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अपराजित

लो चलो आज निश्चित मानो मुझको मंज़िल मिलनी तय है अब ये तुम निर्धारित कर लो उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे अपनत्व भरा इक तरल प्यार या फिर इक जलता तिरस्कार संघर्षों के तपते पथ पर, झुलसाती धूप बनोगे तुम या फिर तरुओं की छाया का दुलराता रूप बनोगे तुम तुम...
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