Article, Chirag Jain Writings, Prose, Seriously Funny
जो लोग रुपये के गिरने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उन्हें मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि रुपया सरकार के कारण नहीं, तुम्हारी फटी हुई जेब के कारण गिरता है।
यदि तुमने अपनी जेब सिल ली होती तो रुपया नहीं गिरता। सरकार उचित नीतियां बनाकर सारा रुपया अपने पास सुरक्षित करना चाहती है तो जनता शोर मचाने लगती है।
अब ले लो मज़े, और रखो अपने पास। अब गिर गया ना रुपया। अब पड़ गया चैन?
जेब नहीं सिल पाए तो कम से कम जुबान ही सिल लो। देश की करंसी के विषय में ऐसी गिरी हुई बातें करनेवालों को राष्ट्रद्रोही करार देकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए।
जिसे गिरना हो वो गिरेगा ही। शादियों में लोग आसमान की ओर रुपये उछालते हैं, लेकिन रुपया फिर ज़मीन पर आ गिरता है। अब जिसे गिरने की आदत पड़ गई हो, उसे कोई कहाँ तक उछाल सकेगा?
सोशल मीडिया पर रुपये की गिरावट को लेकर बड़ा मज़ाक बनाया जा रहा है। ये काफ़ी गिरी हुई हरकत है। गिरते को गरियानेवाला नजरों से गिर जाता है।
रुपया बेचारा कब से ललचायी नज़रों से नब्बे के अंक को देख रहा था। हमारी नीतियों ने अथक परिश्रम करके उसे नब्बे पार करवाया है। इस उपलब्धि पर सरकार की पीठ थपथपाई जानी चाहिए लेकिन जिन्हें केवल आलोचना करनी है उनका कोई इलाज नहीं है।
यह सरकार का बड़प्पन है कि दूसरों की गलतियों की सज़ा चुपचाप भुगत रही है। दरअस्ल रुपया नेहरू जी के कारण गिरता है क्योंकि नेहरू जी ने रुपया गोल बनाया। अब गोल है तो लुढ़केगा ही। यदि उन्होंने रुपया चौकोर बनाया होता तो रुपया कभी नहीं गिरता।
डॉलर ने रुपये को छेड़ते हुए कहा- “आज खुश तो बहुत होगे तुम। जो रुपया गिरे हुओं को भी चढ़ा देता था, आज वो ख़ुद गिरा पड़ा है।”
इस पर रुपये ने खनकता हुआ जवाब दिया- “गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में।”
डॉलर ने चिकोटी काटकर बात आगे बढ़ाई- “रुपये को उठाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।”
रुपये ने थोड़ा दार्शनिक होते हुए जवाब दिया- “कौन कमबख्त उठने के लिए गिरता है, हम तो गिरते हैं ताकि बाज़ार उठ सके।”
डॉलर फिर बोला- “बाप का, दादा का, भाई का, सबका बदला लेगा रे, तेरा डॉलर।”
रुपया गिरे हुए गुरूर से बोला- “मुझ पर एक एहसान करना, मुझ पर कोई एहसान मत करना।”
डॉलर ख़ुद पर इतराते हुए बोला- “हमारा डॉलर गिरा होता तो हमारी सरकार उसे उठाने के लिए जी-जान लगा देती।”
अब हमारे नेताजी बोले- “मैं आज भी गिरे हुए पैसे नहीं उठाता डॉलर सेठ!”
डॉलर अपना सा मुँह लेकर रह गया। हमारे नेताजी ने जेब से रुपया निकाला और ख़ुद की नजर उतारते हुए डायलॉग बोला- “बाबूमोशाय, बात ऊँची होनी चाहिए, सच्ची नहीं।”
✍️ चिराग़ जैन

Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
देश को सँवारने के क़ीमती ये दिन-रात
आप क्यों विपक्ष की नकेल में लुटा रहे
जनता के हाथों में से छीन के पुराने नोट
नए-नए नोट अब तेल में लुटा रहे
पार्टी को अरबों का दान जो मिला हुज़ूर
हाय उसे खच्चरों की सेल में लुटा रहे
थोक के व्यापार में कमाई हुई साख काहे
हर दो महीने में रिटेल में लुटा रहे
गाड़ी में नहीं है तेल, रोड पे नहीं है गाड़ी
इसलिए अब रोडरेज कम हो गया
लूटपाट की भी ख़बरों में कमी आ गई है
लॉन्ग ड्राइविंग वाला क्रेज कम हो गया
सड़कों के जाम से मुहाल था सफ़र अब
तेल के हुए जो दाम तेज, कम हो गया
बहुओं को फूंकने की हैसियत ही नहीं है
इसलिए ब्याह में दहेज कम हो गया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose, Story
“अगला चुनाव कब है?”
