Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ऐसा लगता था सब राहें
अब इसके आगे धूमिल हैं
जो भी है, जितनी भी है; बस
यह ही जीवन की मन्ज़िल है
लेकिन घबराकर हिम्मत की हत्या करना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
जाने कौन घड़ी, अगले पल जीवन को लाचार बना दे
जाने कौन घड़ी, पल भर में हर भय का उपचार बना दे
हर धड़कन रुक-कर चलती थी, हर आहट मन को छलती थी
दिल पिघला-पिघला जाता था, आँखें रह रहकर गलती थीं
पर जितने हालात डराएं, उतना डरना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
केवल दो राहें बाक़ी थीं, जूझें; या हथियार गिरा दें
या उम्मीदों को पोषण दें, या डरकर हर दीप बुझा दे
देहरी चढ़कर हार खड़ी थी, अपशकुनों की बरसातें थीं
मेरी और मेरे अपनों की हर धड़कन पर आघातें थीं
ऐसे समय किसी चेहरे का रंग उतरना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
यदि सब कुछ निर्धारित है, तो धड़कन बढ़ने से क्या होता
यदि सब बदला जा सकता है तो फिर डरने से क्या होता
अपना प्रसव स्वयं करना था, कोई और विकल्प नहीं था
हर इक नस में चीर-फाड़ थी, भय पल भर भी अल्प नहीं था
पीड़ा से अपने ही मन को विचलित करना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
बचपन में
मेरी मजबूरियों ने
मुझसे कुछ सपने छीनकर
फेंक दिये थे
ज़मीन पर
कुछ समय तक
देखता रहा मैं उन्हें
दूर से ही
फिर उन पर
चढ़ गयीं कई परतें
…व्यस्तताओं की
…समय की
…और बेख्याली की
मुझे लगा
कि समा गये हैं
वे सब सपने
क़ब्र में।
लेकिन मैं ग़लत था
बीते कुछ दिन से
मेरे मन के ठीक नीचे
कुछ हलचल सी
महसूस होती थी
मैंने अपनी व्यस्तता की
परत हटाकर देखा
तो वे सब सपने
गहरे तक
फैला चुके थे अपनी जड़ें
विराट हो चुका था उनका स्वरूप
जिसे मैं क़ब्र समझ रहा था
वह क्यारी निकली
और जिन्हें मैं देह समझता रहा
वे बीज निकले।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
रेत, अंतिम बून्द भी यदि सोख ले अपनी नदी की
साफ़ मतलब है पहाड़ों की बरफ़ अब गल चुकी है
रात का अंधियार जब अपने चरम पर आ गया हो
तब समझना, सूर्य की पहली किरण अब चल चुकी है
त्यौरियों के बोझ से भौंहें भले दुखने लगी हों
होंठ की बस एक हरक़त से हवा हो जाएंगी ये
ये निराशा, ये उदासी, ये परेशानी जगत् की
एक पल की आस जगते ही कहीं खो जाएंगी ये
दिन ढले कल धैर्य ने कुछ बीज बोये थे हृदय में
सिर्फ़ दो पल और ठहरो, वह प्रतीक्षा फल चुकी है
आँख से कह दो कि अब उजियार की मत आस छोड़े
जब सुबह होगी, इसी को लालिमा का दर्श होगा
कान, जो वीरान सन्नाटा लपेटे फिर रहे हैं
चंद घड़ियों में इन्हीं को कलरवों का हर्ष होगा
बस अभी दुर्भाग्य को तुम हाथ मलते देख लेना
भाग्य की देवी कहीं पर आँख अपनी मल चुकी है
सिर उठाओ, देख लो पूरब निखरने लग गया है
होंठ फैलाओ, सवेरा सृष्टि पर छाने लगा है
खोल दो बाँहें, पवन सौरभ लुटाता आ रहा है
पंछियों का दल गगन में झूम कर गाने लगा है
श्वास में स्वर घोल कर आकण्ठ उत्सव में उतर लो
भैरवी गाओ, अंधेरी रात जग से टल चुकी है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
मैं अंधेरों के नगर में दीप धरने जा रहा हूँ
तुम उजालों की प्रतीक्षा में समय व्यतीत करना
मैं पसीने से नदी का पाट भरने जा रहा हूँ
तुम किसी बरसात की मनुहार का संगीत गढ़ना
कर्मरत अर्जुन हुआ तो कृष्ण उसके सारथी थे
देवता जीवन बदल सकते नहीं केवल भजन से
आ गई चलकर अकेली जो गहन अंधियार में भी
जूझना ही सीख लेते, भोर की पहली किरण से
भाग्य की हर हार को मैं जीत करने जा रहा हूँ
तुम स्वयं को हस्तरेखा बाँच कर भयभीत करना
पाँव चलने के लिए तैयार हैं बस ये बहुत है
क्यों करूँ परवाह इसकी, कौन मेरे साथ आया
मन, भुजाएँ, श्वास, धड़कन, दृष्टि मेरे पास हो बस
और सब कुछ बोझ भर है, जो अभी तक है जुटाया
मैं स्वयं के हाथ से अब ख़ुद सँवरने जा रहा हूँ
तुम समूची सृष्टि से बस आचरण विपरीत करना
सृष्टि का हर तंत्र मेरे ही लिये निर्मित हुआ है
नियति के हर शाप और वरदान का कारण स्वयं हूँ
यक्षप्रश्नों के सभी उत्तर मुझी को खोजने हैं
मैं स्वयं के हर पतन-उत्थान का कारण स्वयं हूँ
मैं जगत् का सौख्य अपने नाम करने जा रहा हूँ
तुम सदा उपलब्ध दुःख-सुख को समर्पित प्रीत करना
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
राह कितनी भी कठिन हो, हौसला मत छोड़ देना
यह नियत है, हर डगर के अंत में मंज़िल मिलेगी
जो सफ़र पूरे हुए हैं, उन सभी का हाल पूछो
हर विजय की राह हर युग में बहुत बोझिल मिलेगी
राम होने के लिए वन-वन भटकना ही पड़ेगा
भाई की हत्या बिना सुग्रीव निष्कासित रहेगा
जो दशानन के सिंहासन पर सुशोभित हो गया है
वह विभीषण वंशहंता हो के अभिशापित रहेगा
वीर लक्ष्मण की कथाएँ जब खंगालेगा कोई तो
राजमहलों के सुखों में घुट रही उर्मिल मिलेगी
जंगलों को छाँट कर चाहे नगर निर्माण कर लें
रण बिना पूरा हुआ क्या, पांडवों की जीत का पथ
द्यूत, लाक्षागृह, कठिन वनवास और फिर दास जीवन
हर क़दम जर्जर हुआ है न्याय की उम्मीद का रथ
मौन रहकर भी समय को काटना चाहा कभी तो
कीचकों के रूप में निश्चित कोई मुश्किल मिलेगी
भोर की पहली किरण का मार्ग अंधियारा रहेगा
रात के अंतिम पहर को दीप की झिलमिल मिलेगी
प्रेम को सारे ज़माने की घृणा सहनी पड़ेगी
नफ़रतों को हर क़दम पर प्यार की महफ़िल मिलेगी
जिंदगानी के सफ़र में मौत का साया रहेगा
मौत को मंज़िल कहा तो, मौत भी तिल-तिल मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन