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न्याय के मुँह पर जूता

भारतीय लोकतन्त्र लगभग उस मुकाम पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ से ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ के मध्य की खाई इतनी चौड़ी हो जाती है कि किसी के लिए भी दोनों ओर पैर रखकर टिके रहना असंभव हो जाए। एक ओर तन्त्र है, जो संविधान की मूल भावना से भटककर अपने-अपने वाद तथा अपने-अपने गुटों के साथ इस हद...

अराजकता को साधुवाद

‘नो एफआईआर, नो इन्वेस्टिगेशन, नो चार्जशीट, फैसला ऑन द स्पॉट…’ -ऐसे संवाद फिल्मों में तो बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन असल ज़िन्दगी में इस डायलॉग पर काम करनेवाले कार्यपालक निरंकुश हो जाते हैं। यह सत्य है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया की धीमी गति और लचर व्यवस्था का ही...

मुहब्बत सबको होती है

बहुत ज़्यादा न हो पर कुछ तो हसरत सबको होती है जहाँ में नाम और शोहरत की चाहत सबको होती है मरासिम हर दफ़ा ताज़िन्दगी निभता नहीं लेकिन किसी से इक दफ़ा सच्ची मुहब्बत सबको होती है मन अपने आप से भी इक ना इक दिन ऊब जाता है किसी अपने की दुनिया में ज़रूरत सबको होती है हर इक मुज़रिम...
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