“नवंबर में होगा शायद।”
“कब से जुटना है?”
“जुलाई-अगस्त से शुरू करते हैं।”
“ठीक है, तब तक रूस घूम आता हूँ।”
“लेकिन पैसा कहां से आएगा।”
“ह्म्म्म….
पैट्रोल के दाम बढ़ा दो ना यार। ”
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
एक मंत्री जी ने कहा है कि महंगाई से मैं बहुत ख़ुश हूँ, क्योंकि इससे किसानों को फ़ायदा होगा। यह परोपकार का ऐसा आयाम है जिसके लिये इतिहास हमेशा बेनी जी का ऋणी रहेगा। सब लोग सरकार की आलोचना करते हैं (उनको चाहिये कि वे सरकार से डरें, नहीं तो सरकार उनका फ़ेसबुक अकाउंट ब्लॉक करवा देगी) लेकिन इस समय कांग्रेस सरकार ने जो उपक्रम आरंभ किये हैं उनसे आश्वस्त हुआ जा सकता है कि या तो भविष्य आएगा ही नहीं, और आया तो उसको स्वर्णिम पॉलिश कर के आना होगा। वरना उसको इंडिया का वीज़ा ही नहीं दिया जायेगा। अब भविष्य कोई पाकिस्तानी घुसपैंठिया तो है नहीं, जो सुरंग बनाकर घुस आए।
ख़ैर, सरकार ने महंगाई बढ़ाकर न केवल किसानों की समस्याओं का हल निकाला है, बल्कि और भी बहुत से पेशों का भला किया है। महंगाई के कारण लोग भूख से परेशान हो जाएंगे, लूट-खसोट करने के लिये उनको अभिप्रेरणा मिलेगी। इससे समाज में अपराध बढ़ेंगे तो पुलिसवालों का भला होगा। कुछ लोग जेब बचाने के लिये स्वास्थ्य को ताक़ पर रख देंगे, इससे डॉक्टरों के बच्चे पल जाएंगे। जो लोग अपने बच्चों को भूखा मरते नहीं देख सकते, वे आत्महत्या के लिये प्रेरित होंगे। इससे श्मशान के पंडितों का परिवार चलेगा।
आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ीं तो मीडिया में शोर मचेगा। इससे पत्रकारों का पेट पलेगा। …इस समय सरकार पालनहार की भूमिका अदा कर रही है। आज तक किसी सरकार ने समाज के इन वर्गों की चिंता नहीं की। सरकार के इन प्रयासों की प्रशंसा करने के स्थान पर लोग माननीय बेनी जी की आलोचना कर रहे हैं।
मैं कृतज्ञता अर्पित करता हूँ सरकार के प्रति और अनुरोध करता हूँ कि कृपया मेरा फेसबुक अकाउंट ब्लॉक न करवाएँ, मैं इसी प्रकार समय-समय पर सरकार की चापलूसी करता रहूंगा। मैं जानता हूँ ‘सरकार’! आपकी मर्ज़ी के बिना 8 साल से देश का प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोल पाया, तो मेरी क्या औक़ात है!
यदि फिर भी सरकार चाहे तो पूरा फेसबुक ही बंद करवा सकती है, वैसे भी जिस जनता के पेट भरने के भी लाले पड़ने वाले हैं वो बोलने या चिल्लाने के क़ाबिल ही कहाँ बचेगी। और यदि बीपीएल कार्ड पर फ्री के मोबाइल वगैरा की सुविधा लेकर बोल भी लेगी, तो उसकी सुनेगा कौन।
✍️ चिराग़ जैन