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नमक

यूँ चखा हमने बहुत दुनिया के स्वादों का नमक है ज़माने से अलग माँ की मुरादों का नमक तू परिन्दा है तिरी परवाज़ ना दम तोड़ दे लग गया ग़र शाहज़ादों के लबादों का नमक आँसुओं की शक़्ल ले लेंगी तड़प और सिसकियाँ दिल के छालों पर जो गिर जाएगा यादों का नमक दावतें धोखे की हरगिज़ हो न...

विवशता

चुप-चुप देखती थीं राधिका कन्हैया जी को हौले-हौले उठ रहे शोर से विवश थी साँवरे के पास खींच लाती थी जो बार-बार प्रीत की अनोखी उस डोर से विवश थी इत होरी की उमंग, उत दुनिया से तंग फागुन में गोरी चहुँ ओर से विवश थी लोक-लाज तज भगी चली आई गोकुल में मनवा में उठती हिलोर से...

फागुन की शाम

फागुन की शाम कैसी हवा चली हाय राम जोगियों का दिल धक-धक करने लगा सारी सोच बूझ घास-फूस सी बिखर गई मन को खुमार चकमक करने लगा पीपल का पेड़ सारे पंछियों के संग मिल झूम-झूम मार बक-बक करने लगा और चुपचाप मेरा मानस भी हौले-हौले प्रेम के मृदंग पे धमक करने लगा ✍️ चिराग़...

हम हाथ मल रहे हैं

हमको हमारे ऐसे हालात खल रहे हैं रग-रग में बेक़ली के सागर मचल रहे है उनकी झिझक ने इतना लाचार कर दिया है सब हाथ में है फिर भी, हम हाथ मल रहे हैं ✍️ चिराग़...

संबंधों की साँस उखड़ने लगती है

जब बेटी की उम्र ज़रा रफ़्तार पकड़ने लगती है तब माँ हर आते-जाते की नज़रें पढ़ने लगती है जब मन की कच्ची मिट्टी कुछ सपने गढ़ने लगती है तब ज़िम्मेदारी की भारी बारिश पड़ने लगती है यूँ तो वो अपनी हर ज़िद्द मनवा ही लेता है मुझसे लेकिन मेरे भीतर-भीतर नफ़रत बढ़ने लगती है प्यार अगर सच्चा...
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