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परवानू : एकाकी मन का संगीत

परवानू से केबल कार में सवार होते ही रस्सियाँ हमें मोक्ष की ओर ले चलीं। मन आजकल अध्यात्म की यात्रा पर है, इसलिए ऐश्वर्य की वीथियों पर भी दृष्टि को दर्शन का योग मिल ही जाता है।
रूम चेक-इन करके बालकनी का दरवाज़ा खोला तो यकायक अपने आपको शिवालिक की पहाड़ियों से कुछ ऊँचा महसूस किया। सामने प्रकृति का विराट वैभव पसरा हुआ है। नीलाभ सौंदर्य के बीच श्वेत बादलों का अस्तित्व बड़े से कैनवास पर बेतरतीब किन्तु सार्थक ब्रश स्ट्रोक्स का आभास करा रहे हैं।
स्वयं को ऊंचाई पर देखकर अहंकार ने अंगड़ाई लेकर गर्दन ऊपर उठानी चाही ही थी, कि सूर्य की किरणों ने आँखों को छूकर सिर नीचा कर दिया।
मैं अपने बौनेपन से शर्मिंदा नहीं हुआ। बल्कि मन ही मन प्रकृति के गुरुत्व को प्रणाम किया।
अब हवाएं मेरे बालों में उंगलियां फिराती हुई मेरे साथ बालकनी में बैठी हैं। सामने एक प्याला चाय है। बादलों का अनवरत बदलता आकार कोई बिना स्क्रिप्ट का नाटक कर रहा है।
मैं ऊँची बालकनी में बैठकर विहंगम दृष्टि से विहंग विहार का सुख भोग रहा हूँ। सीढ़ीनुमा खेतों के बीच छिटकी हुई आबादी दिखाई दे रही है। एक सर्पिली सड़क एक पहाड़ को दूसरे पहाड़ से जोड़ती हुई सांप-सीढ़ी खेल रही है। दृष्टि एक क्षण में खेतों की सीढ़ियां चढ़ती है और दूसरे ही क्षण सड़क के घुमावदार फिसलाव पर फिसल जाती है।
सूरज की चमक अब शीतल होने लगी है। सामने अस्ताचल अपने यायावर का स्वागत करने को तैयार हो रहा है।
सन्नाटे में सुई की आवाज़ का तो नहीं पता लेकिन शांत मन में सांसों की आवाज भी स्पष्ट सुनाई दे रही है।
हवा की पालकी पर सवार अलग-अलग परिंदों के स्वर एक अलौकिक संगीत की सर्जना कर रहे हैं। तोतों और गौरैया के स्वर इस संगीत में अलग पहचाने जाते हैं।
एकाध टिटहरी और एक जंगली मुर्गा लगातार संगीत के बीच कुछ अलग राग अलाप रहे हैं।
और मैं एकांत में अपने अस्तित्व को भोग रहा हूँ!

