Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमारे समाज की सबसे प्रभावी पाठशाला है सिनेमा। सिनेमा ने भारतीय समाज का निर्माण किया है। और समाज ही नहीं; सामाजिक चलन, प्रवृत्ति और यहाँ तक कि मानसिकता का भी निर्माण सिनेमा ने ही किया है।
हमने सिनेमा से सीखा है कि आम जनता कीड़े-मकौड़े की तरह है, जिसकी न कोई इज़्ज़त है, न क़ीमत। इसको कोई भी, कभी भी कैसे भी लूट सकता है। फिल्मी पर्दे ने बहुत चालाकी से आम जनता को मूकदर्शक बने रहना सिखाया है।
आध्यात्मिक फ़िल्मों में आम जनता भीड़ बनकर आरती करती रही। उसकी कोई पहचान कभी नहीं रही। उसके लिए सम्वाद के नाम पर जयकारे से ज़्यादा कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई। उस भीड़ से निकल कर यदि कोई सम्वाद करने लगा, तो वह आम नहीं रहा। वह या तो नायक बनकर विशेष भक्त बन गया या फिर उस भक्त से ईर्ष्या रखनेवाला नास्तिक खलनायक बन गया।
सम्वाद आपको भीड़ से अलग कर देता है। सम्वाद आपको विशेष बना देता है। इसीलिए आम जनता के लिए कभी सम्वाद लिखे ही नहीं गए।
इसके बाद दौर आया ऐतिहासिक सिनेमा का। इसमें भी आम जनता की स्थिति वही रही। बस ईश्वर का किरदार राजा के किरदार से बदल दिया गया। जनता कभी फ्रेम में आई तो या तो विदेशी आततायी की प्रताड़ना सहती दिखी या फिर अपने राजा के महल के आगे हाथ जोड़े बिलखती दिखी और अंत के एक शॉट में राजा के जयकारे लगाती दिखी।
निर्देशक जानता है कि अत्याचार के समय यदि जनता कुछ प्रतिक्रिया कर देगी तो कहानी बदल जाएगी। फिर राजा की महत्ता क्षीण हो जाएगी। इसलिए जनता को अत्याचार के समय अधिक से अधिक रोने-चीखने की अनुमति मिलती थी। क्योंकि हाथ चलानेवाला तो फुटेज खा जाएगा। फिर राजा को हीरो साबित करना असंभव होगा।
फिर देशभक्ति की फ़िल्मों का युग आया। यहाँ से जनता की भूमिका में कुछ परिवर्तन हुआ। वह सक्रिय हुई। क्रांति और शांति के आंदोलनों की ताक़त बन गई। लेकिन इस दौर में भी उसके भाग्य में संवाद नहीं लिखे गए। वह कभी गांधी, कभी नेहरू तो कभी किसी अन्य लीडर के पीछे दौड़ती दिखी। अंग्रेजों के अत्याचारों पर बिलखती जनता ने अपने लिए ईश्वर या राजा नहीं, लीडर चुन लिया।
अब लीडर नायक बन गए। जनता या तो संवादहीन होकर लॉन्गशॉट में नेता की लोकप्रियता का प्रमाण बन गई, या फिर किसी अंग्रेज सार्जेंट के हंटर की मार से रोती-बिलखती हुई खलनायक की क्रूरता का झरोखा बन गई।
फिर दौर आया रोमांटिक फीचर फ़िल्मों का। एक खूबसूरत लड़की, एक बेरोजगार लड़का, एक अमीर बाप, एक बीमार माँ, एक विधवा बहन, एक क्रूर खलनायक… इत्यादि! इस दौर में जनता के नाम पर कुछ लड़कियाँ और कुछ लड़के कभी कभी डांस नंबर में हीरो और हीरोइन के पीछे नाचते हुए उग जाते थे और गाने का बैकग्राउंड म्यूज़िक समाप्त होते ही झट से नदारद हो जाते थे। क्रूर खलनायक के गुंडे हीरो को सर-ए-आम पीटते थे, और ‘आम’ जन अपना सिर झुकाए देखते रहते थे। खलनायक भरे बाज़ार में हीरोइन के कपड़े फाड़ा करता था और जनता अपने चरित्र पर नपुंसकता लपेटे चुपचाप देखती रहती थी।
