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भावना की डगर

भावना की डगर भी सहज तो नहीं इस डगर पर स्वयं का तिरस्कार है प्रेम जिससे किया वो परेशान है और जिसने किया प्रेम, लाचार हैै मन हुआ मुग्ध जिस पर, उसी शख़्स के हर कथन को कथानक बनाता रहा प्रियतमा के नयन की चमक को सदा कर्म का एक मानक बनाता रहा स्वार्थ की क्यारियों में समर्पण...

लड़कियाँ

मेरे पिता ने बचपन में कभी मुझे गुड़िया से नहीं खेलने दिया ताकि मैं सीख सकूँ कि लड़कियाँ खेलने की चीज़ नहीं हैं। ✍️ चिराग़...

क़ामयाबी की आस्तीनों में

क़ामयाबी की आस्तीनों में मेरी शोहरत से जल गए दुश्मन दोस्तों में बदल गए दुश्मन क़ामयाबी की आस्तीनों में हाय धोखे से पल गए दुश्मन ✍️ चिराग़...

अच्छा लगता है

इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच निकाल ही लेता हूँ कुछ लम्हे कविता लिखने के लिए। बहुत सारी अधलिखी कविताओं को छोड़ चुरा ही लाता हूँ कुछ पल तुमसे बतियाने के लिए। अक्सर पूछ बैठता हूँ ख़ुद से क्या मिलता है मुझे कविता लिखने से? क्या हासिल होता है तुमसे बतियाने से? अच्छा लगता है...
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