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उर्दू और भारत

अगर भाषाओं से धर्म की पहचान होती तो हिन्दी के पास रसखान और रहीम नहीं होते तथा उर्दू के पास फ़िराक़ और गुलज़ार नहीं होते। राजनीति को मुर्गे लड़ाने का चस्का हो, तो वह कहीं और जाए, भाषाएँ तो आश्रमों की संतति होती हैं। रामप्रसाद बिस्मिल और भगतसिंह की भाषा को पराया मानने...

आँसू की आवाज़

जो रैली में पींग बढ़ाते नारों की हालत देखो जाकर उन बेचारों की इंसानों की बस्ती भूखी बैठी है तुम बातें करते हो चाँद-सितारों की आँसू की आवाज़ छुपाकर रख पाएँ इतनी भी औक़ात कहाँ दीवारों की लहरों से कश्ती का हाथ छुड़ाना है हिम्मत बढ़ती जाती है पतवारों की सिगरेट को इक बार...

गए साल को सलाम

ऐ गये साल तुझे मैं न भूल पाऊंगा तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है मेरे वजूद मेें ‘कुछ’ ख़ैर...

चिराग़ों के घर नहीं होते

सदा तो सँग तलक दर-ब-दर नहीं होते कहा ये किसने चिराग़ों के घर नहीं होते अभी असर न दिखा हो तो इंतज़ार करो हैं ऐसे दांव भी जो बेअसर नहीं होते ग़मों की धूप में नाज़ुक बदन मुफ़ीद नहीं गुलों के जिस्म नरम, सूखकर नहीं होते खुद अपना बोझ उठाने में कोई हर्ज़ नहीं पराये पाँव बहुत...

नसीब करवट बदल रहा है

कोई हमारे नसीब को इक नयी कहानी सुना रहा है हथेलियों पर कई लकीरें बना रहा है, मिटा रहा है बहुत दिनों से जिस एक खिड़की के पार किरणें न आ सकी थीं अब एक उम्मीद का परिंदा उसी के पल्ले हिला रहा है जिसे बचाने की कोशिशों में हरेक हसरत दबा ली हमने उसी अना को सलाम करके कहीं कोई...
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