फिर क्रांतिकारी फ़िल्मों का दौर आया। एक लालची पूंजीपति के अत्याचारों से त्रस्त मजदूर अपनी झुग्गी बस्ती के उजाड़े जाने का तमाशा देखती हुई बिलखती रहती है। फिर उन्हीं मजदूरों की भीड़ में से एक टफ लुक का नौजवान प्रकट होता है। उसकी एंट्री पर पार्श्व में अलग ढिंचक टाइप का संगीत बजता है। उसका आकार शेष मजदूरों से थोड़ा ऊँचा होता है। कभी उसके हाथ पर किसी विशेष नंबर का बिल्ला होता है तो कभी उसके गले में गमछा या रूमाल बांधकर उसे भीड़ से अलग दिखाया जाता है। उसके आते ही फाइट सीन शुरू होता है। वह अकेला झुग्गी उजाड़ने वाले दस्ते की छुट्टी कर देता है और चारों ओर गोला बनाकर खड़ी भीड़ तालियां बजाकर अपनी नपुंसकता का जश्न मनाते हुए उसे हीरो स्वीकार कर लेती है।
इसके बाद जब भी खलनायक कोई चाल चलता है तो यह जनता प्रतिकार करने की बजाय उस हीरो का इंतज़ार करने लगती है और वह हीरो आते ही गुंडों के चंगुल से उस मूकदर्शक भीड़ को बचा लेता है।
इन सब फ़िल्मों ने हमारे समाज के मन में यह बात ठीक से बैठा दी है कि किसी भी स्थिति में हमें अपना विवेक प्रयोग नहीं करना है। हमें केवल अपने लिए एक मसीहा ढूंढना है, जिसके पीछे हमें आँख मूंद कर चलना होगा।
चूँकि हम सिनेमा के आदर्श विद्यार्थी हैं, इसलिए हमने रियल लाइफ में भी विवेकहीन आचरण करना ठीक से सीख लिया है। जिसने ख़ुद को हमारा मसीहा कहा, हम उसके पीछे चलने लगे। हमने उसे अपना भगवान कहना शुरू कर दिया।
सोशल मीडिया का दौर आया तो हम जनता नहीं रहे बल्कि अलग-अलग किस्म के स्वयंभू मसीहाओं के ट्रोलर बन गए। गाली-गलौज और गीदड़ भभकी जैसे परमाणु अस्त्रों से हम चरित्र हत्या करनेवाले रोबोट बन गए हैं या फिर किसी आईटी सेल के मेसेज को कॉपी-पेस्ट करके हवा बनाने वाले टूलबॉक्स।
हमारा ‘यूज़’ करके मसीहा अपनी राजनीति चला रहे हैं। मसीहा जानते हैं कि ये जनता किताबें पलटने की कोशिश नहीं करेगी, इसीलिए मसीहा अपने-अपने स्टाइल में धड़ल्ले से झूठ की बरसात कर रहे हैं। मसीहा अपने अपने डायरेक्टरों के हिसाब से आइटम सॉन्ग पर नाच रहे हैं। और जनता उनके पीछे भीड़ बनकर ठुमक रही है। मसीहा अपने अपने स्क्रिप्ट राइटर के लिखे डायलॉग अपने स्टाइल में बोल रहे हैं और हम डायलॉग की मिमिक्री करके ख़ुश हैं।
जिस दिन इस जनता ने विवेक का इस्तेमाल कर लिया उस दिन डायरेक्टरों के लिए बताना मुश्किल हो जाएगा कि जंगल में नायक-नायिका के लिए म्यूज़िक कैसे बजने लगता है; धुंआधार गोलियाँ चलाकर सैंकड़ों गुंडों को मार देनेवाले नायक को पुलिस क्यों नहीं पकड़ती; अदालतों में चीख-चीख कर दलील कहाँ दी जाती है; बिना वीजा के पाकिस्तान जानेवाले का इन्डिया में वापस एंट्री करते वक़्त इमिग्रेशन चैक क्यों नहीं होता… वगैरह… वगैरह!
