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ये आग कब बुझेगी

विश्व भर में भावुकता और संवेदना की मिसाल कहा जानेवाला देश आज राजनैतिक वर्चस्व की अंधी होड़ में संवेदना जैसे शब्दों को कितना बेमआनी कर चुका है, इसका आभास होने तक संभवतः हमारे पास पश्चाताप के लिए आंसू तक नहीं बचेंगे।
हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है कि अपनी महत्वाकांक्षाओं की बलिवेदी पर नौनिहालों को बलिदान करनेवाले चरित्र कंस और हिरण्यकश्यप जैसी कुख्याति को प्राप्त करते हैं। लेकिन जिस दौर में निगेटिव पब्लिसिटी को भी सुर्ख़ियों में बने रहने का हथकण्डा समझा जाने लगा हो, वहां बेचारी संस्कृति की पुस्तक पलटने की फ़ुरसत किसके पास बची है!
यह सत्य है कि लखनऊ की आग न तो सत्ता ने लगाई है, न ही विपक्ष ने। लेकिन यह भी सत्य है कि राजनीति ने हमारी संवेदना को इतना भौंथरा तो कर ही दिया है कि हम चौदह-पन्द्रह परिवारों की चौखट पर पसरे अंधेरे पर कोई टिप्पणी करने से पहले यह सोच रहे हैं कि इससे सत्ता को क्या नुकसान होगा और विपक्ष को क्या लाभ होगा। हम मानवता की मर्यादा रेखा से इतनी दूर तो आ ही गए हैं कि बड़े से बड़े दुर्भाग्य की ख़बर सुनकर हमारे समाचार चैनल यह विचार करने लगते हैं कि जिस इमारत में आग लगी है उसे कोचिंग सेंटर की बजाय गेमज़ोन कहने से ख़बर की लपटों को किस दिशा में मोड़ना संभव हो सकेगा।
यह एक सत्य है कि ‘हादसे बोलकर नहीं आते’ लेकिन यह भी सत्य है कि यदि प्रशासन हादसे से उपजे क्रोध को डाइल्यूट करने की बजाय वास्तव में समाधानोन्मुखी कदम उठाती तो आज़ादी के आठवें दशक में भी हम अनाधिकृत निर्माण और विभागीय भ्रष्टाचार के कारण निर्दोष युवक-युवतियों के झुलसे हुए जिस्म देखने पर विवश न हुए होते।
परीक्षाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और विभागीय लापरवाही से हताश जिन बालकों ने आत्महत्या जैसे कदम उठाए हैं, वे दरअस्ल हमारी व्यवस्था के मुंह पर यह प्रश्नचिन्ह तो छोड़ ही गए हैं कि इस हताशा का असली दोषी कौन है कि एक बालक अपने सिस्टम से सवाल पूछने की बजाय, अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेना ज़्यादा आसान समझ रहा है। हो सकता है कि अत्याचार के आगे अपना मुंह बंद करने से अधिक आसान जान पड़ा हो अपनी आंखें बंद कर लेना।
