धूप, कंगूरों की रंगत को चाट गई जब धीरे-धीरे तब बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई होठों पर ताले लटके थे, संवादों पर बर्फ़ जमी थी आखर-आखर आतंकित था, हर आहट सहमी-सहमी थी सबके अपने-अपने सुख थे, सबके अपने-अपने कमरे तब छोटी-सी एक मुसीबत, परिवारों के काम आ गई फिर...
ना तो किसी रोग से टूटा ना ही समरांगण में हारा जिस राजा का शौर्य अमर था उसको कोपभवन ने मारा उसकी देह धराशायी थी, जिसका नाम स्वयं दशरथ था तन पर कोई घाव नहीं था, पर अंतर्मन से लथपथ था वाणी से विषबाण चलाकर, जीवन का अमरित ले बैठी जिसने हर रण जीता उसको इक रानी की जिद ले...
न कोई ट्रिक है ना तकनीक पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक दिन भर दुनिया भर के सब आघातों को सहते हैं रात ढले अपनी दुविधा बस अम्मा से कहते हैं इतने सीधे-सच्चे हैं हर छल से हिल जाते हैं जब अपने बच्चों से मिलते हैं तो खिल जाते हैं झट से ग़ायब हो जाती है चिंताओं की...
गाँव का पुराना मकान कच्चा-पक्का फ़र्श दीमक लगी जर्जर चौखट और देहरी के दोनों ओर चिकनाई के दो गोल निशान!मुद्दत हुई हर साल दीपावली पर दीपक जलाते थे दो हाथ। फिर अपने पल्लू की ओट में छिपाकर हवा के झोंके से बचाते हुए दीवार की आड़ में हौले से देहरी पर दो दीपक धर आते थे दो हाथ।...