हुआ एक मुद्दत के बाद आज तन्हा
लगा जैसे कोई बिछड़कर मिला है

✍️ चिराग़ जैन

पुरुषोत्तम: एक मंचन जिसकी पटकथा नहीं लिखी गई

हुई है वही, जो राम रचि राखा
मुझे अक्सर ऐसा अनुभव होता है कि मैं एक ऐसी स्क्रिप्ट जी रहा हूँ, जिसमें मेरे लिए एक शानदार पार्ट लिखा गया है। ऐसा लगता है कि जीवन अलग-अलग किस्सों का एक पोथा है, जो अपनी बेहतरीन बुनावट के कारण एक उपन्यास सरीखा जान पड़ता है।
आइए, इस पोथी के कुछ पृष्ठ पलटता हूँ।
वर्ष 2017 के आसपास यह विचार आया कि ओमप्रकाश आदित्य जी की जयन्ती पर उनके अप्रकाशित साहित्य को प्रकाशित किया जाए। इस शृंखला में उनके द्वारा रचित ‘शूर्पनखा महाकाव्य’ की पाण्डुलिपि पर कार्य प्रारंभ हुआ। यह हास्यरस का एक बेजोड़ महाकाव्य था, लेकिन आकस्मिक निधन के कारण आदित्य जी इसे अधूरा ही छोड़ गये।
मुझे ऐसा आभास था कि इस प्रकार की अधूरी कृतियों को किसी अन्य लेखक द्वारा पूर्ण करके प्रकाशित करने की परम्परा हिन्दी साहित्य में रही है, सो मैंने आदित्य जी द्वारा रचित महाकाव्य को आगे बढ़ाना प्रारम्भ किया। इस प्रयास में मैंने लक्ष्मण के मूर्च्छित होने की घटना से बाद का वृत्तांत लिखकर सम्पन्न किया और उसकी गुणवत्ता की पड़ताल के लिए उसे डॉ विनय विश्वास के पास भेज दिया।
विनय भैया ने वह रचना पढ़कर मुझे फोन किया और कहा- ”तुमने बहुत बढ़िया लिखा है चिराग़, लेकिन इसे आदित्य जी के महाकाव्य में मत छापो!“
सुनकर आश्चर्य हुआ। श्रेष्ठ रचना की प्राप्ति के उपरांत जो उत्साह घटित होता है, वह एकाएक ध्वस्त हो गया।
विनय भैया ने आगे कहा, “पहली बात तो ये कि यह तुम्हारी रचना है, यह आदित्य जी की रचना नहीं है। दूसरे, यदि हमने आदित्य जी के इस महाकाव्य के आगे कुछ भी जोड़ दिया तो इससे उनके पाठकों का यह सोचने का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा कि वे इसे आगे किस दिशा में ले जाते। इसलिए इसे अधूरा ही प्रकाशित किया जाना उचित होगा।”
तर्क पुष्ट था। सो स्वीकार कर लिया गया। ‘शूर्पनखा: एक अधूरा महाकाव्य’ नाम से आदित्य जी की पुस्तक प्रकाशित हो गयी और ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ मेरे सृजनकोष में जुड़ गयी।
यह वह समय था, जब मैं लगभग प्रतिदिन गीत लिख रहा था और मेरे गीतों में पौराणिक सन्दर्भ सहज ही उतर रहे थे। रामकथा, कृष्णकथा, प्रह्लाद, सागर मंथन और न जाने कितने ही सनातन बिम्ब मेरे गीतों में समाहित हो रहे थे। पाठकों की प्रतिक्रिया से मुझे यह ज्ञात हुआ कि मेरे लेखन को पुराण-चिंतन का सौभाग्य मिल रहा है।
एक दिन मैंने फोन पर अपनी अध्यापिका डॉ संध्या गर्ग को ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ सुनाई। रचना सुनकर उन्होंने कहा, ”चिराग़, तुम्हारी भाषा दिनकर की शैली को स्पर्श कर रही है। तुम इस रचना को आगे बढ़ाओ और खण्डकाव्य या महाकाव्य की रचना करो।“
उनकी टिप्पणी से मन को अच्छा तो लगा, लेकिन स्वयं को महाकाव्य लिखने योग्य मैं नहीं समझता था, सो अध्यापिका का यह कथन वात्सल्य से उद्भूत प्रशंसा समझकर स्मृति में दर्ज कर लिया और बात आयी-गयी हो गयी। यूँ भी जीवन की व्यस्तताओं ने मुझे कभी इतना अवकाश नहीं दिया कि मैं फुटकर साहित्य की परिधि से आगे कलम बढ़ा सकूँ।
वर्ष 2020 में कोविड फैला। लॉकडाउन ने व्यस्तताओं का चक्का थाम लिया। भागदौड़ से मुक्ति पाकर मैंने भी आधी-अधूरी रचनाओं की फाइल निकाल ली और अनेक मुखड़ों को उनके अंतरों से सज्ज किया। अनेक अशआर ग़ज़ल की शक्ल हासिल कर गए। इसी क्रम में मैंने ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ के आगे ‘मेघनाद-वध’ भी लिखी। रचना पूर्ण तो हो गयी किन्तु ऐसा लगा कि इसमें केवल कहानी का पद्यानुवाद हुआ है।
मैंने रचनाक्रम को विराम देना उचित समझा। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि साहित्य या तो बात नयी कह पाये या फिर पुरानी बात को नये ढंग से कह पाये। तभी उसका होना सार्थक है। अन्यथा कागज़ काले करने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। महाकाव्य की राह पुनः अवरुद्ध हो गयी और मैं अपने लेखों तथा गीतों के सृजन से बधाइयाँ बटोरता रहा।
वर्ष 2024 के मई महीने में मैंने गृहक्लेश से उत्पन्न पीड़ाओं पर एक गीत रचा। अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप इस गीत का उदाहरण तलाशते हुए मैं माता कैकेयी के कोपभवन तक जा पहुँचा। सृजन के सौभाग्यवश गीत बढ़िया बन पड़ा। मैंने यह गीत अपने प्रिय मित्र निकुंज शर्मा को सुनाया। निकुंज ने गीत सुनकर कहा, ”भैया, आपको रामायण पर आधारित एक महाकाव्य लिखना चाहिये। पुराण के प्रति आपका जो दृष्टिकोण है, वह अभूतपूर्व है। जिस घटना को आप लिखते हो वह अपने जीवन की घटना जान पड़ती है।“
निकुंज की इस टिप्पणी ने एक बार फिर महाकाव्य की याद दिला दी। मैंने गीत में उतरे विचार को पुनः लिखा और ‘दशरथ का अवसान’ शीर्षक से एक और कविता महाकाव्य की शृंखला में जुड़ गयी। निकुंज ने रचना सुनी और उछल पड़ा। यहाँ से जैसे उसने प्रण कर लिया कि वह मुझसे महाकाव्य लिखवाकर ही दम लेगा। उत्साहवश मैंने रचना को फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। प्रतिक्रियाएँ पढ़कर मेरा आत्मविश्वास दोगुना हो गया। हज़ारों लोगों ने रचना की संस्तुति की। दर्जनों फोन आये और सबके प्रशंसा-वाक्यों का एक ही तात्पर्य था कि मुझे महाकाव्य लिखना चाहिये।
मैं भी ‘सर्वकार्येषु त्यक्तवा’ भाव से रामकथा के लेखन में जुट गया। उठते-बैठते, सोते-जागते रामकथा के पात्र मेरे आसपास तैरने लगे। दशरथ, भरत, कैकेयी, मंथरा और यहाँ तक कि भरत को लिवा लाने पहुँचा दूत तक मुझसे संवाद करने लगा। नींदें उड़ गयीं। एक अजीब-सी बेचैनी ने मुझे घेर लिया। कवि-सम्मेलन के मंच पर हास्य की प्रस्तुतियाँ जारी थीं और मन रामकथा के खूंटे से बंधकर रह गया था।
लगभग चार दिन की अनवरत बेचैनी से व्यथित मन ने जब लिखना शुरू किया तो ऐसा लगा कि मैं बेचैनी नहीं जी रहा था, बल्कि भरत जी की अनुभूतियों को भोग रहा था। ननिहाल से लौटे भरत एकाएक कविता में उतर आये। दिल्ली से शायद बंगलूरु की यात्रा के दौरान हवाई जहाज में बैठकर ‘भरत का परिताप’ लिखी। कविता लिखते-लिखते मैंने कई बार स्वेदस्नान किया। अरुण जैमिनी जी मेरे बराबरवाली सीट पर थे। उन्होंने मुझे बेचैन देखकर कई बार मुझे टोका, लेकिन वह तो सृजन की घड़ी थी। कवि प्रसव-वेदना से गुज़र रहा था। कविता पूर्ण होते ही मैंने अरुण जी को सुनाई। वे अभिभूत हो गए। उन्होंने बताया कि मेरी रामायण संबंधित सभी कविताओं में यह अब तक की सर्वश्रेष्ठ रचना है।
4 अगस्त को दिल्ली के आईपैक्स भवन में मेरा और मेरी पत्नी मनीषा शुक्ला का युगल काव्यपाठ था। लम्बा काव्यपाठ करना था, सो मैंने निश्चय किया कि रामकथा में से कोई एक कविता आज अवश्य पढ़ूंगा। काव्यपाठ के दौरान पहली बार मंच पर ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ का पाठ किया। श्रोताओं की प्रतिक्रिया ने मन दोगुना कर दिया। महाकाव्य लिखने के लिए जो पाथेय चाहिए था, वह अब मिल चुका था। राजेश चेतन जी, जो इस कार्यक्रम का मंच-संचालन कर रहे थे, उन्होंने हँसते हुए कहा कि अब चिराग़ भी रामकथा करेगा। उनका यह “भी” मुझे अच्छा नहीं लगा।
मैंने सृजन को सदैव साधना का आश्रम माना है, अतएव आश्रम में स्पर्द्धा मुझे कभी भी नहीं रुची। मुझे लगता है कि रसोईघर में नमक और चीनी दोनों का अपना महत्व है। इन दोनों में तुलना करना समीचीन भी नहीं है और उचित भी नहीं है। प्रतिभा का काम प्रतियोगिता करना नहीं है, इसलिए जब कभी मेरे सृजन के साथ स्पर्द्धा की शब्दावली प्रयुक्त होती है तो मुझे यह कम भाता है। लेकिन चूँकि राजेश जी की भावनाओं में अन्ततः मेरे प्रति सद्भाव ही रहा है, इस हेतु मैंने इसे अनसुना कर दिया।