कल उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री को लखनऊ के घटनास्थल के बाहर मीडिया को बाइट देते देखा। महसूस हुआ कि उनका गला भर्रा गया था। महसूस हुआ कि उनकी आंखों की कोरें भीग गई थीं। बस उसी एक बाइट को देखकर मेरे भीतर के नैराश्य में आशा की किरण जगती है। लेकिन इसके तुरंत बाद ज्यों ही मीडिया कवरेज देखी तो ऐसा लगा जैसे हमने संवेदना की तमाम उम्मीदों को नेस्तोनाबूद करने का प्रण ले लिया है।
प्रश्न यह नहीं है कि सत्तर साल किसका शासन था और बारह साल से कौन गद्दी पर बैठा है। प्रश्न यह है कि दिल्ली में तोड़े जा रहे अनधिकृत निर्माण पर व्यवस्था को कोसनेवाले अराजक नागरिकों को लखनऊ की दुर्घटना पर अनधिकृत निर्माण के लिए सरकार को उत्तरदायी ठहराने का अधिकार कैसे मिल सकता है?
प्रश्न यह है कि यदि अलीगंज की उस इमारत के लिए अधिकारियों पर सख़्त कार्रवाई की मांग की जा सकती है तो चांदनी चौक और करोलबाग़ की इमारतों का हिसाब-किताब करने पर हंगामा क्यों मचाया जाता है।
दरअस्ल समस्या के समाधान पर किसी का ध्यान है ही नहीं। सत्ता हो या विपक्ष, किसी भी घटना या दुर्घटना पर उनके मन में केवल एक प्रश्न कौंधता है कि इस घटना को भुनाकर पब्लिक सेंटीमेंट्स अपने पक्ष में कैसे किये जाएं। पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में सिर पर लटकते बिजली के तार हटाने तक का साहस जिस व्यवस्था में नहीं है, वह बुलडोजर और त्वरित न्याय की बात करती अच्छी नहीं लगती।
जब कभी यह प्रश्न उठता है, तब बेशक सरकारी विभाग कुछ छज्जे तोड़कर, कुछ इमारतें गिराकर अपनी गंभीरता का विज्ञापन करने लगते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि जिस अधिकारी के कार्यकाल में वह इमारत बनकर तैयार हुई, जिस-जिस अधिकारी के हस्ताक्षर से उसका बिजली-पानी का कनेक्शन पास हुआ। जिस-जिस अधिकारी ने उसकी हाउस-टैक्स की रसीदों पर हस्ताक्षर किए, उन सब पर हत्या के मुकदमे चलाने का प्रवधान नहीं होगा तो यह व्यवस्था कभी नहीं सुधरेगी।
मैं किसी भाजपा या किसी कांग्रेस का समर्थन या विरोध करके अपने आंसुओं का अपमान नहीं करना चाहता। मैं यह भी नहीं चाहता कि अमानवीय भ्रष्ट आचरण को किसी भी तरह की अराजकता के हाथों सौंप दिया जाए। मैं केवल इतना चाहता हूं कि जिन संभावनाओं को कल अलीगंज की इन लपटों ने लील लिया है, उन्हें हम श्रद्धांजलि न दें, बल्कि यह आश्वस्ति दें कि ‘प्यारे बच्चो! जब भी इस देश में व्यवस्था-सुधार के तात्कालिक कारणों पर चर्चा होगी, तब तुम सबके झुलसे हुए चेहरे सूरज की तरह चमक उठेंगे।’

