Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
वन्स अपॉन ए टाइम। जम्बूद्वीपे भरतखण्डे एक ऐसा राजा था, जिसे प्रशंसा सुनने का बहुत चाव था। उसने राजा बनते ही अपने महल में से बहादुर सिपाहियों को हटाकर वहाँ सैनिक के कपड़ों में प्रशंसक खड़े कर दिए।
प्रशंसा और चाटुकारिता की क्षमता देखते हुए राजतंत्र को पद तथा पदोन्नतियाँ दी गईं। जब कोई नागरिक राजा के दरबार में समस्या लेकर जाता तो प्रशासकों के वेश में बैठे चाटुकार, उसकी समस्या सुनने के बजाय उसे राजा की प्रशंसा से भरी पुस्तिका थमा देते। जो कोई राज्य की किसी अव्यवस्था या समस्या की बात करता, उस पर राजद्रोह का अभियोग चलाकर उसे पड़ोसी देश चले जाने का दण्ड सुना दिया जाता।
एक दिन राज्य पर शत्रु ने आक्रमण कर दिया। सारा राज्य तहस-नहस हो गया। जनता मरती रही और राजमहल राजा की महानता की पुस्तिकाएँ जारी करता रहा। राज्य को ध्वस्त करने के बाद शत्रु राजमहल में घुस गया।
राजा अपनी जान बचाने के लिए भागने लगा। उसने महल के द्वार पर खड़े सिपाही से रक्षा करने की गुहार की। गुहार सुनते सैनिक ने अपने शस्त्र नीचे रखे और तालियाँ बजाते हुए गाने लगा- ‘वाह महाराज, क्या भाग रहे हैं! वाह राजन, क्या दौड़ रहे हैं!’
अगले दिन प्रशंसा पुस्तिका में छपा- ‘हमारे राजा ने विश्व में सबसे तेज़ दौड़ने का कीर्तिमान स्थापित किया।’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Muktak, Poetry
छोरी बैठी लाइव पर, दीखन कू तैयार
चार छिछोरे आ गए, भली करे करतार
भली करे करतार, कैमरा हिला अचानक
आधे मेकअप का पूरा व्यू मिला अचानक
जल्दी से ऑफलाइन हो गई कह के सोरी
निक्कर पर साड़ी अटकाए बैठी छोरी
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
मैं एक ऐसे साहित्यकार को जानता हूँ जो हर समय विरोध और प्रतिकार की मुद्रा में ही दृष्टिगोचर होते हैं। वे कहीं भी, कभी भी, किसी भी बात से असहमत हो जाते हैं। यह असहमति उनकी दाढ़ी की तरह घटती-बढ़ती रहती है।
वेदव्यास से लेकर तुलसीदास तक और राजेन्द्र यादव से दुष्यंत कुमार तक कोई साहित्यिक तीसमारखां उनकी असहमति के दायरे से अछूता नहीं रह सका। एक बार तो वे मुझसे इस बात पर असहमत हो गए कि मेरा नाम उर्दू का लफ़्ज़ क्यों है। इस बात पर जब उनकी असहमति मेरे माता-पिता के प्रति असम्मान तक पहुँच गई तब मुझे अपने धैर्य देवता को स्तंभित कर काफी जनसुलभ शब्दावली से उनका रुद्राभिषेक करना पड़ा था। तब कहीं जाकर उनके मूल शांत हुए।
वे स्वयं को हिंदी का सबसे बड़ा पक्षधर और हितैषी मानते हैं। साथ ही वे यह बात भी पूरे ज़ोर-शोर से मानते हैं कि जिसे वे नहीं मानते उसका होना व्यर्थ है। इसी कारण विवेकानंद से लेकर कबीर तक उनके द्वारे अपना-अपना साहित्यिक बोरिया लिए पड़े रहते हैं ताकि किसी दिन उनके भाग्य जागें और उनका निरर्थक जीवन सार्थक हो जावे।