उधर सृजन अपने उत्कर्ष पर था इधर यात्राओं ने व्यस्तता का बवंडर खड़ा कर रखा था। इस बीच वरिष्ठ कवि श्री मदन साहनी जी ने फोन किया और गुरुग्राम की प्रतिष्ठित संस्था सुरुचि साहित्य परिवार में काव्यपाठ का निमंत्रण दिया। इस कार्यक्रम में मेरे साथ फ़रीदाबाद के लोकप्रिय रचनाकार श्री दिनेश रघुवंशी को भी काव्यपाठ करना था। श्रोता साहित्यिक थे, सो मैंने यहाँ भी अन्य रचनाओं के साथ ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ का पाठ किया। परिणाम पहले की तरह ही जादू जैसा रहा।
अभी तक साहित्यिक श्रोताओं में ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ सफल हो रही थी, लेकिन 16 अक्टूबर को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में वस्त्र मंत्रालय के कार्यक्रम में जब इस रचना का प्रभाव देखा तो यह निश्चित हो गया कि मेरे कवि-सम्मेलनीय जीवन की अगली पारी रामकथा के आसपास ही चलेगी।
इस बीच मैं ‘भरत-मिलाप’ लिख चुका था। रामकथा आधारित कविताओं का प्रवाह अनवरत था। निकुंज शर्मा और मनीषा शुक्ला हर कविता के प्राथमिक श्रोता होते थे। दोनों ही समालोचना की दृष्टि से सटीक और बेलाग हैं, इसलिए इनकी आश्वस्ति मेरे लिए महत्त्वपूर्ण भी रही और सहयोगी भी। इस बीच एक विवाहोत्सव के बाहर इस काव्य की कुछ पंक्तियाँ डॉ. विनय विश्वास को सुनाईं। कविता सुनते हुए वे लगभग ध्यानमग्न हो गए। उनकी आँखें मुंद गईं और उन्होंने आशीर्वाद देने के लिए अपना हाथ मेरे सिर पर रख दिया। लगभग 50-55 सेकेण्ड तक वे इसी मुद्रा में स्थिर हो गये। उनके मुख से बस एक ही शब्द बार-बार निकल रहा था, ‘जियो चिराग़, जियो!’
उस क्षण के ऊर्जानुभव का मैं वर्णन नहीं कर पा रहा हूँ, लेकिन इतना सत्य है कि वह कुछ अलौकिक-सा था। कुछ ऐसा जो पहले मैंने कभी महसूस नहीं किया था। विनय भैया की उस समय क्या मनःस्थिति रही होगी, यह तो मैं नहीं जानता लेकिन अपनी रचना पर उनकी हिचकी की आवाज़ सुनकर मुझे अपने लेखन की सार्थकता का अहसास हुआ।
2 नवम्बर को इन्द्रप्रस्थ विस्तार का दीपावली मिलन समारोह था। इस समारोह में प्रतिवर्ष एक कवि को ‘काव्य-रत्न’ सम्मान से विभूषित किया जाता है। राजेश अग्रवाल जी ने मुझे सूचना दी कि इस वर्ष का यह सम्मान मुझे दिया जा रहा है। मैं कार्यक्रम में पहुँचा और सम्मान ग्रहण करने के बाद जब कावयपाठ के लिए खड़ा हुआ तो सामने से ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ की फ़रमाइश आयी। मैंने भी वज्र-अंग हनुमान को प्रणाम करते हुए कविता पढ़ दी। इसके बाद 16 नवम्बर को ब्रज कला केन्द्र के कार्यक्रम में इस कविता के पाठ ने पुनः श्रोताओं को प्रसन्न किया। ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा’ कंठस्थ भी हो चुकी थी और श्रोताओं के बीच लोकप्रिय भी हो चुकी थी। इसके दो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल थे, सो कवि-सम्मेलनों मेें इसकी फ़रमाइश आने लगी थी।
इसी बीच दिनाँक 7 दिसम्बर को आलोक लखनपाल जी के निवास पर आयोजित होनेवाले वार्षिक ‘शाम-ए-एहसास’ कार्यक्रम में मैंने पहली बार मोबाइल से देखकर ‘भरत का परिताप’ पढ़ी। सामने श्रोताओं में अधिवक्ता, न्यायाधिकारी और अन्य उल्लेखनीय लोग विद्यमान थे। कविता ने श्रोताओं पर जादू किया। मंच पर मेरे बराबर में अरुण जैमिनी जी कविता के बीच आँसू पोंछते देखे गये। कार्यक्रम सम्पन्न करके मैं घर लौट आया। आलोक जी की धर्मपत्नी श्रीमती रचना लखनपाल जी मुझे उस कविता के श्रोताओं की प्रतिक्रियाएँ प्रेषित करती रहीं।
दो दिन बाद मैं और अरुण जी एक कार्यक्रम में महाराष्ट्र में थे। कार्यक्रम के तुरंत बाद आलोक जी का फोन आया- ”चिराग़ जी, आपकी कविता का जादू सिर से उतर ही नहीं रहा है।“ प्रशंसा से उत्पन्न असहजता को दबाते हुए मैंने कहा, “भाईसाहब, आपके श्रोता शानदार थे, इसलिए वह कविता चल गयी, सामान्य मंच पर इतनी भावुक कविता नहीं चलेगी।“ आलोक जी ने मेरी बात को काटते हुए कहा, ”कैसी बात करते हो चिराग़ जी, यह कविता तो हर जगह चलेगी। आपको यह कविता मंच पर पढ़नी चाहिए। मैं गारंटी लेता हूँ, यह कविता हर हाल में चलेगी।“ उनके विश्वास ने मेरे आत्मविश्वास की उंगल थाम ली। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि कल दिल्ली के प्रतिष्ठित ‘श्रीराम कवि-सम्मेलन’ में काव्यपाठ करना है, वहाँ आपके कहने से इस कविता का पाठ करूंगा और प्रतिक्रिया से आपको अवगत कराऊंगा।
इसके बाद रास्ते भर मैं ‘भरत का परिताप’ को कंठस्थ करता रहा। मुझे पहली बार इस कविता को कवि-सम्मेलन के मंच से पढ़ना था। मंच पर डॉ. अशोक चक्रधर का संचालन, डॉ. उदयप्रताप सिंह जी की अध्यक्षता। कार्यक्रम प्रारंभ से ही श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम होता जा रहा था। काव्यपाठ के लिए मुझे पुकारा गया तो मैंने सामान्य कवि-सम्मेलनों की प्रारंभिक बातचीत और बतरस की भी औपचारिकता किए बिना सीधे ‘भरत का परिताप’ पढ़नी प्रारंभ की। आठ-दस पंक्तियाँ ही पढ़ी होंगी कि मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे ऑडिटोरियम की लाइट से ऊर्जा की एक अजस्र धारा मेरे भीतर प्रविष्ट हो रही हो। किसी कविता को पहली बार सार्वजनिक मंच पर पढ़ते हुए, भूल जाने का जो भय होता है, वह भय याद ही नहीं आया। कविता निर्बाध बहती चली जा रही थी, मेरे कंठ में यकायक कोई नाद-सा बजने लगा था। श्रोताओं के चेहरे मेरी भाव-भंगिमा पर त्राटक कर रहे थे। मैंने इस कविता को पढ़ते हुए स्वयं को रोमांचित होते अनूभूत किया। कविता सम्पन्न हुई तो श्रोतादीर्घा का एक-एक व्यक्ति खड़ा हो गया। मंच पर बैठे सभी कविमित्र अभिवादन करने लगा। अशोक जी ने मंच पर आकर इस कविता की प्रशंसा में इतना कुछ कहा कि मैं निहाल हो गया।
दो-तीन दिन में ही इस कविता की वीडियो बेहद वायरल हो गयी। मैं प्रसन्न था। कविता अपना स्थान बना रही थी। आलोक जी को इस प्रतिक्रिया से अवगत कराने की आवश्यकता इसलिए नहीं पड़ी, कि जब कविता पढ़कर मैं श्रीराम सेंटर से बाहर निकला तो आलोक जी सपत्नीक वहाँ उपस्थित थे। कविता का प्रभाव उन्होंने अपनी आँखों से देखा।
इसके बाद तो रामजी की कृपा की अनुभूति करने के लिए मैं रामकथाधारित काव्य का पाठ लगातार करता रहा। मेरे पड़ोस में रहनेवाले वरिष्ठ हास्य कवि श्री वेदप्रकाश वेद ने भी इस कविता की सफलता के लिए मुझे बार-बार आश्वस्त किया। इन सब अपनों के विश्वास को लेकर मैं रामकथा आधारित काव्य रचता रहा और पढ़ता रहा।
22 दिसम्बर को नेपाल स्थित जनकपुर में राजा जनक के महल में ‘रामायण शोध संस्थान’ तथा नेपाल सरकार के संयुक्त आयोजन में मैंने ‘दशरथ का अवसान’ कविता का पाठ किया। जनकपुर के लोग अयोध्यावालों को गरियाते हैं। यह उनकी परंपरा है। भारतीय आयोजक-मंडल इस परंपरा को लेकर किंचित परेशान था। मैंने काव्यपाठ से पूर्व महाराज जनक की न्यायप्रियता का संदर्भ लेते हुए ‘दशरथ का अवसान’ पढ़ी तो जनकपुर की जनता से ‘जयसियाराम’ के नारे सुनाई दिए। मन फिर प्रसन्न हो उठा।
वर्ष 2025 प्रारम्भ हो चुका था। अशोका फाउण्डेशन ने अलवर में कवि-सम्मेलन का आयोजन किया। पिछले वर्ष इसी कार्यक्रम में मैंने हास्य की दमदार पारी खेली थी। ऐसे में इस वर्ष छवि-परिवर्त्तन का निर्णय किंचित कठिन था। श्रोतादीर्घा में तमाम सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिष्ठित पदाधिकारी उपस्थित थे। मैंने राम जी का नाम लिया और ‘भरत का परिताप’ पढ़कर एक बार फिर अपने आत्मविश्वास को पोषित किया।
इस दौरान राजगीर की कवि-सम्मेलन की यात्रा में लोकप्रिय कवयित्री कविता तिवारी के साथ लंबी संगत हुई। रामकविता मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर छाई हुई थी, सो वापसी में पटना हवाईअड्डे पर कविता को कविता सुना दी। मैं दरअस्ल इस कविता का अलग-अलग वय तथा बौद्धिक स्तर के लोगों पर असर देखना चाहता था। कविता और वैभव ने न केवल उन्मुक्त कंठ से इसकी प्रशंसा की अपितु मैंने श्रवण के दौरान कई बार उन दोनों के चेहरे पर सुखद आश्चर्य के भाव तैरते भी देखे।