✍️ चिराग़ जैन

पत्रकारिता का काला दिन

आज जंतर-मंतर पर जो भीड़ जुटी है, वह कल क्या कर पाएगी, इस प्रश्न का उत्तर तो भविष्य की कुक्षि में छिपा है, लेकिन उसने आज-आज में भारतीय समाचार चैनल्स की चेहरे को जितना नंगा कर दिया है, वह पिछले दस-बारह वर्ष में कभी इतनी साफ़गोई से नहीं हो सका था।
आज के दिन की रिपोर्टिंग को देखकर यह साफ़ कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया सरकार की पीआर एजेंसी के रूप में कार्य करती है। और तथ्यों को न केवल छिपाती है बल्कि पीत पत्रकारिता करके, झूठ बोलकर सरकार के पक्ष में माहौल बनाने का हर संभव प्रयास करती है।
सरकार की पब्लिक इमेज को बनाए रखने के लिए समाचार चैनल्स को झूठ की जितनी घिनौनी तस्वीर पेश करनी पड़े, वह करेगी।
आज की रिपोर्टिंग के तीन स्तर हैं। प्रथम, दीपके की चरित्र हत्या। द्वितीय, समर्थकों को इस-उस दल का कार्यकर्ता सिद्ध करना। तृतीय, भीड़ के चित्रों से बचते हुए सौ-पचास लोगों की उपस्थिति रिपोर्ट करके यह सिद्ध करना कि आंदोलन फुस्स हो गया है।
मैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आंदोलन से नहीं जुड़ा हूं। किन्तु मैंने अपने जीवन के पांच साल तक पत्रकारिता तथा जनसंचार की पढ़ाई की है। मैंने भारतीय पत्रकारिता का जितना समृद्ध और प्रभावी इतिहास पढ़ा है, उसके झरोखे से जब मैं आज की पत्रकारिता को देखता हूं तो मुझे यह तस्वीर और भी अधिक कुत्सित नज़र आती है।
दिन को दिन और रात को रात कहने का दायित्वनिर्वहन करती हुई पत्रकारिता ने अपने इस कर्तव्य से मुंह मोड़ लिया है। यदि यह मान ही लिया जाए कि शासन के दबाव तथा व्यावसायिक घरानों के राजनैतिक हितों की मजबूरी में कई बार शाम को रात कहने वाली पत्रकारिता दरअस्ल विवश है। किन्तु भरी दोपहर को रात कहने में तो थोड़ी सी लज्जा चेहरे पर उतर ही आनी चाहिए थी।
जिन न्यूज़ प्रेज़ेंटर्स ने दस-पन्द्रह से सौ-पचास और चार-पांच सौ तक की संख्या बताकर देश के युवाओं के इस प्रयास का उपहास किया है। अगर यह ख़बर पढ़ते हुए उनकी नज़रें भी नीची हुई होतीं तो मैं उनकी विवशता को क्षम्य मान सकता था।
लेकिन जिस ढिठाई से आन्दोलन को विवश बताया गया। मेन स्ट्रीम रिपोर्टिंग से आंदोलन को नदारद किया गया, वह भारतीय पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास के मुख पर कालिख पोतने जैसा कृत्य है।
सुना है, कभी एक मशहूर एंकर शराब पीकर लड़खड़ाते हुए जनरल रावत के निधन का समाचार पढ़ते पाए गए थे। विश्वास मानिये, उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, एक पत्रकार बाकायदा खबरों की दलाली करते कैमरे में कैद हुए, बाकायदा जेल होकर आए। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, नोटबंदी के दौर में नए नोट के पक्ष में माहौल बनाते हुए नए नोट में चिप होने की ख़बर प्रसारित हुई थी। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
लेकिन आज तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने गिरने की हर मार्यादा लांघकर बाकी के तीनों स्तंभों को धराशायी करने का कुचक्र रच दिया। आज हिंदी पत्रकारिता के जनक पंडित जुगल किशोर की आत्मा बहुत कष्ट में होगी।
अंग्रेज सरकार से डरे बिना भारतीय समाज को जागृत करने के प्रयास में जेल जानेवाले पत्रकारों को आज यह देखकर कैसा लग रहा होगा कि उनकी वंशबेल ऐसे क्लीवस्वभावी प्राणियों से जा लिपटी है, जिन्हें कोरा झूठ बोलने में लेशमात्र भी संकोच नहीं होता।
हालांकि निर्लज्जता के उत्कर्ष तक जा पहुंचे पत्रकारों से कोई उम्मीद तो नहीं है लेकिन यह याद दिलाने का दुस्साहस कर रहा हूं कि इस देश में उपहार सिनेमा की ख़बर पढ़ते समय सुरेन्द्र प्रताप सिंह की हृदयगति रुक गई थी। याद दिलाना चाहता हूं कि आपातकाल के विरोध में जनसत्ता ने पूरा पेज काला छापकर सरकार का मुखर विरोध किया था।
मैं यह अपेक्षा कतई नहीं करता कि आज की पत्रकारिता सरकार की किसी नीति का विरोध कर सकेगी। लेकिन इतनी अपेक्षा तो थी ही कि ये सच से ठीक 180 डिग्री मुंह फेरकर सफेद झूठ बोलते अपने आकाओं को ख़ुश करने में नहीं हिचकिचाएंगे।
मैं सोच नहीं पाता हूं कि इन लोगों का सामना जब अपने बच्चों से होता होगा, तो क्या इनका दिल दहल नहीं जाता होगा कि अपने नौनिहालों के लिए वे कैसे भारत का निर्माण कर रहे हैं।
सरकारी योजनाओं का विज्ञापन, सरकारी ईवेंट्स की ईवेंट कवरेज तक जिन पत्रकारों की पूरी क्षमता सिमटकर रह गई है, उन्हें अपने घरों में एक आईना ज़रूर रखना चाहिए, ताकि कभी गाहे-बगाहे उन्हें अपनी शक्ल दिखाई दे जाए तो याद कर सकें कि कभी उनकी आंखों में भी हया हुआ करती थी।

