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ऊब का गीत

आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है आदमी को खींचती है राह उसकी प्यार का मतलब नहीं है प्यार केवल प्यार का आधार है परवाह उसकी मेघ से ऊबे तो इक सूरज बुलाया सूर्य दहका, देह ने बरसात कर दी रात से उकता गए तो दिन उगाया थक गए दिन से तो फिर से रात कर दी जो हमारे पास है उससे दु:खी...

भूल

क्यों भला भाती नहीं शीतल नदी की धार यूँ समझ लो आप अपनी प्यास को भूले हुए हो ख़ुश हुए तो भूल बैठे दर्द का उपकार रो पड़े तो प्राण के उल्लास को भूले हुए हो आज से पीछा छुड़ाकर भागते हो एक कोरे ख़्वाब के संग जागते हो क्यों हज़ारों ख़्वाहिशों का ढो रहे हो भार आप शायद वक़्त...

ऊँचाइयाँ

केवल दूरियाँ तय करते हैं समतल रास्ते ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए चलना ही नहीं चढ़ना भी पड़ता है। ✍️ चिराग़...

आराम का एक दिन

रात काटें जागकर हम दिन बिताते भागकर हम व्यस्तता से घिर रहे हैं क्यों उनींदे फिर रहे हैं इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें आओ कुछ पल चैन से सो लें एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन...

मैं महज किरदार जीता हूँ

एक मैं, कितना झमेला विश्व मुझ जैसों का मेला इस समूची सृष्टि को जो साध लेता है अकेला बस उसी के खेल का विस्तार जीता हूँ मैं महज किरदार जीता हूँ मैं वही जिसने जनम के साथ इक परिवार पाया हार हो या जीत हो, परिवार सब स्वीकार पाया जब जहाँ जो भी मिला सब भोगकर जीता रहा हूँ...
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