Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
प्यार का मतलब नहीं है प्यार केवल
प्यार का आधार है परवाह उसकी
मेघ से ऊबे तो इक सूरज बुलाया
सूर्य दहका, देह ने बरसात कर दी
रात से उकता गए तो दिन उगाया
थक गए दिन से तो फिर से रात कर दी
जो हमारे पास है उससे दु:खी हैं
जो हमारा है नहीं है चाह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
प्रेम से ऊबे घृणा का हाथ थामा
वैर नस-नस में भरा तो दिल निचोड़ा
भोग से ऊबे, तो ये संसार त्यागा
और फिर संन्यास में जंजाल जोड़ा
ऊब जाने से नहीं ऊबा कभी मन
ऊब जाने की नहीं है थाह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
राह में ही भोग लो संबंध सारे
द्वार के उस पार उच्चाटन मिलेगा
प्रेम है जिससे उसे दुर्लभ बना लो
प्राप्ति के पश्चात भारी मन मिलेगा
कल्पना ने आज आलिंगन भरा है
सत्य में चुभने लगेंगी बाँह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
क्यों भला भाती नहीं शीतल नदी की धार
यूँ समझ लो आप अपनी प्यास को भूले हुए हो
ख़ुश हुए तो भूल बैठे दर्द का उपकार
रो पड़े तो प्राण के उल्लास को भूले हुए हो
आज से पीछा छुड़ाकर भागते हो
एक कोरे ख़्वाब के संग जागते हो
क्यों हज़ारों ख़्वाहिशों का ढो रहे हो भार
आप शायद वक़्त के इतिहास को भूले हुए हो
कब समय किसकी बना दे कौन सूरत
आँसुओं में भीग जाएँ, शुभ मुहूरत
कुंडली में दिख रहा आंगन खड़ा त्योहार
आप शायद राम के वनवास को भूले हुए हो
पाल भी बांधो, हवा भी है ज़रूरी
भीगकर ही नापती है नाव दूरी~
पार कर पाती नहीं नौका, कोई पतवार
तो यक़ीनन आप इक अरदास को भूले हुए हैं
✍️ चिराग़ जैन
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केवल दूरियाँ तय करते हैं
समतल रास्ते
ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए
चलना ही नहीं
चढ़ना भी पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन
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रात काटें जागकर हम
दिन बिताते भागकर हम
व्यस्तता से घिर रहे हैं
क्यों उनींदे फिर रहे हैं
इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो
आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो
व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन ऐसा चुरा लें
काश बेपरवाह होकर आँख मूंदें, मुस्कुरा लें
याद की कुछ गठरियाँ खोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
पिंडलियों में नींद के अन्याय की पीड़ा भरी है
भृकुटियों पर एक मुद्दत से बहुत चिंता धरी है
भीड़ के जंजाल से हटकर कभी एकांत बुन लें
शांत हों इतने कि अपनी देह की आवाज़ सुन लें
एक दिन ख़ुद के लिए रो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
विश्व का हमने कोई कर्जा नहीं खाया हुआ है
किसलिए मुस्कान का ये झूठ चिपकाया हुआ है
एक दिन बस एक दिन की ज़िंदगी का लुत्फ़ ले लें
जीतने और हारने से दूर होकर खेल खेलें
ज़िंदगी में ज़िन्दगी बो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें
✍️ चिराग़ जैन
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एक मैं, कितना झमेला
विश्व मुझ जैसों का मेला
इस समूची सृष्टि को जो
साध लेता है अकेला
बस उसी के खेल का विस्तार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
मैं वही जिसने जनम के साथ इक परिवार पाया
हार हो या जीत हो, परिवार सब स्वीकार पाया
जब जहाँ जो भी मिला सब भोगकर जीता रहा हूँ
प्यार और मनुहार और अधिकार और सत्कार पाया
जब मिले दुत्कार तो दुत्कार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
मंच पर हूँ, मंच का मालिक मगर बेशक नहीं हूँ
पात्र भर हूँ, किन्तु मैं इस स्वांग का लेखक नहीं हूँ
जब मिले जो भूमिका, भरपूर उसको खेलता हूँ
क्यों कहानी की करूँ चिंता मैं निर्देशक नहीं हूँ
रोग का हो दृश्य तो उपचार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
हर कोई है इस जहाँ में, हर किसी का इक जहाँ है
हर किसी को इस कथा का केंद्र होने का गुमाँ है
कौन जाने कौन किसका कब कहाँ पर्दा गिरा दे
मैं अभी तक मंच पर हूँ ये कृपा भी कम कहाँ है
जो निरंतर हो रहा उपकार जीता हूँ
मैं महज किरदार जीता हूँ
✍️ चिराग़ जैन