चूँकि समस्त साहित्यकारों को पढ़ने के उपरांत वे उनको मान नहीं पाए इसलिए आजकल अपने वक्तव्यों में वे अपनी बहू के मोबाइल सेट, आपनी पोती की सहेलियों, विदेश में सैटल अपने पोते की ई-मेल, अपने चश्मे का नंबर और अपनी बनाई चाय में अदरक की खुशबू जैसे जाने-माने उद्धरणों से काम चलाते हैं।
नई पीढ़ी और नए फैशन आदि से वे बहुत खिन्न रहते हैं। विकास के नाम पर सुविधाभोगी हो चले युवाओं से उन्हें ख़ास चिढ़ है। यह चिढ़ उनके उन लेखों में अधिक मुखर हो उठती है जो वे डायरेक्ट लेपटॉप पर ही लिखते हैं।
एक बार तो किसी शोकसभा में बोलते हुए वे स्वयं दिवंगत आत्मा से असहमत हो गए थे। उन्होंने फूलमाला के बीच से झाँकते चेहरे को देखकर हिकारत से कहा- ‘ये क्या बात हुई भाई, मरना ही था तो पैदा क्यों हुए थे? मुझे समझ नहीं आता कि आजकल के बूढ़े इतने कामचोर क्यों होते जा रहे हैं कि साँस लेने जितना श्रम भी नहीं कर सकते?’ शोकसभा में अन्य लोग यदि तेरह दिन के मातम से ऊबे हुए न होते तो उस दिन शोकसभा के बाहर ‘टू बी कॉन्टीन्यूड’ का बोर्ड लग जाता।
वे साहित्य में चलताऊ बातों से उकता चुके हैं। इसीलिए अब वे उन घिसी-पिटी लकीरों को तोड़ने में जुट गए हैं। वैचारिक तोड़-फोड़ से उन्हें इतना लगाव है कि उन्होंने अपनी एक ही किताब के शीर्षक में दो बार ‘तोड़ो’ शब्द का प्रयोग किया है। उनकी इस तोड़-फोड़ से प्रभावित होकर राजधानी में कुछ टूटी-फूटी हिंदी के साहित्यकारों ने उन्हें दद्दा कहना शुरू कर दिया है। इस स्नेह से फूल कर पिछले दिनों उन्होंने उन मुट्ठी भर कवियों का प्रतिशत निकालकर बताया कि मुझे दद्दा कहकर सम्मान देने वाले इन दस प्रतिशत के अतिरिक्त और कोई कवि है ही नहीं।
उनके साहित्य तथा भाषा प्रेम से मैं अभिभूत हूँ। वे हिंदी भाषा को सहज होते देख खिन्न हो जाते हैं। वे उसे उल्टे पाली और प्राकृत की ओर जाते देखना चाहते हैं। वे हिंदी की मुस्कुराहट से परेशान रहते हैं। उन्हें हिंदी में रोते-पीटते, माथा फोड़ते और गाली-गलौज करते माहौल रुचते हैं। वे हिंदी को दीमक खाए भोजपत्रों से उठकर मोबाइल स्क्रीन पर चमकता देखते हैं तो उस पर गंगाजल छिड़कने लगते हैं। इस चक्कर में वे अपने कई मोबाइल सेट ख़राब कर चुके हैं।
बहरहाल, वे हिंदी के योग्य पुत्र हैं। उनका कर्तव्य है कि वे हिंदी को कमरे के भीतर वाली कोठड़ी में घोंट कर रखें। क्योंकि उनका मानना है कि यदि उनकी हिंदी माता किसी अन्य भाषा के शब्द को गले लगा लेगी तो वह अस्पृश्य हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
जब भी कोई घटना घटती है तो हर कोई ऐरा-ग़ैरा मुँह उठाकर राजनेताओं को उपदेश देने लगता है कि इस घटना पर राजनीति न करो। हद्द है, क्यों न करें राजनीति! राजनीति करना उनका काम है। तुम्हारी तरह संवेदना और जनहित जैसी फालतू बातों में उलझना होता तो राजनीति में क्यों आते?