बहरहाल, हम सिनेमा के दिखाए पथ पर चल रहे हैं। हर मसीहा अपने लिए हीरो की स्क्रिप्ट लिखवाकर पर्दे पर उतर रहा है। हीरोइज्म की लत से त्रस्त हमारा लोकतन्त्र बार-बार कान लगाकर अपनी दर्शक दीर्घा की साँसों में विवेक का सुर पकड़ने का प्रयास करता है लेकिन नपुंसकता का खटराग उस प्रयास से एक हताश उच्छ्वास से अधिक कुछ नहीं पनपने देता!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
हिन्दी सिनेमा की भाषा भारतीय समाज में हिंदी की यात्रा का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करने के लिये पर्याप्त है। ज्यों-ज्यों समाज की भाषा बदली त्यों-त्यों सिनेमा की भाषा भी बदलती गयी।
प्रारंभिक हिंदी फिल्मों में एक ओर उर्दू शब्दावली की भरमार थी तो दूसरी ओर संस्कृतनिष्ठ हिंदी भी सहज स्वीकार्य होती थी। ‘ग़म दिये मुस्तक़िल’ जैसे गीत उन दिनों लोकप्रियता के प्रतिमान बन जाते थे। मजरूह का ही ‘हम हैं मताए-कूचा-ए-बाज़ार की तरह’ जैसी ख़ालिस उर्दू की ग़ज़ल भी न केवल स्वीकार्य थी बल्कि जनता के मुँह पर चढ़कर बोलती थी। उर्दूनिष्ठ हिंदी के ये उदाहरण बाद में शकील बदायूनी, साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, क़ैफ़ी आज़मी, जांनिसार अख़्तर और शहरयार से होते हुए गुलज़ार और जावेद अख़्तर के ज़माने तक ख़ूब दिखाई देते हैं। हाल ही में ‘मेरे रश्के-क़मर तूने पहली नज़र इस तरह से मिलाई मज़ा आ गया’ गीत की लोकप्रियता ने उर्दू की स्वीकार्यता पर पुनः मुहर लगाई। यह भी सत्य है कि उर्दू की गाढ़ी शब्दावली के प्रयोग में अब, पहले की अपेक्षा, क़ाफ़ी कमी आ गई है। हाँ, आम बोलचाल की उर्दू पहले भी ख़ूब प्रचलित थी और आज भी उसकी स्थिति में कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिलता।
उधर संस्कृतनिष्ठ हिंदी के उदाहरण स्वरूप भरत व्यास के गीतों ने बड़ी लक़ीर खींची। ‘हरी-भरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन’; ‘प्रणय, विरह और मिलन की कथा सुनो साथी’; ‘कल्पना के घन बरसते’ और ‘ओ पवनवेग से उड़ने वाले घोड़े’ सरीखे गीत हिंदी सिनेमा के उस दौर की पहचान बने। इंदीवर ने ‘चन्दन सा बदन, चंचल चितवन’ जैसी शब्दावली से पण्डित जी की इस परंपरा को पुष्ट किया। गोपालदास नीरज जी ने ‘मदिर’; ‘पाती’ और ‘जल’ जैसे शब्दों को गीत में पिरोकर प्रचलित कर दिया। क्लिष्ट शब्दावली के प्रयोग के और भी तमाम उदाहरण हिंदी फिल्मी गीतों में आसानी से ढूंढे जा सकते हैं। बालकवि बैरागी जी द्वारा लिखे गये गीत ‘तू चंदा मैं चांदनी’ में ‘तरुवर’ और ‘पाख’ जैसे शब्द बड़ी आसानी से प्रयुक्त हुए हैं। इससे इंगित मिलता है कि उस समय तक हमारे जन की भाषा में प्रचलन से बाहर हुए शब्दों को पुनर्जीवित करने की क्षमता थी।
