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शंकर

जो जीवन को तीर्थ बना ले तीर्थंकर हो जाता है
क्रोध चढ़े सिर पर तो मानव प्रलयंकर हो जाता है
जग की पीर पचाकर जग का हित कर पाना मुश्किल है
जो विष पीकर भी जीवित हो, वो शंकर हो जाता है

✍️ चिराग़ जैन

चाँद को नहीं पता

कहीं भी तो अंतर नहीं है यार! चांद को नहीं पता कि उसे देखकर कोई रोज़ा, ईद की ख़ुशी में तब्दील होगा या कोई उपवास, महाशिवरात्रि के उल्लास का रूप धरेगा। गाय को भी नहीं पता कि उसके थनों में जो धार उतरी है, वो सेवइयों की मिठास में घुलेगी या शिवलिंग पर ढलक कर पावन होवेगी। यहाँ तक कि सड़क किनारे पट्टा बिछाकर बैठे मेहंदीवाले को भी नहीं पता कि वह अपने सामने पसरा जो हाथ, मेहंदी के बूटों से सिंगार रहा है, वो किसी दुआ को महकायेगा या किसी अर्पण को।
देहरी ने कब पूछा किसी पायल से कि वो अपनी रुनझुन ईद के मेले में बाँटने जायेगी या हरियाली तीज के झूलों में! फिर हमें किसने बता दिया ये सब? उत्सवों की चौपाल में नफ़रतों की सुगबुगाहट फैलानेवाली हवा कौन दिसा से आई रे बटोही। सेवइयाँ खाओ बाबू, अम्मी ने भेजी हैं। और ये भी कहा है, बेर लेता अइयो लौटती बेर, पण्डित जी से।

✍️ चिराग़ जैन

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