✍️ चिराग़ जैन

समय बहुत नाज़ुक है

एक पत्रकार ने अध्यापकों की कौड़ी गिन दी और पूरा समाज उस पत्रकार के विरोध में खड़ा हो गया। एक प्रशासनिक अधिकारी ने ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया और युवाशक्ति ने रातोंरात एक डिजिटल क्रांति खड़ी कर दी।
शिक्षा के दोनों छोर एक साथ छेड़े गए और एक पूरे समाज के सिले हुए होंठ खुल गए। इस क्रांति का भविष्य क्या होगा यह तो कहना कठिन है, किन्तु इन दोनों प्रकरणों ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि संभावनाएं और आशंकाएं क्षीण हो सकती हैं किन्तु समाप्त कभी नहीं होती।
सोशल मीडिया पर विचरण करते हुए पाता हूं कि देश में किसी क्रांति जैसा माहौल है। रवीश कुमार से लेकर खान सर तक कोई भी ऐसी बात नहीं कह रहा है, जो समाज जानता न हो, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि बातें कही जाने लगी हैं। कब तक कह पाएंगे और कहां तक सुनी जाएंगी… यह कहना जल्दबाज़ी होगी।
इस दौर में अट्टालिकाओं के अहंकार से त्रस्त समाज से मैं यह अपेक्षा अवश्य करूंगा कि इस बार अपने विवेक से समझौता मत करना। सिस्टम का विरोध ही सही, लेकिन किसी के भी पीछे चलने से पहले यह समझ लेना कि कहीं हमारा नेतृत्व करनेवाला भी अपने किसी हितसाधन के लिए हमें भीड़ की तरह ‘इस्तेमाल’ तो नहीं कर रहा है।
कहीं श्वेत परिधानी बाबा का रिमोट किसी चालाक प्रशासनिक के हाथ में तो नहीं है। किसी के सुर में सुर मिलाने से पहले यह अच्छी तरह पड़ताल कर लेना कि कहीं इस सुरीले क्रांतिकारी के सुरों का कोई सप्तक किसी दूसरे आततायी के चरणों में जाकर विलीन तो नहीं हो रहा है।
‘जन’ एक महत्वपूर्ण शब्द है। दुनियाभर में अब राजनीति को इस ‘जन’ की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस जन को एकत्रित करके शातिर लोगों ने जैसे-जैसे धोखे किए हैं, उनसे सबक लेकर इस बार कदम मिलाकर भी चलना आवश्यक है और कदम संभालकर भी…।
मुझे याद है कांग्रेस सरकार के समय राहुल गांधी ने एक बयान दिया था कि मध्यम वर्ग कैटल क्लास की तरह सफ़र करता है। इस बयान पर खूब हंगामा हुआ था। राहुल गांधी के विरुद्ध लोगों का गुस्सा फूटा था। उस समय कांग्रेस के सत्ताजनित अहंकार के परिणामस्वरूप प्रत्येक ख़बर लोगों की भावनाओं को आहत करती थी।
