Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
अद्भुत है ये देश। ढेर सारी कमियों के बावजूद सबसे अच्छा। राजनैतिक विसंगतियों के तमाम झरोखों में से जब संस्कृति की रौशनी झांकती है तो इस मिट्टी की जड़ों का एहसास सीने को चौड़ा कर देता है। साम्प्रदायिकता की आग पर स्वार्थ कीरोटियाँ सेंकने वाले चाहें तो सीख सकते हैं कि ईद पर सेवइयाँ बेचने वाला बाबा दीवाली पर खील-बताशे बेच कर अपने मन में फुलझड़ियाँ छोड़ लेता है।गणतंत्र दिवस पर जब संस्कृति और शौर्य क़दम ताल करता है तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे देश का मस्तक दमक उठता है। घूमर की ताल पर थाप देने वाली उँगलियों को कभी कत्थक की थाप देने से परहेज करते नहीं देखा गया। बांसुरी से लेकर अलगोजा तक; हमारी नानियों ने सबकी कहानियां गढ़कर बचपन को पूरे चाव से सुनाई हैं। हिंदी ने कभी उकारान्त होकर राम गाये तो कभी मीठी मिस्री से लिपट माखन चुराते कन्हाई रचे। बल्लीमारान की गली क़ासिम को भी उतने ही अदब से याद किया गया जितने सम्मान से चित्तौडगढ़ के मीरा मंदिर को। अशोक को महान कहकर हमने अकबर की भी महानता को बराबर सम्मान दिया। कुछ पल के लिए इस देश की हर व्यक्तिवाचक संज्ञा का जाति, लिंग अथवा अन्य सभी प्रकार के विशेषणों से विच्छेद करके देखता हूँ तो भीतर एक तराना गूँज उठता है-
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा…
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Poetry
लीजिये जनाब
फिर से आ गया चुनाव
चुनाव मतलब शोर-शराबा
रैली-वैली
वादे-शादे
भाषण-वाषण
गाली-वाली
इसके हिस्से उसकी थाली
उसके हिस्से इसकी थाली
कुछ की सूरत भोली-भाली
कुछ की बातें जाली-जाली
मेरी बज्जी
तेरी बज्जी
बिन मतलब की मत्था-पच्ची
मेरा पहला, तेरा पहला
इसका नहला, उसका दहला
इसकी बेग़म, उसका गुल्ला
हल्ला-गुल्ला
खुल्लम-खुल्ला
बैनर-शैनर
झंडे-वंडे
यानी सबके सब हथकंडे
हर नुक्कड़ पर कुछ मुस्टंडे
इसने मारे उसको अंडे
उसने मारे इसको डंडे
जब होगा वोटिंग का वन डे
उसके अगले दिन सब ठंडे
सबके एक सरीखे फंडे
थोड़े-थोड़े तुम मुस्टंडे
थोड़े-थोड़े हम मुस्टंडे
आओ मिलाएँ अपने झंडे
वोटर ठगा-ठगा बेचारा
देख रहा है भाईचारा
देख-देख ये ग़ज़ब नज़ारा
वोटर को चढ़ गया बुखारा
जब तक उसने किया उतारा
फिर चुनाव आ गया दोबारा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
रौशनी की बेतहाशा बेरुख़ी को देखकर
झूमते-गाते दरख़्तों तक के चेहरे बुझ गए
तीरगी ने इस क़दर बाँहों में आलम भर लिया
धूप के जितने भी थे जलवे सुनहरे बुझ गए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
लो चलो आज निश्चित मानो
मुझको मंज़िल मिलनी तय है
अब ये तुम निर्धारित कर लो
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार
संघर्षों के तपते पथ पर, झुलसाती धूप बनोगे तुम
या फिर तरुओं की छाया का दुलराता रूप बनोगे तुम
तुम पर छोड़ा तुम क्या दोगे, मुझको कुछ भी है हेय नहीं
जो तुम दोगे लौटा दूंगा, मुझ पर अपना कुछ देय नहीं
मेरी गति को निर्बाध किये, पथ छोड़ा भी जा सकता है
कुहनी से पसली घायल कर, रथ तोड़ा भी जा सकता है
तुमसे ये निर्धारण होगा, जिस क्षण ये सफ़र ख़तम होगा
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार
संघर्षों के उस पार जहाँ, उत्सव का मंच बना होगा
मेरी अनुशंसा में शोभित उन्नत ध्वजदंड तना होगा
उस पर सब कुछ ताज़ा होगा, किससे-कैसा अनुबंध रहा
दो आँखें उनको ढूंढेंगी, जिनसे मेरा संबंध रहा
मेरे मन के कोलाहल में, अपनों की गूंज भरी होगी
जिसने मेरा पथ रोका उस, कुहनी की टीस हरी होगी
जब धूसर काया दमकेगी, जब मेरी क़िस्मत चमकेगी
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
फिर से बीता इक और साल
कुछ दीवारों पर बदल गया
टेबल पे कैलेण्डर बदल गया
ऑफिस का रजिस्टर बदल गया
लेकिन ऐसे बदलावों से
कब तन बदला कब मन बदला
ना सुख बदले ना दुःख बदले
ना मानव का जीवन बदला
इस बार नई उम्मीद जगे
इस बार जगत सारा बदले
आशाओं के उजियारे में
अन्तस का अँधियारा बदले
✍️ चिराग़ जैन