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नए घर में

नए फ्लैट की दीवारों पर
धीरे-धीरे उभर रहा है
हमारा घर

माॅड्यूलर किचन के खोपचों से
आँख बचाकर
एक कोने में पालथी मारकर बैठ गया है
सरसों के तेल का पीपा

सभी नए कंटेनरों के बीच
चुपके से जा छुपी है
युगों पुरानी हींग की डिब्बी!

बरसों से इकट्ठे हुए शो-पीस
चहक कर जा बैठे हैं
इस-उस टीवी पैनल पर

पापा के लिए बनी
स्पेशल अलमारी ने
सबको संजो लिया है थोड़ा-थोड़ा;
थोड़े-थोड़े हम सब
पसरने लगे हैं
माँ के कमरे तक

‘कोई फ़ालतू सामान नए घर में नहीं जाएगा’
के संकल्प ने
‘ये तो रख लो, ज़रूरत पड़ती रहती है’
के अनुरोध से
हार मान ली है

नपे-तुले घर में
सहेज लिए गए हैं कुछ एक्स्ट्रा बिस्तर
ताकि तीनों बहनों के
एक साथ आने पर भी
छोटा न लगे
हमारा नया घर

मेरे व्यवस्थित ऑफिस की एक दराज़ में
दर्ज हो गई हैं मेरी अव्यवस्थित पर्चियाँ;
मेरे बैडरूम की ड्रेसिंग का शीशा
सज गया है
एक छोटी लाल बिंदी से;
एकदम नए दरवाज़ों के पीछे
उभर आई हैं खूँटियाँ

चमचमाते हुए मंदिर में
विराज चुकी है
साठ-सत्तर साल पुरानी तस्वीरें

नए स्टाइल की डिजाइनर लाइब्रेरी में
कतार बांधकर खड़ी हो चुकी हैं
मेरी ‘सारी’ किताबें
जो बहुत देर तक छाँटने के बावजूद
एक भी कम नहीं हुई

हाइड्रोलिक डबल बैड के
स्टोरेज बॉक्स में बैठकर
लगाया जा रहा है सामान

ख़ूबसूरत बालकनी की जाली में
लटक गई है
काली पुती हुई हांडी

माँ की शादी में मिली
सिलाई मशीन
माँ के बिस्तर से दो हाथ दूर बैठी
सी रही है
नए घर में
पुरानी यादें

पैकिंग के सारे कार्टन
विदा कर दिए गए हैं
और उनके भीतर से निकलकर
हम सब
पूरी शिद्दत से
बसे जा रहे हैं
घर के रोम-रोम में!

✍️ चिराग़ जैन

नये घर में

सुनो!
सब कुछ तो बटोर लाया हूँ
अपने पुराने मकान से
नये मकान में;
फिर भी
काफ़ी कुछ छूट गया है वहीं
…जस का तस।

अलमारी के पीछे
जाला पूरती रहती थी एक मकड़ी
उसका घर तहस-नहस कर आया हूँ
अपना घर बदलते हुए।

दीवाली की सुबह
रसोई की चौखट पर
सरस की टहनियाँ टाँकते थे पिताजी;
उनकी सूखी हुई डंडियाँ
चुभती हुई सी छूट गई हैं
चौखट की झिरियों में।

राखी के सोन चिपकाने से
एक निशान बन जाता था दीवार पर
वो साथ न आ सका।

और छोटी बहन ने
पूजा वाले कमरे में
थापे लगाए थे
विदा होते हुए।
…जिन्हें देखने भर से
जीवंत हो जाती थी बहन की विदाई;
…उन्हें सहेजने का
कोई ज़रिया न हुआ।

पड़ोस वाले अंकल
यूं भी
कभी बतियाते तो नहीं थे,
लेकिन आज
जब ट्रक में चढ़ रहा था उनका पड़ोस,
तो वे अपनी बालकनी में
रोज़ से
कुछ ज़ियादा ख़ामोश नज़र आए।

नये घर की दीवारें
एकदम नयी हैं।
फ़र्श पर नहीं है
किसी दीये की चिकनाई के घेरे।
ट्यूब के पीछे
अभी नहीं बसा है
किसी छिपकली का घरौंदा।
यहाँ सामने वाले छज्जे से
लुंगी पहने कोई अधेड़
आते-जाते घूरता भी नहीं है।

एक बड़े से ट्रक में
लाद तो लाए हम
एक पूरा युग
लेकिन वक़्त लगेगा
उस युग को
इन दीवारों पर छाने में
अभी वक़्त लगेगा
इस मकान को
घर बनाने में।

✍️ चिराग़ जैन

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