Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
यदि इतिहास वाले लोग हम जैसे होते
बोलो दुविधाओं का निदान कौन करता
झाँसी वाली रानी कर लेती समझौता गर
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कौन करता
भगत भी चाटुकारों वाली भाषा सीख लेते
भारतीयता पे अभिमान कौन करता
नेताजी सुभाष औ पटेल होते स्वार्थी तो
फिर मेरे देश को महान कौन करता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished
जीवन के जिस मौसम में आँखें सपने पाला करती हैं
कुछ रंग-बिरंगी उम्मीदें जब होश संभाला करती हैं
पलकों के भीतर कोई अनगढ़ मूरत ढाली जाती है
सरगम साँसों की वीणा पर प्रियतम के गीत सुनाती है
वो मौसम जिसमें अपने कुछ कानून बनाए जाते हैं
वो मौसम जिसमें मिलन-विरह के नग़में गाए जाते हैं
वो मौसम जिसमें दुनियादारी से चिढ़ होने लगती है
वो मौसम जब आँखें अपनी दुनिया में खोने लगती हैं
वो मौसम जिसमें प्रीतम सारे जग से ऊँचा होता है
वो मौसम जब दो बाँहों में संसार समूचा होता है
वो मौसम जिसमें लोगों को दुनिया का तौर नहीं दिखता
वो मौसम जिसमें साजन से बढ़कर कुछ और नहीं दिखता
उस मौसम में इक बालक को जंज़ीर दिखाई देती थी
भारत माता की पीड़ा, आहें, पीर दिखाई देती थी
उस मौसम में इक बालक भारत मां की पूजा करता था
धरती की ख़ातिर जीता था, धरती की ख़ातिर मरता था
उस मौसम में इक बालक खेतों में बन्दूकें बोता था
मां की पीड़ा का अनुभव कर भीतर ही भीतर रोता था
उसके मन के भीतर जाने कैसा लावा सा गलता था
उसकी गीली आंखों में आज़ादी का सपना पलता था
उसकी आवाजे़ें अंग्रेजों के नक्कारों पर भारी थीं
उसकी बातों में स्वाभिमान वाली स्वर्णिम चिंगारी थी
ईश्वर ने स्वाभिमान की मानो मूरत एक बनाई थी
जिसने सतपथ पर चल अपनी जीवन वसुधा महकाई थी
वो जागा तो भारत की सोई जवानी ने अंगड़ाई ली
वो निकला तो आज़ादी की देवी ने आ अगुआई की
वो झूमा तो ऐसा झूमा, दुश्मन की नींवें हिला गया
वो गूंजा तो ऐसा गूंजा, लंदन तक हल्ला मचा गया
वो हंसते-हंसते फांसी पर झूला; दुश्मन थर्राया था
वो एक कटा तो गली-गली में भगतसिंह उग आया था
वो लक्ष्मण, भरत, भीष्म, अर्जुन की एक सकल प्रतिच्छाया था
वो मां के कष्ट मिटाने को अवतारी बनकर आया था
✍️ चिराग़ जैन