अब भी लगभग वही माहौल है। बस तब जनता बोलती थी, आज बोलने पर अनकही-सी मनाही है। पानी को अगर सही तरीके से निकलने का रास्ता न मिले तो वह पाइप फोड़कर निकलता है। हालांकि मैं फिर भी इस बात पर अडिग हूं कि किसी भी तरह की अराजकता अंततः हानिकारक ही सिद्ध होती है। यह बात सिस्टम को भी समझनी होगी और जनता को भी। सिस्टम को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि अपेक्षा, बात और शिकायत दरअस्ल सिस्टम का विरोध ही हैं। ठीक इसी तरह जनता को भी यह समझना होगा कि प्रशासन चलाते समय कहा गया हर शब्द अभिधा नहीं होता।
एक और महत्वपूर्ण बात। यदि केवल अध्यापकों को राष्ट्रप्रेमी, ईश्वर के अवतार और ऐसे ही हाइपोथेटिकल विशेषणों से नवाज़ने का सिलसिला ज़ोर पकड़ गया तो मूल विषय धूमिल हो जाएगा। जैसे किसान आंदोलन के समय हुआ। जैसे डॉक्टरों की हड़ताल के समय हुआ। जैसे खिलाड़ियों के समय हुआ।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर मनुष्य में कुछ खामी हो सकती है। जिस देश में डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अध्यापक हुए हैं उस देश में कोई अध्यापक भ्रष्ट हो ही नहीं सकता, इस सामान्यीकृत धारणा से अपने समाज को बचाना आवश्यक है। और जिस देश में एक पत्रकार दारू पीकर लड़खड़ाती हुई एंकरिंग करता हुआ रिकॉर्ड हुआ है, उस देश में सभी पत्रकार दारुड़िये हैं, यह धारणा भी अपरिपक्व है। मेरा तो मानना है कि जो पत्रकार दारू पीकर न्यूज़ पढ़ता हुआ मिला है, वही पत्रकार कभी सत्ता की आंखों में आंखें डालकर प्रश्न करता हुआ मिल जाए तो उसका उस विशेष साहस के लिए सम्मान किया जाना चाहिए। और फिर वही पत्रकार किसी दिन पीत पत्रकारिता करता पाया जाए तो उसी पत्रकार की आलोचना होनी चाहिए।
पत्रकारों को यह बात समझनी पड़ेगी कि जनता का जो गुस्सा इस समय पत्रकारिता के विरुद्ध आंधी की तरह फूट रहा है, वह किसी एक पत्रकार की एक स्टेटमंेट का परिणाम नहीं है। पत्रकारों को यह याद करना होगा कि इस देश ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी सरीखे पत्रकारों को देखा है। इस देश की पत्रकारिता ने साहस और नैतिकता के इतने बड़े प्रतिमान खड़े किए हैं कि व्यावसायिकता और सत्ता के दबाव से उत्पन्न आपकी कोई भी विवशता यह देश नहीं समझ सकेगा। इसलिए अपनी रिपोर्टिंग में दबाव का अनुपात आटे में नमक जितना ही रखें। इससे अधिक दबाव दिखा तो खानेवाला आपकी रसोई के कौर को थूक देगा।
✍️ चिराग़ जैन

