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निस्पृह

तुम हर बार तलाश लेती हो कोई नई वजह नकारने की। …और मैं हर बार बिना वजह स्वीकार लेता हूँ मन ही मन। हर बार बदल जाता है तुम्हारा बहाना …और मैं हर बार बिना वजह कर बैठता हूँ गुज़ारिश। मैं हर बार रहता हूँ वैसा का वैसा क्योंकि मैंने कभी तलाशी ही नहीं कोई वजह...

दिल टूट गया

आस का दामन छूट गया लगा मुक़द्दर फूट गया फिर से पलकें भीग गईं लो फिर से दिल टूट गया पहले भी कई बार हुआ मन में ग़ज़ब ख़ुमार हुआ नैनों में सपने उभरे और ये दिल लाचार हुआ अब फिर वही कहानी है हालत वही पुरानी है अमृत पीना चाहा तो भीतर कड़वा घूंट गया प्यार हुआ तो पीर मिली सबको ये...

अब तो ख़ुश हो!

जिस सपने से डर लगता था उसको ही साकार कर लिया लो मैंने स्वीकार कर लिया अब तो ख़ुश हो…! मैं कहता हूँ- ‘तुम चाहो तो अब भी परिवर्तन संभव है स्थितियों का अपने हित में फिर से संयोजन संभव है’ तुम कहती हो- ‘छोड़ो भी अब, सारा सोच-विचार कर लिया’ लो मैंने स्वीकार कर लिया अब...
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