हमारा कंसेप्ट बिल्कुल क्लियर है। घटनाएँ घटती ही रहती हैं। सच्चा नेता वह है जो हर घटना का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर सके। बुद्धिजीवियों का काम है कि वे सच बोलें। लेकिन हमारा धर्म है कि हम उसे विपक्षी साज़िश सिद्ध कर दें।
अब राजनेता होने का ये तो मतलब है नहीं कि हम मजदूरों को गोदी में उठाकर घर पहुँचाएँ। राजनेता अगर सचमुच जनता की समस्याएँ दूर करने लग जाएंगे, तो ख़ुद सड़क पर आ जाएंगे। हमें तो बस इतना करना है कि जब हो-हल्ला बढ़ने लगे तो इसका ठीकरा फोड़ने के लिए उपयुक्त सिर ढूंढ लें। अगर हम सरकार में हों, तो विपक्ष को दोषी ठहरा दें, अगर विपक्ष में हैं तो सरकार को संवेदनहीन घोषित कर दें। राज्य सरकार में हैं तो केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर दें, केंद्र सरकार में हैं तो राज्य सरकारों को लापरवाह घोषित कर दें। हाँ, अगर कभी सरकार से लेकर विपक्ष तक और केंद्र से लेकर सरकार तक हम ही हम हों तो जनता को कामचोर कहना शुरू कर दो, पुलिस को भ्रष्टाचारी कहने लगो, बैंककर्मियों को मुनाफाखोर बता दो, कुल मिलाकर आरोप लगाते रहो।
इन आरोपों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे ख़बरें असली समस्या से भटककर ट्वीट के टाइमिंग, उसकी भाषा, गालियों के स्तर और बातों के दाँव-पेंच में उलझ जाती हैं। उधर मजदूर चलते रहते हैं, इधर ख़बरें चलती रहती हैं। मजदूर सड़क पर चलते-चलते कहीं न कहीं पहुँच ही जाएंगे। इधर हम भी ख़बरों में चलते-चलते किसी न किसी सरकार का हिस्सा बन ही जाएंगे।
संसार तो दुःखों का सागर है ही। यहाँ कष्ट कभी समाप्त हो ही नहीं सकते। यह ईश्वरीय व्यवस्था है। तो फिर कष्ट ख़त्म करने का असफल प्रयास करके हम देश का पैसा बर्बाद क्यों करें। मनुष्य जीवन इन्हीं समस्याओं के मध्य सुख तलाशने के लिए मिलता है। सो, हम अपना सुख तलाश लेते हैं।
कहते हैं, नई समस्या आते ही मनुष्य पुरानी समस्या को भूल जाता है। इसीलिए किसी भी अप्रिय घटना के बाद हम सब राजनेता एकनिष्ठ होकर एक-दूसरे को गालियाँ देने लगते हैं। सिस्टम के जंजाल में फँसाकर उस समस्या के हर समाधान को इतना दुःखी कर देते हैं कि समस्या में घिरे लोगों को अपना दुःख तुच्छ लगने लगता है।
कभी-कभी किसी शुद्ध राजनेता में भी विभीषण की आत्मा जाग जाती है और वह जनहित के अभिनय को सच समझकर सचमुच जनहित करने का प्रयास करता है तो हम उसे ‘भटका हुए नौजवान’ बनने से रोकने के लिए उससे ऐसे-ऐसे काग़ज़ मांगने लगते हैं कि उसके सिर से लोक-कल्याण का भूत उतर जाता है और वह बेबस के लिए बस लेकर निकलने की बजाय ट्वीट करने लगता है। वह जानता है कि इस देश में पैदल चलना आसान है, पर सिस्टम से चलना असम्भव है।