सरकार बड़ी दयालु है

सालों तक हम किसानों के लिए ‘अन्नदाता’, ‘धरती का भगवान’ और न जाने क्या-क्या विशेषण प्रयोग करते रहे। फिर एक दिन किसानों का राजनीति से पंगा हो गया। पंगा होते ही हम किसानों को ‘आतंकवादी’, ‘राष्ट्रद्रोही’, ‘दंगाई’, ‘अराजक’ और न जाने क्या-क्या कहने लगे। किसानों ने आंदोलन किया तो हमने ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे को बांट दिया और अपने जवानों को आदेश दिया कि किसानों पर हमला करो।
इसी तरह हम डॉक्टरों को भगवान का प्रतिनिधि कहते रहे। फिर एक बार डॉक्टरों को सरकार के सामने अपनी कुछ मांगें रखनी पड़ी। चूंकि इतने सालों में डॉक्टर भी खुद को भगवान समझने लगे थे इसलिए उन्होंने सरकार को डांटने का दुस्साहस किया। सरकार ने दो मिनिट में डॉक्टरों को बता दिया कि बेटा, तुम्हें भगवान बनाना हमारी लीला है। भगवान दरअस्ल हम ही हैं।
यही हाल खिलाड़ियों का भी रहा। जिसका सरकार से पंगा हुआ, उसी को उसकी औक़ात बता दी गई। पत्रकारों ने समय पर ही सरकार की कुर्सी पर बैठे भगवान को पहचान लिया था। इसलिए उन्होंने समय से पहले ही सरकार की आरती गानी शुरू कर दी थी। सरकार ने शरणागतवत्सल की तरह पत्रकारों को अभयदान दिया।
ज्यों-ज्यों अलग-अलग वर्गों ने सरकार द्वारा दिए गए सम्मान को सरकार के विरुद्ध प्रयोग करना चाहा, तुरंत सरकार ने उन पर से दयादृष्टि हटाकर तीसरी आंख खोल दी। और एक बार जिस पर उस तीसरी आंख की ज्वाला पड़ी, उसकी प्रतिष्ठा जलकर भस्म हो गई।
जिन विद्यार्थियों को हम अब तक देश का भविष्य समझते रहे, वे सरकार के सिस्टम में खामी निकालते ही कॉकरोच बन गए। विद्यार्थियों ने कहा कि हम सरकार का विरोध नहीं कर रहे हैं, हम तो केवल चोट के दर्द से कराह रहे हैं। पत्रकारों ने बताया कि तुम्हारी कराह से सरकार की आरती का माहौल खराब होता है। यह भी राष्ट्रद्रोह ही है।
शिक्षकों ने सोचा, हमें तो गुरुपूर्णिमा, शिक्षक दिवस और ऐसे ही तमाम सम्मान प्राप्त हैं। हमें तो हर वर्ग ने हमेशा सम्मान की दृष्टि से ही देखा है। यहां तक कि हिन्दी फिल्मों में भी हम हमेशा सम्मानित ही रहे हैं। और फिर हमने जनगणना से लेकर सरकार के अन्यान्य कार्यों में भी कभी आनाकानी नहीं की। झोला लेकर गली-गली बंद और खुली नालियां गिनते फिरे हैं। पोलियो की दवाइयां पिलाई हैं। इसलिए सरकार हमारी बात अवश्य सुनेगी।
ऐसा विचार करके मास्टर जी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने विद्यार्थियों को हुए कष्ट की दुहाई देते हुए रण में कूद पड़े। अबकी बार सरकार ने कुछ नहीं कहा। लेकिन पत्रकारों ने मास्टर जी की कौड़ी उठा दी। मास्टर बेचारा अपनी अदना सी पे-स्लिप को देखकर अपमानित होकर पानी-पानी हो गया। किसी ने मास्टर को ट्यूशनिया कहा तो किसी ने माफ़िया।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सरकार कभी ग़लत नहीं होती। जिसे सरकार में कोई ख़ामी दिखती है, वह या तो अहसानफ़रामोश है या फिर राष्ट्रद्रोही है। सरकार तो कृपानिधान है। वह तुम्हें समाज से इज़्ज़त दिलवाती है और तुम चले हो उसी पर उंगली उठाने…! हम्मम… बड़े आए!
✍️ चिराग़ जैन