इससे अलग एक धारा आमफ़हम शब्दों के दायरे से बाहर जाने से परहेज करती रही। शैलेन्द्र के गीतों में हिंदी का सर्वाधिक जनसुलभ स्वरूप प्रदर्शित होता है। वे दर्शन के गीत भी सबसे सादा शब्दावली के परकोटे से बाहर नहीं जाने देते थे। ‘आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है’; ‘वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ’; ‘सजन रे झूठ मत बोलो, ख़ुदा के पास जाना है, न हाथी है न घोड़ा है वहाँ पैदल ही जाना है’ और ‘याद न जाए बीते दिनों की’ जैसे गीत उसी भाषा के उदाहरण हैं जो हम आज भी आम बातचीत में प्रयोग करते हैं। क़ैफ़ भोपाली, राजा मेहदी अली ख़ान, इंद्रजीत सिंह तुलसी, पण्डित नरेंद्र शर्मा, विट्ठलभाई पटेल और राजेंद्र कृष्ण जैसे रचनाकार भी लगभग इसी आम शब्दावली की परंपरा के गीतकार रहे। और यह शब्दावली ही फिल्मों में सर्वाधिक अपेक्षित भी रही, क्योंकि संस्कृतनिष्ठ हिंदी और उर्दूनिष्ठ हिंदी लिखनेवाले रचनाकारों के यहाँ भी इस शब्दावली के उदाहरण ख़ूब दिखाई देते हैं।
समय के साथ हमारी भाषा में पंजाबी के शब्दों की उपस्थिति बढ़ने लगी। ऐसे में आनन्द बख़्शी और संतोष आनन्द ने पंजाबी के शब्दों का सहजता से प्रयोग किया। ‘कुड़ी’; ‘मुंडा’ जैसे एकाध शब्द का प्रयोग बाद में इतना बढ़ा कि आनंद बख्शी ने ‘बिंदिया चमकेगी’ गीत की प्रत्येक तुकांत पंक्ति में बाक़ायदा पंजाबी का व्याकरण प्रयोग किया – ‘छत टुटदीये ते टुट जाये’।
लोकशैली के गीतों और कहीं-कहीं शुद्ध लोकगीतों को फिल्मों में प्रयोग किया गया तो अवधी, बृजभाषा, मराठी और भोजपुरी के हस्ताक्षर फिल्मी गीतों में चलने लगे। ‘चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे’, ‘ठाड़े रहियो ओ बाँके यार रे’ और ‘कौन दिसा में ले के चला रे बटोहिया’ जैसे गीत इस धारा की गीतशैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
‘गॉड प्रॉमिस हम सच बोला है’ जैसे मुम्बइया हिंदी के भी कुछ गीत फिल्मों का हिस्सा बने। लेकिन यह प्रयोग बहुत अधिक प्रचलित न हो सका। इसी तरह दक्खिनी हिंदी का तड़का लगाकर ‘हमें काले हईं तो क्या हुआ दिलवाले हैं’ जैसे भी एकाध गीत लिखे गए; लेकिन वे भी चरित्र की मांग से अधिक अपनी स्वीकार्यता न बना सके। इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि हिंदी फिल्मों का लक्ष्य दर्शक इस भाषा से बहुत परिचित नहीं रहा।
विशेष प्रयोग के रूप में दूसरी पीढ़ी की फिल्मों में भाषाओं के सम्मिश्रण के कुछ उदाहरण अवश्य मिलते हैं, लेकिन उनको भी परंपरा न बनाया जा सका। साहिर ने ‘न तो करवां की तलाश है’ में पंजाबी, ब्रजभाषा और उर्दू का अद्भुत समागम प्रस्तुत किया। नीरज जी ने भी ‘छुपे रुस्तम हैं ज़माने की ख़बर रखते हैं’ में अवधी का तड़का लगाकर क़व्वाली की खूबसूरती बढ़ाई। लेकिन इनकी सनद लेकर आगे के गीतकार ऐसे बहुत अधिक प्रयोग न कर सके।
फिल्मों की छठी-सातवीं पीढ़ी में अचानक अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। यहाँ से शब्दों की तोड़-फोड़ प्रारम्भ हुई। भाषा खिचड़ी होने लगी। यह स्पष्ट रूप से कहना कठिन होगा कि यहाँ से जनता की भाषा फिल्मों ने बदली या फिल्मों की भाषा जनता ने! अंग्रेजी के मुहावरे और विशेष रूप से ‘आई लव यू’ वाक्यांश का प्रयोग गीतों में बहुतायत में होने लगा। वीनू महेंद्र ने ‘लवेरिया’ जैसा शब्द गढ़कर भी गीत लिखा, जो अपने समय मे मिसाल बन गया। आनन्द बख्शी ने भी अंग्रेजी के सहज शब्दों का प्रयोग करने के साथ-साथ कहानी की मांग पर अंग्रेजी के व्याकरण को निभाते हुए भी ‘माई नेम इज़ एंथोनी गोंसाल्विस’ जैसा गीत भी लिखा।