इसके बाद जोधपुर के हस्तशिल्प मेले से लेकर लालकिले के कवि-सम्मेलन तक मैंने रामकथाधारित कविताओं का ही पाठ किया। लालकिले के कवि-सम्मेलन में यह मेरी चौथी बार पुनरावृत्ति थी। पिछली तीन बार यह संयोग रहा कि श्रोताओं ने मेरे काव्यपाठ के बाद खड़े होकर मेरा अभिनन्दन किया था। इस बार, कोई कीर्तिमान बनाने की महत्वाकांक्षा तो नहीं थी, लेकिन यह आकांक्षा अवश्य थी कि लालकिले का यह दृश्य पुनर्घटित हो सके। राम जी की कृपा रही और ‘भरत का परिताप’ समाप्त होते-होते भीगी पलकों के साथ पूरा सदन खड़ा हो गया।
इस कार्यक्रम की वीडियो भी वायरल हुई। ‘भरत का परिताप’ कविता को कैकयीवाली कविता के नाम से पहचान मिल रही थी। इस बीच मार्च आ गया और हम हर वर्ष की तरह अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर कोलकाता के कवि-सम्मेलनों के लिए निकल लिये। शृंखला का पहला कवि-सम्मेलन कोलकाता प्रेस क्लब में था, जिसका आयोजन युवाशक्ति नामक समाचार समूह ने किया था। यह एक सम्मान समारोह था, जिसमें आयोजक होली मिलन के बहाने अपने सहयोगियों का अभिवादन तथा अभिनंदन करना चाहते थे। सम्मान-समारोह इतना लम्बा चला कि कविता-पाठ की इच्छा समाप्त हो गयी थी। इस आयोजन में मुझे और सहयात्री श्री गोविन्द राठी जी को कवितापाठ करना था। जब हमारे हाथ में मंच आया तो मैंने प्रारंभिक संचालन करते हुए श्री गोविन्द राठी जी को काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से बिखरे हुए माहौल को बांधने मे काफी सफलता हासिल कर ली और मुझे माइक सौंप दिया। मैंने भी होली का माहौल और समय की मर्यादा को देखते हुए हास्य की एक पर्याप्त पारी खेलकर समापन की भूमिका बनानी शुरू की। तभी सामने से एक सज्जन खड़े हो गये और टोकते हुए बोले, “अभी समाप्त न कीजिए चिराग़ जी, हम तो कैकेयी वाली कविता सुनने आये हैं।“ -यह मेरे लिए आश्चर्यजनक था। कोलकाता के होली के कार्यक्रम में इस कविता की फ़रमाइश आयेगी, ऐसा सोचना भी संभव नहीं था।
आश्चर्य के सुख को अनुभूत करते हुए मैंने थोड़े ना-नुकुर के बाद उनकी फ़रमाइश मान ली। कविता पाठ सम्पन्न होते-होते उस आयोजन का स्वरूप बदल गया। भावुकता ने श्रोताओं के चेहरे को और सुंदर बना दिया। तीन श्वेतकेशी सज्जन मंच पर आकर मेरे चरण-स्पर्श के लिए उद्धत हुए तो मैं शर्मिंदा हो गया। इसके बाद, होली की इस शृंखला में ‘भरत का परिताप’ की जहाँ-जहाँ फ़रमाइश आयी, मैंने इसका पाठ किया।
11 मार्च को बोकारो में ओएनजीसी का कार्यक्रम था, जिसमें बहुत दिन बाद मेरे सर्वाधिक प्रिय मित्र रमेश मुस्कान से मुलाकात हुई। कविता के संदर्भ में उनकी प्रतिक्रिया मेरे लिए गुणवत्ता का सबसे निष्पक्ष पैमाना है। मैंने उन्हें भरत-कैकेयी संवाद सुनाया तो वे खिल उठे। अपने चिर-परिचित अंदाज़ में बोले, ”यही चाहिये था। यही सुनाओ।“ मैंने और प्रशंसा सुनने के संशय प्रकट किया, “कवि-सम्मेलन में सुनेंगे लोग इसे?“ वो विश्वस्त होकर बोले, “इसे नहीं सुनेंगे तो फिर क्या सुनेंगे! अच्छी कविता हर जगह सुनी जायेगी। इसे कोई नहीं नकार सकता। यही तुम्हारी पहचान बनेगी।“
मुस्कान जी से यह प्रतिपुष्टि ली और उस रात का कार्यक्रम करके हम लोग कोलकाता लौट आये। अगले ही दिन आईपैक्स वाले सुरेश बिंदल जी का फोन आया। उन्होंने कहा, ”चिराग़ जी, 6 अप्रेल को रामनवमी है। हमारे यहाँ रामनवमी के दिन रामकथा का आयोजन किया जाता है। एक बार इसमें नरेन्द्र कोहली जी भी वक्ता रह चुके हैं। हमारा मन है कि इस बार आप उसमें रामकथावाचक के रूप में कथा करें। आपका भव्य सिंहासन लगवाया जाएगा। और आप एक-डेढ़ घण्टा रामकथा करेंगे।“
मैंने उनके प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया और कहा, ”भाईसाहब, कथा-वथा मेरे वश का काम नहीं है। मैं कवि हूँ और कवि ही रहना चाहता हूँ।“ उन्होंने अपनत्व के अधिकार का प्रयोग करते हुए कहा, “देखो चिराग़ जी, हम तो कार्ड में आपका नाम छाप रहे हैं। आप आ गये तो आपकी और हमारी इज़्ज़त बच जायेगी, अन्यथा हम रामभजन की कैसेट चलाकर कीर्तन करवा के लोगों को विदा कर देंगे।“
अब मेरे पास मना करने का कोई स्कोप नहीं बचा था। मैंने सोचा कुछ शर्तें रखकर देखता हूँ। शायद नखरे देखकर बिंदल जी अपना विचार बदल लें। मैंने कहा, ”ठीक है भाईसाहब, मैं आपका प्रस्ताव मानने को तैयार हूँ। लेकिन मेरी कुछ शर्तें होंगी।“
बिंदल जी ने एक क्षण भी व्यर्थ किये बिना कहा, “जैसे कहोगे, वैसे होगा।“
मैंने कहा, ”एक तो सिंहासन नहीं लगेगा।“
बिंदल जी ने कहा, “स्वीकार है।“
मैंने आगे कहा, “मेरे साथ कम से कम तीन संगीतज्ञ रहेंगे, कार्यक्रम में ‘कथा’ शब्द का प्रयोग नहीं होगा और कार्यक्रम के क्रिएटिव्स मेरे ऑफिस में डिज़ाइन होंगे।“
बिंदल जी बोले, “कार्यक्रम का शीर्षक वो होगा, जो आप तय करेंगे और इन सब तैयारियों के लिए आपका जो ख़र्च होगा, वो हम वहन करेंगे।“
मेरा कोई दांव नहीं चल रहा था, मैंने और शर्त रखी, “कार्यक्रम प्रारंभ होने के बाद कोई ब्रेक नहीं होगा, किसी का स्वागत-सम्मान-भाषण कुछ नहीं होगा।“
यद्यपि वैश्य समुदाय के कार्यक्रमों में ऐसा करना कठिन है, किंतु बिंदल जी ने मेरी यह शर्त भी मान ली। अब बारी थी आख़िरी शर्त की। इस प्रहार के बाद तो बिंदल जी मना कर ही देंगे, ऐसा सोचकर मैंने आख़िरी शर्त रखी- “मैं इस प्रस्तुति के लिए कोई पैसा नहीं लूंगा।“
अब बिंदल जी उखड़ गये। बोले, ”यह आपका क्षेत्र नहीं है भाईसाहब, यह हम तय करेंगे।“ उनकी वाणी में इतना अधिकार था कि मैं कुछ बोल न सका।
मैं समझ गया था कि यह सब राम जी की इच्छानुसार हो रहा है। सो, समर्पण कर दिया। अपने अब तक के परिचय में अपनी-अपनी फील्ड के कुशल मित्रों से सम्पर्क साधा। बिंदल जी ने मेरे कंधे पर दायित्व रख दिया था। सो अनवरत इस कार्यक्रम की रूपरेखा के विषय में विचार करने लगा। एक माह से भी कम का समय था। एकदम नये तरह की प्रस्तुति देनी थी।
सबसे पहले अपनी अर्द्धांगिनी मनीषा शुक्ला से बातचीत की। मनीषा ने पहला सुझाव यह दिया कि इसमें जितना भी भाग प्रस्तुत करो, वह तुम्हें कंठस्थ होना चाहिए। यह सबसे बड़ी चुनौती थी। याद रखने की क्षमता क्षीण होती जा रही थी। कवि-सम्मेलनों के अभ्यास से बुद्धि तीक्ष्ण हो रही थी, प्रत्युत्पन्नमति विकसित हो रही थी, लेकिन स्मरण-शक्ति का बंटाधार होने लगा था। ‘लपेटे में नेताजी’ कार्यक्रम में मोबाइल देखकर काव्यपाठ करने की ऐसी लत लगी कि मस्तिष्क ने स्मरण रखने वाली ग्रंथियों को शिथिल कर दिया था।
उधर कार्यक्रम की कोई स्पष्ट रूपरेखा सम्मुख नहीं थी और इधर इतनी लम्बी कविता याद करने का काम और बढ़ गया था। मैं दिन भर कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने के लिए फोन पर बात करता रहता था और रात भर कविता याद करता था।
एक दिन कार्यक्रम के नाम को लेकर डॉ. सुष्मीत श्रीवास्तव से चर्चा हुई। उस चर्चा में नाम सूझा ‘राम-अभिराम’। शीर्षक अच्छा था, लेकिन मेरी मंशा थी कि इस कार्यक्रम में शीर्षक में राम संज्ञा के रूप में नहीं बल्कि चरित्र के रूप में सम्मिलित हों। दो-तीन दिन बाद प्रिय प्रबुद्ध सौरभ से चर्चा होते समय यकायक मेरे मुख से निकला, इसका नाम ‘पुरुषोत्तम’ होना चाहिए। सुनकर प्रबुद्ध की वाणी में जो हर्ष घुला, उससे स्पष्ट हो गया कि इस कवायद को इसका नाम मिल गया है।
प्रवीण अग्रहरि की डिज़ाइनिंग मुझे हमेशा पसन्द आती है। उन्हें जब इस कार्यक्रम के विषय में पता चला तो उनका अनुजवत प्रेम उमड़ पड़ा। उन्होंने बहुत मन से इस कार्यक्रम के क्रिएटिव्स तैयार किये। अब तक मेरे साथ के सभी लोग जान चुके थे कि इस समय मेरा पूरा फोकस ‘पुरुषोत्तम’ की तैयारी पर है।
मेरे सबसे निकट रहनेवाले अरुण जैमिनी जी को जब इस पूरी योजना का पता चला तो उन्होंने अपनी स्वाभाविक स्वीकृति दी और लगभग चुनौती के स्वर में अपने हरियाणवी अंदाज़ में कहा, ‘कर के आ, तब बात करेंगे।’ उधर श्रद्धेय सुरेन्द्र शर्मा जी का भी मुझ पर पर्याप्त आशीर्वाद है, लेकिन इस बार उनका आशीर्वाद लेने गया तो ‘घर का जोगी’ वाली कहावत चरितार्थ हुई और उन्होंने कहा कि ‘कविता तो तुझसे बेहतर किसी के पास नहीं है, लेकिन खाली कविता से काम नहीं चलेगा। बीच की जो कमेंट्री इसमें चाहिए वो कहाँ से लाओगे?’
