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ख़ुदशनास

यूँ न समझो उदास बैठा हूँ आज मैं ख़ुदशनास बैठा हूँ मुझसे कोई अभी न बात करो मैं अभी अपने पास बैठा हूँ ✍️ चिराग़...

मन बोलता है

जब सब पंछी मौन हो गए कलरव के स्वर गौण हो गए जीवन की रफ़्तार सो गई दिन पर रात सवार हो गई ऐसा एकाकी पल पाकर मन हमको झकझोर उठा जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा कितनी इच्छाएँ प्यासी थीं, कितने काम अधूरे निकले डुगडुगियों पर नाच रहे थे, हम तो एक जमूरे निकले कर को...

आकलन और आलोचना

जो लोग कला फ़िल्मों के मापदण्ड से सी-ग्रेड सिनेमा का आकलन करने निकले हैं, उनकी बुद्धि किसी का आकलन करने के लिए सक्षम नहीं है। वे आलोचना करने के प्रयास में विद्रूपता को प्रचारित कर रहे होते हैं और उन्हें आभास भी नहीं होता कि वे क्या पाप कर रहे हैं। सिद्धांत तो यह है कि...

ओशो कम्यून की पहली शर्त

ख़ुद से मिलने की ख़ुशी क्या होती है, इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैंने कम्यून में प्रवेश किया। हर चेहरे पर एक नैसर्गिक प्रसन्नता, हर आँख में एक प्राकृतिक चमक, हर पाँव में एक अनायास थिरक …उत्सव वहाँ आयोजित नहीं, घटित हो रहा था। वहाँ सब अपने पूरे अस्तित्व के साथ घूम...

नज़र

पलक गिरते ही पल में खेल सारे देख लेता हूँ मैं इनसे आँख को ढँक कर सितारे देख लेता हूँ मेरी ये बन्द पलकें दूरबीनों से कहाँ कम हैं मैं इनमें ज़िन्दगी भर के नज़ारे देख लेता हूँ ✍️ चिराग़...
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