इसके बाद गीतों की भाषा कब हिंग्लिश हो गई, पता ही न चला। वे वर्जित शब्द जिन्हें असंसदीय या अश्लील समझा जाता था, वे भी गीतों में सम्मिलित होने लगे। हम गीत-ग़ज़ल से शुरू होकर गाली-गलौज तक को स्वीकारने लगे। यही स्थिति हमारी आम बोलचाल की भी रही। अंग्रेजी शब्दावली के बढ़ते चलन ने इस स्थिति को पुष्ट करने में महती भूमिका अदा की। एक ज़माने में ‘सेक्सी सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोलें’ गीत आया था तो सभ्य परिवारों में इस गीत को गुनगुनाने पर बच्चे पीट दिए जाते थे। बाद में यह सब आम हो गया। बॉलीवुड में ‘सत्यम-शिवम-सुंदरम’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसे चित्रपट कलात्मक दृश्यों के कारण विवादित हो गए, लेकिन उनसे जन साधारण की सोच दूषित न हो सकी। लेकिन गीत और संवाद में अश्लीलता की घुसपैंठ ने आज यह स्थिति उत्पन्न कर दी है कि हमारे समाज की भाषा सभ्यता की मर्यादा लांघ चुकी है।
दृश्य सिनेमाघर के पर्दे पर छूट जाता है और भाषा लोगों की ज़ुबान पर चढ़कर समाज में छूत की तरह फैल जाती है। भाषा में वर्जित शब्दावली का सामान्य प्रयोग बढ़ने की प्रवृत्ति भाषा के लिए तो घातक है ही, समाज और संस्कृति के लिए भी विषबेल सरीखी है।
हिंदी फिल्मों की भाषा से यदि समाज की भाषा बनती है तो फिल्मों को अपनी भाषा के प्रति उत्तरदायित्व-बोध महसूस करना होगा और समाज की भाषा के आधार पर फिल्मों की भाषा तय होती है, तो हमें अपने परिवारों के भाषा-स्तर के प्रति बेहद गम्भीर होने की आवश्यकता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जब भी जनता के हाथों नतीजा रहा
फिर न चाचा रहा ना भतीजा रहा
लोग अभिनय के दम पर सफल हो गए
ख़ूबसूरत भले थोबड़ा भी नहीं
अपने बेटे को हीरो बना ना सके
जुबली हीरो व यश चोपड़ा भी नहीं
काम पर्दे पे बोला न अरबाज़ का
भाई का भाई पर मन पसीजा रहा
जब भी जनता के हाथों नतीजा रहा
फिर न चाचा रहा ना भतीजा रहा
सिर्फ एप्रोच से काम चलता अगर
तो गावस्कर का बेटा निकलता नहीं
बाप ने ओडीआई खिला तो दिया
फील्ड में बाप का नाम चलता नहीं
दो सिरीज़ों में रोहन बाहर हो गया
उसकी क़िस्मत में दौरा न तीजा रहा
जब भी जनता के हाथों नतीजा रहा
फिर न चाचा रहा ना भतीजा रहा
तीन पीएम हुए एक परिवार से
और बाकी के ग्यारह कहाँ से हुए
राष्ट्रपतियों की सूची उठा लीजिए
सब ज़मीनी थे या आसमां से हुए
ठाकरे और यादव के परिवार थे
जिनमें चाचा का दुश्मन भतीजा रहा
जब भी जनता के हाथों नतीजा रहा
फिर न चाचा रहा ना भतीजा रहा
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
सामाजिक जीवन जीनेवाले लोग भी अंततः मनुष्य होते हैं। राजनीति, फ़िल्म जगत्, क्रिकेट, साहित्य, अध्यात्म या अन्य किसी भी क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं, एक उसका निजी जीवन, दूसरा उसका सामाजिक जीवन।
हममें इतनी नैतिकता अवश्य होनी चाहिए कि उसके निजी जीवन को उसके सामाजिक जीवन से गड्ड-मड्ड न करें। ऐसा करके हम न केवल उस व्यक्ति को आहत करते हैं, अपितु अपनी सोच का टुच्चापन भी सार्वजनिक कर देते हैं।
