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सारे जहाँ से अच्छा

अद्भुत है ये देश। ढेर सारी कमियों के बावजूद सबसे अच्छा। राजनैतिक विसंगतियों के तमाम झरोखों में से जब संस्कृति की रौशनी झांकती है तो इस मिट्टी की जड़ों का एहसास सीने को चौड़ा कर देता है। साम्प्रदायिकता की आग पर स्वार्थ कीरोटियाँ सेंकने वाले चाहें तो सीख सकते हैं कि ईद पर...

चुनाव: एक ढोंग

लीजिये जनाब फिर से आ गया चुनाव चुनाव मतलब शोर-शराबा रैली-वैली वादे-शादे भाषण-वाषण गाली-वाली इसके हिस्से उसकी थाली उसके हिस्से इसकी थाली कुछ की सूरत भोली-भाली कुछ की बातें जाली-जाली मेरी बज्जी तेरी बज्जी बिन मतलब की मत्था-पच्ची मेरा पहला, तेरा पहला इसका नहला, उसका दहला...

जलवे सुनहरे बुझ गए

रौशनी की बेतहाशा बेरुख़ी को देखकर झूमते-गाते दरख़्तों तक के चेहरे बुझ गए तीरगी ने इस क़दर बाँहों में आलम भर लिया धूप के जितने भी थे जलवे सुनहरे बुझ गए ✍️ चिराग़...

अपराजित

लो चलो आज निश्चित मानो मुझको मंज़िल मिलनी तय है अब ये तुम निर्धारित कर लो उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे अपनत्व भरा इक तरल प्यार या फिर इक जलता तिरस्कार संघर्षों के तपते पथ पर, झुलसाती धूप बनोगे तुम या फिर तरुओं की छाया का दुलराता रूप बनोगे तुम तुम...

फिर से बीता इक और साल

फिर से बीता इक और साल कुछ दीवारों पर बदल गया टेबल पे कैलेण्डर बदल गया ऑफिस का रजिस्टर बदल गया लेकिन ऐसे बदलावों से कब तन बदला कब मन बदला ना सुख बदले ना दुःख बदले ना मानव का जीवन बदला इस बार नई उम्मीद जगे इस बार जगत सारा बदले आशाओं के उजियारे में अन्तस का अँधियारा बदले...
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