुप कराता है तो कोविड भावुक होकर दूर खड़ा रहेगा।
वह दिन दूर नहीं जब कोविड बाक़ायदा रसीद बुक लेकर सड़कों पर खड़ा होगा और आते-जाते लोगों को रोककर उन्हें कहेगा कि 100 रुपये की रसीद कटवा लो, वरना क्वारन्टीन करवा दूंगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
इस हाथ बातचीत, उस हाथ घुसपैठ
गोल-गोल न घुमाओ सीधे-सादे सीन को
हाथ मिल जाने से न कमज़ोर मान लेना
जड़ से उखाड़ सकते हैं आस्तीन को
बड़े-बड़े कोबराओं को नचाना जानते हैं
फिर न उठाना पड़े हमें उस बीन को
भारत के वर्तमान पीएम को जान लेना
चाय में मिला के कहीं बेच न दे चीन को
✍️ चिराग़ जैन