राजनीति में यह सर्वाधिक होता है। फलाने जी के फलानी जी के साथ सम्बन्ध हैं, यह कहना सबसे आसान है। किसी की चरित्र हत्या करने से ज़्यादा आसान कुछ नहीं है। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि राजनेताओं से तुम्हें देश चलवाना है, या बेटी ब्याहनी है? हाँ, यदि किसी का निजी जीवन उसके सामाजिक आचरण को प्रभावित करने लगे तब शालीनता से इस विषय पर टोकना अवश्य चाहिए।
अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होने की ख़बर पर रेखा जी के साथ उनका नाम जोड़कर जिस तरह सोशल मीडिया पर बातें बनाना, घृणास्पद हैं। विश्वास कीजिये, सामाजिक जीवन जीनेवाला हर व्यक्ति, अपनी निजी जिंदगी में आपसे ज़्यादा समस्याएँ और चुनौतियाँ झेलता है। लेकिन वह इन समस्याओं पर न तो कभी आपसे सहयोग मांगने आता है, न ही उनका असर अपने कार्यक्षेत्र में दिखने देता है। लेकिन वह यह भी अपेक्षा रखता है कि उसकी निजी संवेदनाओं को सार्वजनिक उपहास का विषय न बनाया जाए।
आप मज़ाक़ कीजिये ना, राजनेताओं के राजनैतिक जीवन पर मज़ाक़ कीजिये। आध्यात्मिक लोगों के प्रवचनों और तहरीरों में हुई चूक पर परिहास कीजिये; क्रिकेटर्स के खेल पर सवाल उठाइये, पिच पर उसके व्यवहार का मज़ा लीजिए, साहित्यकारों के लेखन, भाषण और भाषा की ख़ूब खिंचाई कीजिये, फिल्मी सितारों की भूमिकाओं, संवादों, अभिनय आदि पर जितना चाहे लिखिए लेकिन उनकी निजता में प्रवेश करते समय इतना सतर्क अवश्य रहें कि आपके नेतृत्व, आपके मनोरंजन, आपके आधात्मिक विकास और आपके बौद्धिक विकास के लिए ये लोग अपनी निजी ज़िन्दगी को अनदेखा कर देते हैं।
मैं हास्य का पक्षधर हूँ किन्तु किसी का दिल दुखाकर हँसते हुए ओंठ एक संवेदनहीन हृदय का प्रमाण होते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
हिंदी फिल्मों में भारतीय समाज की पूरी तस्वीर साफ़ दिखाई देती है। एक प्रभावी संचार माध्यम होने के नाते फिल्मों ने जनमत का ही नहीं ‘जन-प्रवृत्ति’ का भी निर्माण किया।
हर फिल्म में एक नायक होता है। यह नायक जो भी करे, उसे सही मानना जनता का धर्म है। इस धर्म के निर्वाह में क़ानून की धज्जियाँ उड़ती हैं तो उड़ जाएँ। इस धर्म के निर्वाह में अदालत का अपमान होता हो, तो हो जाए। इस धर्म के निर्वाह में अराजकता पुष्ट होती हो, तो हो जाए।
जिस फ़िल्म में नायक गैंगस्टर, डॉन या स्मगलर हो, उसमें वह पुलिस को चकमा दे तो हॉल में तालियाँ बजने लगती हैं। वह पुलिस पर गोलियाँ चलाकर फरार हो जाए, तो हॉल में तालियाँ बजती हैं। वह कॉलेज में लड़की छेड़े तो तालियाँ बजती हैं। वह बैंक लूटने की फुलप्रूफ प्लानिंग करे तो तालियाँ बजती हैं। वह गाली दे तो भी तालियाँ बजती हैं। कुल मिलाकर हमें यह समझा दिया गया कि नायक जो भी करे वह प्रशंसनीय है। और हम यह समझ भी गए।
जिस फ़िल्म में नायक पुलिसवाला हो, वहाँ गुंडों की कुटाई पर, राजनेताओं की ठुकाई पर, नियम-क़ानून को ताक पर रखकर अपराधी को सबक़ सिखाने पर हम तालियाँ पीटते रहते हैं। इन फिल्मों में साफ़ दिखाया जाता है कि क़ानून का पालन करके क़ानून का पालन नहीं करवाया जा सकता।
जिन फिल्मों में नायक वक़ील हो, उसमें न्यायालय की अवमानना, पुलिस की मिलीभगत, अदालत के बाहर होने वाले प्रपंच और क़ानून की लाचारी साफ़-साफ़ दिखाई जाती है। हम अदालत में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते एक्शन हीरो, और जज के सामने धमकी देते वकीलों को देखकर ताली बजाते हैं।