सुनकर मन परेशान हुआ लेकिन मुझे यह समझ आ गया कि अनुभवों की पोटली ने मुझे चुनौती के रूप में सफलता का मार्ग दिखा दिया है। मैंने तय कर लिया कि कविता सुनाते समय ठहरकर मैं इसके साथ जुड़ी अनुभूतियों को गद्य में प्रस्तुत करूंगा।
बस, फिर क्या था। निराकार साकार हो गया। धुंधली रूपरेखा स्पष्ट रेखाचित्र बन गई। संगीतज्ञों के साथ रिहर्सल के नाम पर मैंने केवल संगीत की लहरियों के साथ अपनी आवाज़ का तारतम्य बैठाने का प्रयास किया। कुल तीन दिन में दो-दो घण्टे की रिहर्सल हुई, जिसमें 40-45 मिनिट केवल बातचीत और खानपान में निकल गए।
यह मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था। संगीत से मेरा इतना ही संबंध है कि मुझे बेसुरा सुनना पसन्द नहीं है और मुझे यह भ्रम है कि मैं बेसुरा गाता नहीं हूँ। इसलिए मैंने अपने किसी संगीतकार को निर्दिष्ट करने का दुस्साहस नहीं किया। बस एक ही बात कही कि संगीत मेरी आवाज़ का सहयोगी बनना चाहिए, अवरोधक नहीं।
बहरहाल, इसी तरह थोड़े संकोच और थोड़े उत्साह के साथ 6 अप्रेल का दिन आ गया। जब अलमारी में से कपड़े निकालने लगा तो याद आया कि वरिष्ठ कवयित्री डॉ. मधुमोहिनी उपाध्याय ने मुझे एक सदरी भेंट की थी। मधु जी ध्यान और अध्यात्म के समर्पण की अद्वितीय मिसाल हैं। मुझे लगा कि उनका उपहार मेरे लिए आशीष का काम करेगा, सो बिना अधिक विचार किए मैंने पीले कुर्ते पर पीली सदरी पहनी और दिल्ली के आईपैक्स भवन जा पहुँचा। 23 वर्ष की कवि-सम्मेलनीय यात्रा में पहली बार किसी कार्यक्रम को सुनने के लिए मेरा लगभग पूरा परिवार उपस्थित था। मेरे माता-पिता, मनीषा, बहन-बहनोई और भानजी सामने श्रोतादीर्घा में बैठे थे। मेरे न जाने कितने ही मित्र सभागार में उपस्थित थे। कवि-सम्मेलन जगत् के मेरे अग्रज जैनेन्द्र कर्दम और डॉ. प्रवीण शुक्ल ने भी सामने बैठकर पूरा कार्यक्रम सुनने का निश्चय किया।
मैं आईपैक्स भवन के ऑफिस में बैठा था। मंच पर कार्यक्रम की औपचारिकताएँ प्रारंभ हो चुकी थीं। आईपैक्स भवन खचाखच भरा था। जितने लोग बैठे थे उतने ही लोग कुर्सी खाली होने की संभावना टटोलते हुए खड़े थे। मौसम में थोड़ी उमस थी, सो बाहर खड़े लोगों को गर्मी बर्दाश्त करनी पड़ रही थी। मैं इस सब व्यवस्था को देख ही रहा था कि कार्यकारिणी के पाँच-छह लोग मुझे लिवा लाने आ गए। मैं उनके साथ सभागार में प्रविष्ट हुआ। मंच पर प्रबुद्ध सौरभ कार्यक्रम की पूर्व पीठिका बना रहे थे। पूरे सभागार ने तालियाँ बजाते हुए खड़े होकर मेरा अभिवादन किया।
इस स्वागत से मैं किंचित और सावधान हो गया। मैंने राम जी का नाम लिया और प्रस्तुति के सारे तनाव को छोड़कर मंच की ओर बढ़ गया। मंच पर मेरा स्वागत-सम्मान किया गया और माइक मुे सौंप दिया गया।
मैंने सहज होकर ‘पुरुषोत्तम’ की प्रस्तुति प्रारंभ की। मैं ठहरकर अपनी कविता का पाठ कर रहा था और उसके साथ वह अलिखित भी साझा कर रहा था जो उस रचना की सर्जना के दौरान मेरे मन में चल रहा था। जीवन के सबसे सामान्य उदाहरण कैसे इस वाचन से जुड़ गए, मुझे नहीं पता। कविता पढ़ते-पढ़ते मुझे अभिनय करने की आवश्यकता इसलिए नहीं पढ़ी कि जब मैं गहन अनुभूति में उतरकर काव्यपाठ कर रहा था तो भाव-भंगिमा और देह स्वतः उसके अनुरूप संचालित हो रही थी। स्वर का उतार-चढ़ाव 23 वर्ष के कवि-सम्मेलनीय अनुभव का परिणाम था। वाक्य-विन्यास और भाषा का परिष्करण मेरी प्रवृत्ति में राम जी ने बहुत पहले बो दिया था। आज वही बीज फलित हो रहा था। चूँकि मैंने इस कविता को लिखते समय रामकहानी के एक-एक पात्र से घण्टों संवाद किया था, इसलिए इसके वाचन के दौरान भी वे सभी पात्र मेरे आसपास साक्षात् उपस्थित थे। उनकी मनोदशा मुझे सहज ही झंकृत कर रही थी। उस स्फुरण से मेरे भीतर जो संवेदना छलछला रही थी, वह दर्शकों के चेहरे पर भी यथावत दिखाई देती थी।
एक जादू सा छा गया था। सैंकड़ों पुतलियाँ मेरी देह पर त्राटक कर रही थीं। सहस्रों प्राण मेरी चेतना को स्पर्श कर स्पंदित कर रहे थे। मेरे स्नायु में रह-रहकर स्फुरण हो रहा था। मेरी अलकों का रंग पनीला हो उठा था। मेरे चेहरे पर भाव इतनी द्रुत गति से परिवर्तित हो रहे थे, मानो कोई रिमोट से टीवी का चैनल बदल रहा हो। यह सब कैसे हो रहा था, मैं नहीं जानता। लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि उस दिन यह सब हो रहा था, मैं कर नहीं रहा था।
कार्यक्रम सफल ही नहीं, सफलतम रहा। कार्यक्रम के उपरांत लोग चरण-स्पर्श से लेकर सेल्फी खिंचाने तक के लिए मुझे घेरे रहे। चरण-स्पर्श मुझे असहज करता है, सो मैंने किसी को यह न करने दिया। लेकिन रामजी की कृपा का रस भोगने में मुझे आनंद अवश्य आ रहा था।
100 मिनिट तक अनवरत प्रस्तुति से लोग चकित थे। मैंने बाद में लोगों की प्रतिक्रिया के वीडियो देखे तो उनमें कुछ बातें प्रमुख थीं- ‘ऐसी भाषा पहली बार सुनी’; ‘हम अपनी पलक तक नहीं झपक पाए’; ‘कभी हँसा दिया, कभी रुला दिया’; ‘राम जी के विषय में ऐसी-ऐसी बातें पता चलीं, जो हमने इससे पहले कभी सोची भी नहीं थीं।’
पराग चतुर्वेदी जी, जिन्हें मैं हिन्दी का निस्पृह समालोचक मानता हूँ। उन्होंने कार्यक्रम के बाद मुझसे कहा, ‘आज तो आपके चरण-स्पर्श करने का मन है।’ ये सब प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए अनापेक्षित थीं।
अगले दिन सुरेन्द्र शर्मा जी ने बिंदल जी को फोन करके कार्यक्रम की रिपोर्ट ली। बिंदल जी ने न जाने उन्हें क्या कहा, लेकिन उनका फोन रखते ही सुरेन्द्र जी ने मुझे फोन करके लगभग चहकते हुए कहा, ‘बधाई हो! तूने कमाल कर दिया।’ सुरेन्द्र जी से यह वाक्य सुनना मेरे लिए किसी प्रमाण-पत्र से कम नहीं था।
‘पुरुषोत्तम’ इतना चर्चित हुआ कि अगले ही दिन अरुण जैमिनी जी ने मेरे घर रुककर रात में पूरी फुटेज देखी। वे इस कविता की सृजन प्रक्रिया के सबसे निकटतम साक्षी हैं, इसलिए इसकी प्रस्तुति देखते हुए उनके चेहरे पर जो भाव उतर रहे थे, वे मेेरे लिए उत्साहवर्द्धक थे।
डॉ. अशोक चक्रधर ने 5 जुलाई को अग्रिम पंक्ति में बैठकर सपत्नीक इस प्रस्तुति को देखा। वे इससे इतने भाव-विभोर हुए कि उन्होंने मंच से मेरी लेखनी को प्रणाम किया। यह मेरे लिए सुखद भी था और संकोचजनक भी। अरुण जैमिनी जी, डॉ. विनय विश्वास, चेतन आनंद और न जाने कितने ही अपनों ने इस कृति को सराहकर मेरी लेखनी को पुष्ट किया है। आलोक गौड़ जी ने तो इसे न केवल सराहा बल्कि अपने परिचितों में इसकी संस्तुति भी की।
अब तक ‘पुरुषोत्तम’ की अनेक प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं। हर बार लोगों की प्रतिक्रिया रोमांचवृद्धि करती है। उधर ‘पुरुषोत्तम’ महाकाव्य भी अनवरत पूर्णता की ओर अग्रसर है। शूर्पणखा, हनुमान- जाम्बवन्त संवाद, लंका प्रवेश, त्रिजटा, सीता-हनुमान संवाद, अशोक वाटिका ध्वंस, लक्ष्मण मूर्च्छा, मेघनाद वध, मेघनाद की अंत्येष्टि और रावण-मंदोदरी संवाद जैसे अनेक प्रसंग लिखे जा चुके हैं।
वर्ष 2021 में जब मेरी ओपन हार्ट सर्जरी हुई थी तब मैं समझ नहीं पा रहा था कि जीवन की यह दूसरी पारी मेरे भाग्य में क्यों लिखी गई होगी। लेकिन पुरुषोत्तम के सृजन में जो रसवृष्टि होती है, उसे भोगकर मैं समझ पाया कि ईश्वर ने मुझे संभवतः इसी सृजन के लिए जीवित रखा है।
यह रचना अपना भाग्य स्वयं लेकर अवतरित हो रही है। मैं बस इतना कर रहा हूँ कि जब कोई पात्र अपना सीना चीरकर मेरे कवि के सामने उपस्थित होता है तो मैं तमाम लौकिक कार्यों को द्वितीयक करते हुए उस पात्र को वरीयता देता हूँ। अपनी अनुभूति क्षमता का समग्र उस पात्र पर केन्द्रित कर देता हूँ। और उसके बाद उस अनुभूति को अभिव्यक्त करने में अपनी अभिव्यक्ति क्षमता को पूरी तरह निचोड़ डालता हूँ।
शेष राम जी की इच्छा!

