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स्वयं का प्रसव

ऐसा लगता था सब राहें अब इसके आगे धूमिल हैं जो भी है, जितनी भी है; बस यह ही जीवन की मन्ज़िल है लेकिन घबराकर हिम्मत की हत्या करना ठीक नहीं था जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था जाने कौन घड़ी, अगले पल जीवन को लाचार बना दे जाने कौन घड़ी, पल भर में हर भय का उपचार...

सपने कभी नहीं मरते

बचपन में मेरी मजबूरियों ने मुझसे कुछ सपने छीनकर फेंक दिये थे ज़मीन पर कुछ समय तक देखता रहा मैं उन्हें दूर से ही फिर उन पर चढ़ गयीं कई परतें …व्यस्तताओं की …समय की …और बेख्याली की मुझे लगा कि समा गये हैं वे सब सपने क़ब्र में। लेकिन मैं ग़लत था बीते कुछ...

भोर से ठीक पहले

रेत, अंतिम बून्द भी यदि सोख ले अपनी नदी की साफ़ मतलब है पहाड़ों की बरफ़ अब गल चुकी है रात का अंधियार जब अपने चरम पर आ गया हो तब समझना, सूर्य की पहली किरण अब चल चुकी है त्यौरियों के बोझ से भौंहें भले दुखने लगी हों होंठ की बस एक हरक़त से हवा हो जाएंगी ये ये निराशा, ये...

उलाहना

मैं अंधेरों के नगर में दीप धरने जा रहा हूँ तुम उजालों की प्रतीक्षा में समय व्यतीत करना मैं पसीने से नदी का पाट भरने जा रहा हूँ तुम किसी बरसात की मनुहार का संगीत गढ़ना कर्मरत अर्जुन हुआ तो कृष्ण उसके सारथी थे देवता जीवन बदल सकते नहीं केवल भजन से आ गई चलकर अकेली जो गहन...
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