हमने पूरी आस्था और लगन से इस देश के लिए एक ऐसा पुख्ता सिस्टम तैयार किया है कि कोई भी सवाली अपनी समस्या लेकर इसमें घुसने की कोशिश करे तो दो ही स्थितियां होती हैं, या तो वह इसकी भूलभुलैया से ज़िन्दगी भर बाहर निकल ही नहीं पाता, और अगर कोई सूरमा निकल भी आए तो अपनी समस्या का दोष अपने ही सिर मढ़कर निकलता है।
कोरोना ट्रेन और बस में फर्क नहीं करता, तो क्या राजनीति भी न करे। कोरोना सबको एक दृष्टि से देखता है तो क्या राजनीति भी यह मूर्खता करे। कोरोना सबको एक तरीके से मारता है। लेकिन राजनीति ऐसा कभी नहीं करती। वह ट्रेन से आनेवालों के लिए अलग नियम बनाती है और फ्लाइट से आनेवालों के लिए अलग नियम बनाती है। जिन्हें हमने समानता के एहसास के साथ जीने नहीं दिया उन्हें इसी एहसास के साथ मरने की अनुमति कैसे दे सकते हैं।
राजनीति जानती है कि हवाई दौरा करने से बाढ़ का पानी नहीं उतरता, लेकिन इससे यह लाभ होता है कि बाढ़ देख-देखकर बोर होते देश को थोड़ी देर हेलीकॉप्टर देखने का अवसर मिल जाता है। राजनीति जानती है कि क्वारन्टीन सेंटर्स में जाकर मनुष्य का जीवन नरक से भी बदतर हो जाता है। राजनीति यह भी जानती है कि मोबाइल से कोरोना नहीं फैलता। लेकिन फिर भी कुछ सरकारों ने क्वारन्टीन केंद्रों में मोबाइल ले जाने पर रोक लगा दी है, ताकि वहाँ के नरक का दर्शन कर बाकी देश दुःखी न हो।
राजनीति के मन की इन कोमल भावनाओं पर कोई ध्यान देता। सब एक ही बात कहते हैं, राजनीति मत करो। अरे भई, राजनीति न करें तो क्या सड़क पर आ जाएँ!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
मीराबाई ने फेसबुक पर लिखा – ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’। लोगों ने इस पंक्ति को अपने-अपने स्टेटस पर चिपकाया। कुछ दिन बाद राणा ने मीराबाई के खि़लाफ़ एक पोस्ट लिखी। लोगों ने उस पोस्ट को देखते ही मीराबाई को ट्रोल करना शुरू कर दिया। कुछ क्रिएटिव लोगों ने फोटोशॉप करके मीराबाई की आपत्तिजनक फोटुएँ डालीं, कुछ कलाकारों ने डबिंग करके मीराबाई की अश्लील फोन कॉल का ऑडियो उपलब्ध करा दिया। कुलटा, बदचलन, चरित्रहीन, लूज़ कैरेक्टर, संस्कृति के लिए खतरा और न जाने क्या-क्या कहकर बेचारी के नाम पर अपने-अपने फॉलोवर्स बढ़ाते रहे। मीरा, अपमान का विष पीती रही और अंततः एक दिन अपनी प्रोफाइल डिलीट करके विलीन हो गई।
उसके मरते ही लोगों ने राणा को ट्रोल करना शुरू कर दिया। हत्यारा, प्रेम का दुश्मन, स्त्री विरोधी, नपुंसक, विलासी और न जाने क्या क्या कहकर राणा के बहाने अपने फॉलोवर्स बढ़ाने लगे। एक ने मीरा को देवी बताते हुए पेज बना लिया। एक ने मीराबाई सपोर्टर्स ग्रुप बना लिया। और एक ने तो इवेंट क्रिएट की – ‘कृष्ण भक्ति में डूबेगा फेसबुक, डिजिटल कीर्तन होगा, इवेंट टाइटल – मेरे तो गिरधर गोपाल!’
✍️ चिराग़ जैन