✍️ चिराग़ जैन

न्यूज़ीलैंड यात्रा : गंगाधर ही शक्तिमान था

प्रशांत महासागर के पश्चिमी छोर पर बसा ख़ूबसूरत देश है न्यूज़ीलैंड। मुस्कराते हुए लोगों का देश। चेहरे पर ज़िन्दगी जैसी ख़ूबसूरत ताज़गी लिए यहाँ के लोग तनाव और उन्माद से अछूते दिखाई देते हैं।
इन दिनों यहाँ पतझड़ का मौसम है। ‘मुहब्बतें’ फिल्म वाले मेपल के पत्ते सड़कों का शृंगार करने में व्यस्त हैं। पेड़ों से पत्ते झड़ चुके हैं, लेकिन पेड़ों के अस्तित्व में कहीं कोई शिकायत महसूस नहीं होती, उल्टे वे मौसम की इस छटा को संवारते ही दिखाई देते हैं।
आसमान के खुले मैदान में सूरज और बादलों की आँख-मिचौनी लगातार चलती रहती है। सूर्यदेव बहुत सवेरे ड्यूटी पर आ जाते हैं और उतनी ही जल्दी घर भाग जाते हैं। रात में शहर का तापमान 3° सेल्सियस तक गोता लगा लेता है और दिन में कभी 17°-18° से आगे पांव नहीं बढ़ाता। हवाएं मौसम की ठंडक को बढ़ाते हुए इतराती फिरती हैं। ऐसे में धूप की गुनगुनी छुअन देह के रोम-रोम को दुलारती है, तो मन भी खिल उठता है।
ऑकलैंड शहर के बीचोंबीच सुदीमा होटल में हमारा प्रवास है। छठे माले के टू साइड ओपन फॅमिली स्वीट के दोनों ओर बड़ी-बड़ी खिड़कियों से शहर दिखाई देता है। ठीक सामने स्काई टावर है। 328 मीटर ऊँची यह शानदार इमारत ऑकलैंड की पहचान है।
स्थानीय समयानुसार 18 जून की शुरुआत होते-होते हम लोग इमिग्रेशन की औपचारिकता संपन्न करके, लगेज बेल्ट से अपना सामान बरामद करते हुए हवाई अड्डे से बाहर निकल आए थे।
बाहर दस-बारह लोग हमारी प्रतीक्षा में खड़े थे। स्वागत-सत्कार के दौरान मैंने सभी की आँखों में अपने देश से आए अतिथियों के प्रति वही अपनत्व देखा, जो मायके के गांव से आए किसी व्यक्ति के प्रति सासरे में बसी बिटिया की आँखों में होता है।
प्रेम उपाध्याय, जो हमारे मुख्य आयोजक हैं, उनके कंधे पर आयोजन का लगभग सारा ही दायित्व था। हमें लाने-लिवाने से लेकर कार्यक्रम की टिकटें बुक करने तक का ‘संपूर्ण दायित्व’ प्रेम ने खुद के हाथों में सीमित रखा। उनका वश चलता तो वे शायद हम तीनों कवियों को किसी डब्बे में पैक करके कहीं छुपा देते ताकि कोई हमें देख भी न सके।
प्रेम उपाध्याय काफी मददगार स्वभाव के व्यक्ति हैं। उन्होंने मुझे बताया कि जिन खुशबू जी को उन्होंने वीजा की प्रक्रिया के लिए नियुक्त किया था, वे उनके मित्र की पत्नी हैं और उन्होंने वीज़ा लगवाने का नया काम शुरू किया है, इसलिए केवल उनको प्रोत्साहित करने के लिए प्रेम ने उन्हें यह काम सौंपा। ऐसे बेहतर मनुष्य मुश्किल से मिलते हैं, जो स्वयं किसी काम में पारंगत होते हुए भी अपने दोस्त की पत्नी को मोटिवेशन देने के लिए काम भी दे और फीस भी।
इनकी सहृदयता का एक उदाहरण यह भी था कि वीज़ा की प्रक्रिया के दौरान खुशबू जी ने हमसे कुछ दस्तावेज़ मांगे तो प्रेम ने मुझे भारी-भरकम अंग्रेजी का एक मेसेज लिखकर भेजा और मुझे कहा कि मैं यह खुशबू को इसलिए भेज दूँ ताकि उन्हें प्रोफेशनल व्यवहार सिखाया जा सके। प्रेम उपाध्याय के इस परोपकारी स्वभाव से मैं भावुक हो उठा।
न्यूज़ीलैंड में प्रेम ने दो शो बुक किए थे। एक ऑकलैंड में और दूसरा क्राइस्ट चर्च में। दुर्भाग्य यह रहा कि उन्हीं दिनों न्यूज़ीलैंड में कुछ और सेलिब्रिटी भी कार्यक्रम कर रहे थे। वहां रहनेवाले भारतीय सीमित थे और कार्यक्रम अधिक हो गए तो क्राइस्ट चर्च के आयोजक ने कार्यक्रम रद्द कर दिया। प्रेम ने हमें बताया कि उस कार्यक्रम के लिए लगभग साढ़े तीन हज़ार डॉलर की टिकटें प्रेम ने अपनी जेब से करायी और यह सारा नुकसान उन्होंने अपनी जेब से भुगता। उनकी इस विनम्रता के कारण कवियों ने भी उस रद्द हुए कार्यक्रम का कोई मानदेय प्रेम उपाध्याय से नहीं लिया।
चूँकि सुदीमा होटल एक भारतीय परिवार द्वारा संचालित था, इसलिए हमें आश्वस्ति थी कि इस होटल में हमें भारतीय भोजन आराम से मिल जाएगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। प्रेम उन दिनों व्यस्तता के चरम पर थे। वे स्वयं ही एक-एक व्यक्ति को फोन करके टिकट बेच रहे थे, स्वयं ही हमारे ड्राईवर बनकर हमें खाना खिलाने ले जा रहे थे, स्वयं ही कार्यक्रम की व्यवस्था में संलग्न थे और स्वयं ही अपने sponsor लोगों से संपर्क में थे।
एक दिन वे हमें हरपाल जी के घर भोजन पर ले गए। हरपाल जी एक पंजाबी व्यक्ति हैं और उनकी पत्नी किरण जी फीजी से हैं। किरण जी की कलात्मक अभिरुचि ने उनके घर को एक छोटा-मोटा संग्रहालय बना दिया है। रसोई से लेकर आँगन तक, सब कलापूर्ण। किरण जी त्वचा संबंधी समस्याओं का एक क्लिनिक चलाती हैं। उनके क्लिनिक का प्रत्येक कोना इतना कलात्मक है कि आदमी अपनी बीमारी भूल जाए।
किरण जी ने बहुत रुचि से हमें भोजन कराया। स्वाद के साथ अपनत्व भी तैर रहा था उनकी रोटियों पर। मैंने उनकी रसोई की खूब photography की। उनके पति भी सरस तथा मददगार वृत्ति के व्यक्ति हैं। कलाकारों के प्रति उनके व्यवहार में जो आदरभाव दिखा, वह मेरे लिए अविस्मरणीय था।
रात का भोजन हरपाल जी के सौजन्य से संपन्न हुआ और अगली सुबह के नाश्ते के लिए हम होटल के रेस्तरां में जूझते रहे। हम समझ चुके थे कि इस यात्रा में भोजन की चुनौती आनेवाली है, इसलिए सुरेन्द्र जी ने प्रेम उपाध्याय के सामने एक प्रस्ताव रखा कि हम प्रेम के घर से स्वयं भोजन बनाकर ले आया करें, लेकिन प्रेम जी तो स्वयं हमारे साथ होटल में पड़े थे। उन्होंने हमें बताया कि वे यहाँ अकेले रहते हैं और जिस कमरे में वे रहते हैं, उसमें और भी कुछ बैचलर लड़के रहते हैं। इसलिए उस स्थान पर कवियों को ले जाना उन्हें असहज कर देगा। हमने उनकी असमर्थता का सम्मान किया और विपरीत परिस्थितियों में इस यात्रा को आनंद सहित संपन्न करने के लिए कमर कस ली।
अगली दोपहर हमें ‘शिवानी’ नामक एक रेस्तरां में ले जाया गया। इसकी मालकिन शिवानी जी ने बड़े मन से हमें भोजन कराया। भोजन में भारतीय महक थी और यह स्थान हमारे होटल से अधिक दूर भी नहीं था इसलिए सुरेन्द्र जी ने चाहा कि इसी स्थान से हमारा भोजन का इंतजाम करा दिया जाए। लेकिन न जाने क्यों, प्रेम उपाध्याय ने इस प्रस्ताव को लगभग अनसुना कर दिया।
शिवानी जी के रेस्तरां से वापसी होटल आते समय हमें रास्ते में माउंट ईडन नामक एक स्थान पर छोड़कर हमारा आयोजक फोन पर टिकटें बेचने में जुट गया। सुरेन्द्र जी गाड़ी में बैठे रहे और मैं धीरे-धीरे चलकर पर्वत की चोटी तक पहुँचकर ऑकलैंड शहर का विहंगम दृश्य देखता रहा।
हम अनवरत यह सोचते रहे कि न्यूजीलैंड में रहनेवाले भारतीय काफी नीरस प्रवृत्ति के लोग हैं, इसीलिए इतने लंबे प्रवास में न तो कोई हमसे मिलने आया और न ही किसी ने हमें आमंत्रित करने की कोशिश की। प्रवासी भारतीयों के इस व्यवहार से प्रेम भी काफी खिन्न दिखे।
लेकिन 21 तारीख़ को जब कार्यक्रम आयोजित होना था तब सबका व्यवहार इतना मधुर था कि हमें पिछले 4 दिन की बोरियत और चुनौती का कारण समझना कठिन हो गया। खिलखिलाते हुए लोग, हमसे मिलने को आतुर लोग, हमारे साथ फोटो खिंचवाने की होड़, हमारा सान्निध्य पाने की ललक… यह सब देखकर हमें आश्चर्य भी हुआ, हर्ष भी और कष्ट भी।
ऑकलैंड के वातावरण में परागकण बहुतायत में हैं, जिन्हें पौलन कहा जाता है। इनके कारण साइनस, अस्थमा और एलर्जी के रोगियों को दिक्कत हो जाती है। कार्यक्रम के दिन मुझे इस समस्या ने घेर लिया था। साइनस चरम पर था। मैंने प्रेम से कहा कि कोई नेज़ल स्प्रे मंगवा दे ताकि शाम का कार्यक्रम ठीक हो जाए। प्रेम ने मुझे Peracitamol tablet मंगवा कर दी। शाम को कार्यक्रम से पहले सुमित नामक सज्जन हमें लेने होटल आए। उन्होंने मेरी तबीयत देखी तो उन्होंने ही वातावरण के इस ‘हे-फीवर’ के विषय में बताया। वे आश्चर्य कर रहे थे कि प्रेम ने उन्हें यह बता दिया होता तो इसका उचित उपचार (नेज़ल स्प्रे और आई drop) मैं ला देता।
सिरदर्द, जुकाम और बुखार से पीड़ित मैं आयोजन स्थल पर पहुँच गया। ग्रीन रूम में मालव जी ने मेरी स्थिति को देखकर मेरे लिए ortivin मंगवाई। उसकी बदौलत मैं कार्यक्रम ठीक से संपन्न कर सका।
उधर कार्यक्रम प्रारंभ होने से पूर्व ही प्रेम ने शो फ्लो क्लियर कर दिया था। हमारी प्रस्तुति 2 घंटे की थी, फिर एक मध्यांतर और उसके बाद बकौल प्रेम उपाध्याय, कुछ सरप्राइज था, जिसके विषय में शो की एंकर को भी नहीं पता था।
कार्यक्रम धमाल हुआ। ठहाकों की बरसात हुई। श्रोताओं ने हँसी का जी भरकर लुत्फ़ उठाया। भारत और भारतीयता से माहौल उत्साहित हो गया। स्टैंडिंग ओवेशन से लोगों ने कवियों को सैल्यूट किया। इसके बाद मध्यांतर की घोषणा हुई। हालाँकि शो जहाँ पहुंच चुका था, इसके बाद मध्यांतर का कोई औचित्य नहीं था। लेकिन आयोजक ने शायद मध्यांतर के लिए किसी रेस्तरां वाले से कुछ sponsorship ले रखी थी। इसलिए वह कार्यक्रम की सफलता की कीमत पर भी मध्यांतर जरूर करना चाहता था।
वही हुआ जिसका डर था। मध्यांतर के बाद हॉल में केवल 20 प्रतिशत लोग लौटे। इनमें से अधिकतर वे sponsor थे, जिनका सम्मान किया जाना था।
कला, जिस कार्यक्रम को चरम पर ले आई थी, बाजार ने उसे काफी नीचे लाकर समाप्त किया। यद्यपि जो लोग कविता और हास्य सुनने आए थे, वे संतुष्ट भी थे और प्रसन्न भी।
अगला पूरा दिन आयोजक के व्यवहार तथा कृतघ्नता के कारण बोरियत और खिन्नता से भरा रहा। रात का भोजन नमस्ते भारत के संचालक दंपति ने इतना स्वादिष्ट भेजा कि दिन भर का कष्ट बौना रह गया। अगली सुबह हमारा किसी के घर नाश्ते का कार्यक्रम था और फिर वहीं से हमें हवाई अड्डे चले जाना था। सुबह-सुबह ज्ञात हुआ कि नाश्ते का कार्यक्रम कैंसिल हो गया है। हमने रात के बचे हुए भोजन से काम चलाया और अंततः वीज़ा लगवाने वाली खुशबू जी के घर से रास्ते का भोजन लेकर हम रवाना हो गए। जिस देश में हमें रिसीव करने आधी रात को दर्जन भर लोग मौजूद थे, उस देश में भरी दोपहर में एक शानदार प्रस्तुति के बाद भी कोई हमें सी-ऑफ करने नहीं आया।
अंतिम दिन तक हम समझ चुके थे कि हमारे साथ पिछले 6 दिन से क्या हो रहा था। न्यूज़ीलैंड के लोगों में ‘नेहा कक्कड़’ नामक एक कलाकार के प्रति काफ़ी रोष था। हमें बताया गया कि 3 वर्ष पूर्व इसी आयोजक ने नेहा कक्कड़ को किसी शो के लिए बुलाया था और नेहा ने इस आयोजक को काफी परेशान किया था।
हवाई जहाज की खिड़की से न्यूज़ीलैंड की धरती पीछे छूटती दिख रही है। बादलों में नेहा कक्कड़ के प्रति करुणा और इस आयोजक के मददगारों के प्रति दया की तस्वीर उभर रही है।
हँसते और चहचहाते हुए देश में एक मुखौटे की उपस्थिति कैसे पंचवटी के रमणीक माहौल को शोक और निराशा के अंधकूप में धकेल सकती है, इसका अनुभव लेकर भारत की दिशा में उड़ चला हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