महँगाई को डायन मत कहो प्लीज़

महंगाई के लिए सरकार को कोसने का चलन पुराना हो गया। ज़रा सी महँगाई क्या बढ़ी कि राशन-पानी लेकर सरकार पर चढ़ गए। अब समय बदल रहा है।
अब ऐसी बातों पर लाइक और कमेंट नहीं आते। इसलिए कुछ अलग ढंग से सोचो। महँगाई के लिए सरकार को नहीं, विपक्ष को कोसो।
सरकार तो कब से कह ही रही थी कि ईंधन के दाम बढ़ने के कोई चांस नहीं हैं। ये विपक्षी नेता ही हैं जो बार-बार कहते थे कि वोटिंग ख़त्म होते ही दाम बढ़ जाएंगे।
कितनी बार कहा है, शुभ-शुभ बोला करो। चौबीस घंटे में एक बार जिह्वा पर सरस्वती बैठती है। अब ले लो मजे। हो गई ना ये मनहूस बात सच्ची!
सरकार का एक-एक मंत्री, एक-एक नुमाइंदा दिन-रात यही बात दोहराता रहा कि दाम नहीं बढ़ेंगे। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है।
समझदारी इसी में है कि जो हो गया उसे स्वीकार कर लो। बीती ताहि बिसार के आगे की सुध लेय। अंतिम सत्य यही है कि दाम बढ़ चुके हैं। इतिहास गवाह है, बढ़े हुए दाम कभी कम नहीं होते। इसलिए रोना-पीटना करके कंगाली में आटा गीला मत करो, बल्कि इस बात में दिमाग़ लगाओ की इन बढ़े हुए दामों को चुकाना कैसे है।
विपक्ष आपको बरगलाने के लिए तैयार बैठा है। अरे भई, सिलेंडर महंगा हो गया तो क्या राजघाट पर जाकर डांस करोगे? किराये महंगे हो गए तो क्या बैलगाड़ी पर दफ्तर जाने का ड्रामा करेंगे? यह आचरण आपको शोभा नहीं देता।
ईश्वर ने क्या हमें खाने-पीने और घूमने-फिरने के लिए यह अनमोल मनुष्य जीवन दिया है। अरे भाई, इतनी सड़ी गर्मी में बाहर निकलोगे तो लू लग जाएगी। अपने घर में रहो। टीवी पर बढ़िया-बढ़िया मनोरंजक कार्यक्रम देखो।
अब आप रोना रोने लगो कि प्याज महंगी हो रही है। दरअसल ये सोच ही गलत है। विपक्ष चाहता है कि आप प्याज के दामों की तुलना प्याज के ही दाम से करें। ये भी कोई बात हुई।
प्याज का सदुपयोग करना आपको नहीं आता और कोस रहे हैं सरकार को। विपक्ष ने इतने साल तक आपको यही सिखाया कि प्याज दिखे तो उसे खा जाओ। प्याज कोई खाने की चीज है, अरे प्याज तो गर्मी के मौसम में जेब में रखकर घूमने की चीज है।
लेकिन विपक्ष ये बात आपको नहीं बताएगा, क्योंकि अगर आपने प्याज जेब में रखकर गर्मी का इलाज ढूँढ लिया तो हज़ारों रुपये के एसी कौन खरीदेगा।
विपक्ष तो है ही नकारात्मक। इसे सरकार के हर निर्णय में बुराई ही दिखती है। अरे भाई, कॉमर्शियल सिलेंडर महंगा करने से अब लोग घर का शुद्ध खाना खाएंगे। ये किसी को दिखाई नहीं देता।
घर की रोटी छोड़कर बाहर ढाबों में, होटलों में, ठेले पर लार गिराते फिरना कोई सभ्य लोगों का काम है। हाँ, कभी-कभार झालमुड़ी खा ली, कभी एकाध लिट्टी-चोखा खा लिया तो दस-बारह रुपये खर्च हो भी गए तो कौन सी आफ़त आ जाएगी।
‘रूखी-सूखी खाय के ठण्डा पानी पी’ -यही निरोगी जीवन का मूल सिद्धांत है। ऊटपटांग तला-भुना खाओगे तो बीमार पड़ जाओगे। बीमार पड़ोगे तो अस्पताल जाना पड़ेगा, दवाइयां खानी पड़ेंगी। फिर शोर मचाओगे, कि दवाएं महंगी हैं।
ऐसे कर्म ही क्यों करते हो कि तुम्हें दवाई खरीदनी पड़े। सरकार बेचारी कहाँ तक हथेली लगाएगी।
बस एक बात ध्यान रखो। महँगाई केवल एक भ्रम है। असली बात ये है कि विपक्ष आपको बीमार करना चाहता है, और सरकार आपको स्वस्थ रखना चाहती है।

✍️ चिराग़ जैन

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