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बदरा

जाने ये कैसा बदरा है बदरा के भीतर मदिरा है जब छलकी तो सब झूम उठे जैसे मृदंग से धूम उठे पीपल ने छेड़ी तान अलग बूंदों ने गाया गान अलग पुरवा ने ऐसा रास रचा बिजुरी ने जी भर नाच नचा पंछी कलरव करते डोले कच्चे स्वप्नों ने पर खोले बचपन बौराया तब भू पर हाथों से बूंदें छू-छू कर...
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