विनीत चौहान

सामाजिक व्यवहार में मैच्योरिटी की परिभाषा तलाशता हूँ तो पाता हूँ कि सही और ग़लत का निर्धारण करने से पहले अपने व्यक्तिगत लाभ और हानि का आकलन करने की क्षमता को मैच्योरिटी कहते हैं। यद्यपि यह परिभाषा मैंने स्वयं गढ़ी है, तथापि मैच्योर कहे जानेवाले अधिकतम लोगों को मैंने इस परिभाषा पर खरा उतरते देखा है। मेरा निजी मत यह है कि इस परिभाषा की परवाह न करते हुए सहज आचरण करनेवाले लोग अधिक निश्छल, अधिक प्यारे और अधिक जेनुइन होते हैं। सामान्य भाषा में इनके लिए एक विशेष शब्द प्रयुक्त किया जाता है जो ‘मूर्ख’ शब्द का निकटतम पर्यायवाची है।
मुझे ऐसे तथाकथित मूर्ख अधिक नैतिक और अधिक निस्पृह लगते हैं। मैं अपने ख़ुद के आचरण में इस ‘मूर्खता’ को कई बार आसानी से खोज लेता हूँ। यह सत्य है कि एमैच्योरिटी सामाजिक दृष्टि से असफलता की ओर ले जाती दिखाई देती है लेकिन मुझे ऐसे लोग तथाकथित ‘मैच्योर’ लोगों से अधिक बहादुर लगते हैं।
ऐसे ही एक एमैच्योर व्यक्ति हैं श्री विनीत चौहान। किसी भी घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया के साथ तैयार। लाभ-हानि का गणित लगाने का अवसर ख़ुद को ही नहीं देते। लड़ते हैं तो पूरी ऊर्जा से, क्योंकि जिस बात के लिए लड़ रहे होते हैं उसको अपने अन्तःकरण से ‘सच’ मान चुके होते हैं। जिसे अपना कह देते हैं, वह यदि उनसे छल भी कर रहा हो तो उसका छल बहुत देर में देख पाते हैं, क्योंकि अपने पूरे अन्तःकरण से उसे अपना मान चुके होते हैं। भावुक इतने कि संवेदना की किसी पंक्ति के पूरा होने से पहले ही आँखों में आँसू डबडबाने लगते हैं। मैंने अनेक अवसरों पर किसी पुरानी याद का संस्मरण सुनाते-सुनाते उनका गला रुंधते देखा है।
आज इस पारदर्शी व्यक्तित्व का जन्मदिन है। हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् में मैच्योर लोगों की भीड़ के बीच जिन चंद किरदारों की संगत से मन खिल उठता है, उनमें विनीत जी एक हैं। विनीत जी अलवर से हैं और अलवर मेरी ननिहाल है, इस रिश्ते से मैं उन्हें ‘मामा’ कहकर संबोधित करता हूँ। मामा को ज्यों-ज्यों करीब से देखा, त्यों-त्यों समझ आया कि ‘हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी’ का अर्थ सकारात्मक भी हो सकता है। कितने ही किस्से हैं, जहाँ मामा का व्यक्तित्व अपने ही किसी पुराने व्यवहार के ठीक विपरीत दिखाई देने लगा।
किसी की पीड़ा पर बिलख पड़नेवाला शख़्स जब दुर्घटना में क्षत-विक्षत कविमित्रों को गाड़ी से बाहर निकालने के लिए गाड़ी के शीशे तोड़ता है तो उसके वज्रहृदयी होने के प्रमाण मिलते हैं। किसी की अनैतिकता पर क्रुद्ध हो जानेवाले विनीत चौहान जब किसी की विवशता का विश्लेषण करते हैं तो ऐसा लगता है ज्यों कोई करुण रस का कवि संवेदना की परतों को स्पर्श करना चाह रहा हो। जिनका मन भर आदर करते हैं, उनको भी यदि कहीं ग़लत पाते हैं तो उनसे जी भर कर लड़ लेते हैं।
विनीत चौहान का स्वभाव एक ऐसे संवेदनशील मनुष्य का उदाहरण है, जो मैच्योर सहगामियों के साथ रहकर भी अपनी निस्पृह प्रतिक्रियाओं को मैच्योर बनाने की न तो कभी इच्छा पाल सका, न ही ऐसी कोई आवश्यकता महसूस कर सका।
दोस्ती कैसे निभाई जाती है और दोस्त को साधिकार कैसे टोका जाता है, इस बात को समझना हो तो विनीत चौहान के अपनत्व के दायरे में प्रवेश करके देखिए!
✍️ चिराग़ जैन

जामनगर में कुछ छूट गया है…

3 मई को जामनगर स्थित रिलायंस टाउनशिप के कवि सम्मेलन के लिए घर से निकला। दिल्ली से राजकोट और राजकोट से जामनगर। इस यात्रा के सहयात्री बने प्रिय गजेन्द्र प्रियांशु।
गजेन्द्र के साथ बतियाते हुए अवधी बोली का सहज लालित्य रसवृद्धि कर देता है। व्यवहार में गाँव की ठसक और प्रवृत्ति में विद्यमान कबीर ने गजेन्द्र के व्यक्तित्व को सत्यप्रेमियों के लिए आकर्षक बना दिया है। प्रशंसा लोलुपों के लिए ऐसे मनुष्यों की संगत खीझकारक सिद्ध होती है।
साहित्य और साहित्यिकों की चर्चा का रसास्वादन करते हम दोनों के कूपे का द्वार दिल्ली कैंट पर बंद हुआ तो सीधे राजकोट जंक्शन पर खुला।
राजकोट में जलेबी और फाफड़े का कलेवा ग्रहण करते हुए हम दोनों जामनगर पहुँचे। आयोजन मंडल की ओर से दीपक दवे जी हमारे गेट पास लिए टाउनशिप के द्वार पर तैयार खड़े थे। उनका अनुकरण करते हुए हम उस परिसर में प्रविष्ट हुए जो पिछले दिनों अम्बानी परिवार के वैवाहिक उत्सव के सन्दर्भ में पूरी दुनिया मे वायरल हो चुका था। शानदार बागबानी, बेहतरीन साफ़- सफाई, आलीशान साज-सज्जा और अनुशासित बाशिंदों से वातावरण में सकारात्मकता पसरी हुई थी।
हमारे पहुँचने के लगभग दो घंटे के भीतर मुंबई से दिनेश बावरा जी और सूरत से सोनल जैन भी रिलायंस टाउनशिप स्थित गेस्ट हाउस पहुँच गए। गर्मी बहुत अधिक थी, सो चारों कवि दोपहर का भोजन करके विश्राम करने चले गए। शाम 6:00 बजे हम चारों तैयार होकर रिसेप्शन पर पहुँच गए। दीपक दवे जी ने अपने सुव्यवस्थित आतिथ्य के अंतर्गत हमें कार्यक्रम स्थल पर जाने से पूर्व टाउनशिप स्थित मंदिर परिसर के दर्शन का सुझाव दिया।
सोनल चहक कर बोलीं, अरे यहाँ तो वैली ऑफ गॉड भी बनाई है ना! दीपक जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, जी हाँ, वहीं चलने की बात कर रहा हूँ।
मन में कौतूहल और आँखों में चमक लिए हम गाड़ियों में सवार हो गए। दीपक जी बहुत मन से हमें टाउनशिप के विषय में बता रहे थे। गाड़ी के दाहिनी ओर इशारा करते हुए दीपक जी बोले, यह पक्षियों के लिए आरक्षित स्थान है। यहाँ एंट्री रेस्ट्रिक्टिड है। मैं खिड़की के उस पार उस दिशा में देखने लगा कि तभी हमारी गाड़ी बाएं हाथ पर मुड़कर एक पार्किंग एरिया में रुक गई। गाड़ी से उतरते ही कानों में मोर, कोयल और चिड़ियों के स्वर भर गए। मैंने दीपक जी से कहा, जिन पक्षियों के क्षेत्र में प्रवेश सीमित है उनका कलरव तो दीवारें लांघकर हमारे कानों में घुसा आ रहा है। दीपक जी ने ठहाका लगाकर कहा, इस पर तो कोई नियंत्रण नहीं किया जा सकता भाईसाहब।
अब बारी थी वैली ऑफ गॉड देखने की। सीढ़ियां चढ़कर मंदिर के सम्मुख उपस्थित हुए तो चारों ओर ईश्वर विद्यमान था। सामने मंदिर की वेदी में बाँसुरीवाले कन्हैया अपनी राधिका के साथ रासमुद्रा में सुशोभित थे तो बाहर प्रांगण के एक सिरे पर वक्रतुण्ड महाकाय गणपति विराजमान थे। सामने कन्हैया, दूसरे छोर पर बप्पा और इसके ठीक मध्य में बप्पा के पप्पा. काले रंग का विराट शिवलिंग और उसके सम्मुख पंचांग प्रणाम रत नन्दी महाराज।
पूरा परिसर विशालकाय वृक्षों से सजा हुआ है। लम्बी लम्बी शाखाएँ वृक्षों की भुजाओं का आभास करवाती हुई आसमान और धरती के मध्य छायादार हरियाली बिछा रही हैं। इन शाखाओं पर हज़ारों छोटी-बड़ी घंटियाँ, लाखों रुद्राक्ष और कौड़ी से बनी लम्बी-लम्बी लटकनें लगवाई गई हैं। किसी वृक्ष पर हज़ारों नारियल बंधे हैं तो किसी दरख्त ने हज़ारों मन्नत वाली चुन्नियाँ ओढ़ी हुई हैं। कहीं पूरा तना मोली-कलावे से सिंगर उठा है तो कहीं लाखों चूड़ियों ने शाखाओं की कलाइयों को लाद दिया है।
जिधर देखो उधर ही विराट की छवि उपस्थित है। फव्वारे, यज्ञशाला… सब कुछ बैकुण्ठ सरीखा। रास्ते के एक और एक विशाल वटवृक्ष नीचे काठ से बने गोपाल चैन की बंसी बजाते दिखते हैं। थोड़ी आगे बढ़ने पर रामभक्ति में लीन वज्र अंगी हनुमान मंझीरे बजा रहे हैं। जिधर देखो उधर ही कोई न कोई देवी या देवता उपस्थित हैं।
एक बरामदे जैसे ढांचे के ऊपर लगभग पंद्रह फीट लंबा मोर बनाया गया है, जिसका रूप इतना लावण्ययुक्त है कि वास्तव का मोर भी इससे ईर्ष्या कर उठे। मुख्य द्वार पर एक विशालकाय घंटा टँका हुआ है। यत्र-तत्र छोटे बड़े देवालय हैं।
वैकुण्ठ की परिकल्पना का अब तक बना शायद सर्वाधिक निकटतम अनुमान है यह वैली ऑफ गॉड।
घड़ी दौड़ रही थी और मन ठहर गया था। मैं इस अलौकिक वातावरण को आँखों में भर लेना चाहता था। दिन का साम्राज्य अब रात के आगोश में खो रहा था। मन्दिर परिसर में हज़ारों दीपक और बल्ब जगमगा उठे थे। मूल वेदी के सामने मंत्र, शंखध्वनि और आरती गूंज रही थी।
दीपक जी ने इस आध्यात्मिक मोहपाश से बाहर निकालने के लिए हमें याद दिलाया कि आयोजन स्थल पर श्रोता प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हम ‘कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत का पालन करते हुए स्टेज पर पहुँचे। लगभग 1200-1500 श्रोताओं का हुजूम रात साढ़े दस बजे तक ठहाकों, तालियों और संवेदना की तरंगों में गोते लगाता रहा। 1 बजे हमें जामनगर से ट्रेन पकड़नी थी। शीघ्रता पूर्वक रात्रिभोज करके मेरी देह सौराष्ट्र एक्सप्रेस की एक बर्थ पर आ लेटी है। मन काष्ठ-कन्हैया के चरणों में कहीं छूट गया है।
ईश्वर ने चाहा तो फिर कभी लौटूंगा ईश्वर की घाटी से अपना मन वापिस लेने।