फिल्मों ने हमें यह भी बताया कि हर नायक के कुछ सहयोगी होते हैं। जिस फ़िल्म का नायक गैंगस्टर हो, उसके सहयोगी छोटे-मोटे गुंडे होते हैं। ये सहयोगी अपने नायक की दादागिरी जमाने के लिए ‘जुगाड़’ करते रहते हैं। भाई को कोई दिक्कत न हो इसके लिए पुलिस से सेटिंग और जनता को साधने के लिए ‘कभी गर्म, कभी नर्म’ की नीति, प्रतिद्वंद्वी गैंग से होने वाले पंगों का निपटारा वगैरा सब इनका काम होता है। पुलिस के आला अधिकारियों और ऊँचे-ऊँचे पॉलिटिशियन्स के साथ नायक का उठना-बैठना होता है, और छोटे-मोटे इंस्पेक्टर वगैरा को सहयोगी सम्भाल लेते हैं।
जिन फिल्मों में नायक पुलिसवाला हो, उनमें ये सहयोगी या तो जूनियर पुलिस अफसर होते हैं या फिर भूतपूर्व गुंडे। इनको साथ लेकर नायक सड़े हुए सिस्टम में पल रहे अपराध के कीड़ों को साफ़ करता है।
इन फिल्मों में भीड़ के शॉट्स भी दिखाए जाते हैं, लेकिन इन शॉट्स की तीन ही सिचुएशन्स होती हैं। या तो यह भीड़, खलनायक और उसके गुर्गों के शोषण से पीड़ित होकर रोती-पीटती दिखाई देती है, या फिर इस भीड़ को खलनायक की दहशत से घरों में दुबकते दिखाया जाता है, या फिर कभी-कभी फ़िल्म के अंत में अधमरे खलनायक को ‘मॉब लिंचिंग’ से मारकर नायक को कोर्ट-कचहरी से बचाने के लिए इस भीड़ का सीन लिखा जाता है। शेष फिल्मों में अगर भीड़ है तो तालियाँ बजाने के लिए या जयकारे लगाने के लिए।
फिल्मों ने हमें बताया कि राजनेता हमेशा भ्रष्टाचारी ही होते हैं। हम भी राजनीति के दाँव-पेंच पर्दे पर देखते रहे और मान बैठे कि राजनीति की कीचड़ में कोई बेदाग़ हो ही नहीं सकता।
मीडिया इन फिल्मों में हमेशा सच को उजागर करता ही दिखाई दिया। इसलिए भ्रष्ट पुलिस, अपराधी और राजनीति को इन फिल्मों में हमेशा मीडिया से डरता हुआ ही दिखाया जाता है। ख़बरें बेचने, ख़बरें दबाने, ख़बरें बनाने और ख़बरें घुमानेवाले सीन कभी किसी स्क्रिप्ट में लिखे ही नहीं गए। अब से कुछ दशक पहले तक न्यायाधीशों के लिए संवाद लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। उनकी सिचुएशन फिक्स थी। अदालती बहस के दौरान उन्हें केवल लकड़ी का हथौड़ा टेबल पर पीटते हुए ‘ऑर्डर… ऑर्डर…’ बोलना होता था।
इस पूरे तमाशे ने हमारे मस्तिष्क में कुछ बातें गहरे तक बैठा दीं।
जनता, भीड़ है। जो उसे हाँक ले जाए वही उसका नायक है। फिर वह चाहे पुलिस हो चाहे अपराधी।
सही वही है जो नायक करे और ग़लत वही है जो खलनायक करे।
सिस्टम को सुधारा नहीं जा सकता, उससे या तो खेला जा सकता है या फिर उसको यूज़ करके रॉबिन हुड का जीवन बिताया जा सकता है।
अराजक हो जाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते अराजक होनेवाला नायक हो।
जनता का काम केवल ताली पीटना है। उसे अपने उत्थान के लिए स्वयं कुछ नहीं करना होता। उसे केवल एक नायक की प्रतीक्षा करनी होती है, जो पूरे सिस्टम से लड़कर जनता को ख़ुशी-ख़ुशी ताली बजाने का मौक़ा देगा।
इन सब धारणाओं को मस्तिष्क में बैठाए हमारी कई पीढ़ियाँ गुज़र गईं। नायकवाद की इस धारणा ने हमें ‘जनता’ से ‘प्रजा’ बना डाला। और इससे जो ख़ामोशी पसरी उसका लाभ उठाकर हमारे तंत्र ने लोकतंत्र का मखौल बनाकर रख दिया।
✍️ चिराग़ जैन