– चिराग़ जैन

अरुण जैमिनी: एक नाम नहीं, एक किरदार

“छोड़ ना यार, क्या फरक पड़ता है।” -यह वाक्य कोरा तकियाक़लाम ही नहीं, अपितु अरुण जी के जीवन का मूल सिद्धान्त भी है। जीवन की बड़ी से बड़ी भँवर से भी वे इसी एक वाक्य की डोर थामकर किनारे आ लगते हैं। पहले मुझे ऐसा लगता था कि वे दूसरों की समस्या को छोटा समझते हैं, इसीलिए सामनेवाले की परिस्थिति और तनाव के पहाड़ को अपने इस एक वाक्य से छोटा साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन बाद में मैंने देखा कि वे ख़ुद की समस्याओं को भी अपने इसी एक वाक्य से छोटा साबित कर देते हैं।
उन्हें जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है अपना कम्फर्ट ज़ोन। इसीलिए ज्यों ही उनके कम्फर्ट ज़ोन में कोई तनाव प्रवेश करने लगता है तो वे ‘किसी भी कीमत पर’ उससे अपने कम्फर्ट को सुरक्षित निकाल लाते हैं। अपने कम्फर्ट ज़ोन की रक्षा के लिए वे धन, सिद्धान्त, यश, लाभ और एक सीमा के बाद सम्बन्ध तक से मोहभंग कर लेते हैं। कई बार मुझे उनके मापदण्ड बदलने पर बहुत आश्चर्य होता था, लेकिन अब महसूस होता है कि समय की किसी एक इकाई में किसी एक मापदण्ड की अनदेखी कर देने से यदि आप एक लम्बी अवधि के तनाव से मुक्त हो जाते हैं, तो यह सौदा खरा कहा जा सकता है, बशर्त उसका उद्देश्य किसी को धोखा देना न हो।

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अरुण जैमिनी जी से पहली बार मैं उस कवि-सम्मेलन में मिला था, जो एक श्रोता और कवि, दोनों रूपों में मेरा पहला कवि-सम्मेलन था। उसके बाद उनके कवि-सम्मेलनीय कद के कारण आगे से बढ़कर उनसे सम्पर्क बढ़ाने में संकोच होता रहा। लेकिन उनका व्यक्तित्व और उनके चेहरे की कांति मुझे हमेशा आकृष्ट करती थी। कई वर्ष तक मैं उनके अस्तित्व को दूर से ही देखता रहा, फिर न जाने कब वे मित्र हो गए; न जाने कब उन्होंने मेरे संकोच की दीवार गिराकर अपनत्व का सूत्र बांध लिया।
मुझे जहाँ तक याद है, वर्ष 2011 में जब मैंने जम्मू में नौकरी की थी, तब अरुण जी से मेरा रिश्ता सुदृढ़ होने लगा। 2012 में जब नौकरी छोड़कर आया, तो वह स्थिति जन्मी कि हम दिन में कम से कम एक बार बात ज़रूर करते थे। तब से अब तक यह क्रम अनवरत ज़ारी है। जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख… सब कुछ हम परस्पर साझा कर लेते हैं।
मेरी सर्जरी के दौरान उन्होंने जिस शिद्दत से मित्रता निर्वहन किया, वह मैं कभी नहीं भूल पाता। मुझे याद है कि जब मेदांता में वे मुझसे मिलने आए तो मैंने कहा कि मेरे कारण सब परेशान हो रहे हैं। इस पर वे भावुक होकर बोले – ‘अर तू जो सबके लिए परेशान होता है हमेशा!’

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अरुण जी के साथ एक बात ख़ास है, वो ये कि वे एक बार में एक ही काम करते हैं। और जो काम करते हैं, उसे पूरी शिद्दत से करते हैं। जैसे उन्हें एक बार यह बात समझ आ गई कि कवि-सम्मेलन समिति के अधिवेशन में सबको गले में आईकार्ड ज़रूर लटकाना है तो इसके बाद वे मुख्य अतिथि को भी बिना कार्ड के अधिवेशन हाॅल में एंट्री नहीं करने देंगे। काम महत्वपूर्ण है या नहीं, ये अलग बात है, लेकिन अगर उसकी ड्यूटी अरुण जैमिनी ने ली है तो वह होगा ज़रूर। अपने हिस्से काम वे उतना ही लेते हैं, जितना वे कर सकें। और अरुण जी कितना काम कर सकते हैं, ये उन्हें जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन जितना काम वे करते हैं, उसमें कोई कमी नहीं निकल सकती।
जून 2023 में मेरी और मनीषा की शादी थी। मैंने कहा, चाचा, अबकी बार मुझे अधिवेशन की तैयारी से मुक्त कर दो। अरुण जी का डायरेक्ट जवाब था, शादी में तैने क्या करना है। सब हो जाएगा। मैंने कहा, ‘भाईसाहब सबको निमंत्रण भेजना है, सारी तैयारी करनी है…।’ उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी उठाते हुए कहा- ‘तेरी शादी में कवियों के निमंत्रण की ज़िम्मेदारी मेरी।’ उन्होंने इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी ले ली तो मुझे थोड़ा सहारा मिला। मैंने हर वर्ष की तरह पूरा समय लगाकर जोधपुर अधिवेशन सम्पन्न किया। और कवि-परिवार से इतर सबको निमन्त्रण के लिए व्यवस्थित रूप से सूची बनाकर विवाह का निमन्त्रण भी भेजता रहा। 25 जून को विवाह का रिसेप्शन था। समय से पहले अरुण जी और भाभी आयोजन स्थल पर उपस्थित थे। कवि-परिवार भी प्र्याप्त संख्या में उपस्थित था, लेकिन अनेक महत्वपूर्ण नाम दिखाई नहीं दिये। …मैंने अरुण जी से कुछ लोगों के न आने का कारण पूछा तो पता लगा कि अरुण जी ने कवियों के व्हाट्सएप ग्रुप पर सबको सामूहिक निमंत्रण दे दिया था कि चिराग़ और मनीषा के ब्याह में सभी आमंत्रित हैं, चिराग़ बहुत व्यस्त है, अलग से निमंत्रण का इंतज़ार न करें।’
अब जो-जो उस ग्रुप में था, वो-वो निमंत्रित हो गया और जो जो उस ग्रुप में नहीं था, वो आज तक मुझे ताना देता है। …मुझे अरुण जी की इस हरक़त पर क्रोध नहीं आया क्योंकि मैंने देखा है कि वे अपने घर के ब्याह-टेलों में भी कवि-समाज को निमंत्रित करने का ‘दायित्व’ ऐसे ही निभाते हैं।

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उनका किरदार उनकी सादगी से पोषित होता है। पंच और डांस को रोकने में वे हमेशा असमर्थ रहे हैं। मुझे याद है एक बार गौरव शर्मा और मैं काठमांडू के एक कार्यक्रम में थे। अरुण जी को इसी कार्यक्रम में कहीं और से आना था, तो वे दो घण्टे बाद होटल पहुँचे। होटल पहुँचने पर गौरव ने उन्हें बताया कि चाचा, चिराग़ ने रास्ते में मुझे बहुत शानदार गीत सुनाया।
गौरव की बात सुनकर चाचा के चेहरे पर भय मिश्रित आश्चर्य तैर गया। आँखें बड़ी हो गईं, फिर धीमे स्वर में गौरव से पूछा- इतनी देर में इसने गीत भी सुना दिया।
गौरव उनके व्यंग्य को समझकर झट से रुआँसा होकर बोला- ‘हाँ चाचा, एक नहीं तीन-तीन।’
अरुण जी ने चेहरा लाल करके मुझसे कहा- ‘साले, इन्हीं हरकतों से एक दिन तू अपने सारे दोस्त खो देगा।’
ठहाके का ऐसा निर्माण होता मैं पहली बार देख रहा था।

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कुल मिलाकर, तनाव से रहित जीवन जीने का जीवन्त उदाहरण है मेरा चाचा। आज ये सारी बातें इसलिए याद आ रही हैं क्योंकि आज चाचा का जन्मदिन है और चाचा अमरीका में है। अगर भारत में होते तो इतना लम्बा लेख लिखने का समय ही नहीं देते।
हैप्पी बर्थडे चाचा… लव यू।
✍️ चिराग़ जैन

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